“शहीद भगत सिंह की कहानी, मां की जुबानी”

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आर्य सागर खारी🖋️

घटना उन दिनों की है जब लाहौर सेंट्रल जेल में शहीद- ए- आजम भगत सिंह का मुकदमा चल रहा था ,अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध छेड़ने ,राजद्रोह का | शहीद भगत सिंह का मुक़दमा इतिहास में सर्वाधिक प्रसिद्ध हो गया था.. शायद ही स्वाधीनता संग्राम के किसी मुकदमे ने इतनी सुर्खियां बटोरी हो. तत्कालीन हिंदी अंग्रेजी उर्दू बंगाली राष्ट्रीय अखबारों में फ्रंट पेज पर डे टु डे छपता था |उन दिनो चाय ,नाई की दुकानों से लेकर केंद्रीय असेंबली, कांग्रेस के नरम गरम दोनों ही पक्ष में, क्रांतिकारियों के अड्डों पर केवल और केवल भगत सिंह ,राजगुरु, सुखदेव के मुकदमे की चर्चा होती थी | क्रांतिकारी दलों ,बौद्धिक संगठनों में यह चर्चा होने लगी थी कि भगत सिंह की फांसी निश्चित है| यह चर्चा जब भगत सिंह की मां के कानों तक पहुंची तो वह बेचैन हो गई उन्हें पूर्ण विश्वास था उनके लाडले भगत सिंह को फांसी किसी कीमत पर नहीं हो सकती| भगत सिंह के बलिदान के लगभग 40 वर्ष पश्चात शहीद भगत सिंह की भतीजी द्वारा लिखी गई शहीद भगत सिंह की जीवनी में उन्होंने ऐसे अनेक संस्मरण साझा किए हैं जो इस प्रकार है जो बेहद मार्मिक जीवंत है|
भगत सिंह की माता की जुबानी ।

“उन दिनों भगत सिंह का मुकदमा चल रहा था हमारे गांव के बाहर एक साधु आकर बैठ गया और उसने धूनी जला दी दो-चार दिन में ही उसकी सिद्धि की चर्चा गांव भर में होने लगी किसी ने मुझसे कहा उस साधु के पास जाओ तो भगतसिंह बच जाएगा मुझे ऐसी बातों पर बहुत विश्वास नहीं था फिर भी मां की ममता ने बहुत जोर मारा और मैं रात के समय कुलबीर सिंह (भगत सिंह के भाई) को साथ लेकर उस साधु के पास गई उसने कुछ पढ़कर एक पुड़िया में राख मुझे दी और कहा कि इसे भगत सिंह के सिर में डाल देना|”

जब मुलाकात का दिन आया तो मैं राख साथ ले गई और भगत सिंह के पास बैठकर उनके सिर पर हाथ फेरने की कोशिश करने लगी जिससे धीरे से राख उनके सिर में डाल सकूं मेरा हाथ तभी उनके सिर तक नहीं गया था मैं अभी कमर ही थपथपा रही थी कि वह बोले बेबे जी जो राख मेरे सिर में डालना चाहती हो वह कुलबीर के सिर में डालो ताकि यह हमेशा आपके पास रहे|

फिर शहीद भगत सिंह की मां ने ग्रंथि से गुरु ग्रंथ का जाप कराया शहीद भगत सिंह के बचने के लिए तो ग्रंथि ने कहा हे! ईश्वर माताजी चाहती है उनका बेटा बच जाए लेकिन बेटा चाहता है उसे फांसी हो जाए अब आप ही न्याय करें| जब अगली बार माताजी जेल में गई तो भगत सिंह ने पूछा सच बताना माताजी अरदास में ग्रंथि जी ने क्या कहा मैंने बताया तो बोले.. आपकी बात तो गुरु साहब ने भी नहीं मानी अब मुझे कौन बचा सकता है? अपने ना बचने की बात उन्होंने इतने उत्साह से कहीं, जैसे किसी के नाम लॉटरी खुलने की बात तय हो गई हो”

मैं उदास होकर दुख सागर में डूब गई|
फिर मुझे किसी ने बताया किसी परिवार के जेठे अर्थात बड़े बच्चे का पहला झगोला लेकर जाना और उसे भगत सिंह को दे देना| वह उसे अपने पास रख ले ,फैसला ठीक हो जाएगा |मैं झगोला साथ ले गई और उन्हें देने लगी तो पूछा क्या है? मैंने कहा “यह छोटा झगोला है इसे अपने पास रखना ” उन्होंने उसे वापस करते हुए कहा इसे आप संभाल कर रखिए अंग्रेजों की जड़े काटने के लिए कुछ समय बाद में फिर पुनः जन्म लूंगा तब इसे पहन लूंगा यह कहकर वह इतनी जोर से हंसे कि आसपास के लोग देखने लगे|

शहीद-ए-आजम की मां ने एक और शहीद भगत सिंह को लेकर रोचक किस्सा साझा किया जो उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार है|

“बापूजी (सरदार अर्जुनसिंह) ,कुलबीर सिंह और मैं एक बार मुलाकात को गए| दोपहर को ही जेल के दरवाजे पर हम पहुंच गए थे ,लेकिन सांझ हो गई हमें मिलने को नहीं बुलाया गया| हम भगत के बहुत पास थे |बस एक दिवारी हमारी बीच में थी जिसे देखने को हमारी आंखें तरस रही थी उसे हम ना देख सके प्यासे ही गए प्यासे ही लौटे वहां से पैदल चल पड़े जाते समय हमारे पैरों में जो उत्सुकता थी लौटते समय वह निराशा का बोझ बन गई थी मन भी बोझिल हो चुका था फिर भी मैं किसी तरह मन के बोझ को ढोती हुई चल रही थी| अंधेरा घिर आया था और हम झाड़ झंकार भरे रास्ते में जा रहे थे मैंने देखा झाड़ियों के पीछे कुछ आदमी है और वह एक दूसरे को कुछ इशारा कर रहे हैं मैं समझ गई कि यह चोर डकैत है| इसलिए मैं जोर से बोली भगत सिंह का वकील तो कुछ बोलता नहीं सरकारी वकील बहुत बोलता है ,कुलबीर हमें दूसरा कोई वकील करना चाहिए सुनते ही वे पीछे हट गए| भगत सिंह चोरों के भी पूज्य हो गए थे|

इसी तरह अगली बार मुलाकात हो गई तो भगत सिंह ने कहा “बेबी जी, आप भी जेल में आ जाइए ,यहां साथ ही रहेंगे आपको चलकर आना नहीं पड़ेगा उत्सुकता से बोली कैसे आ जाऊं? बेटा लेक्चर मुझे देना आता नहीं कि पिकेटिंग करके आ जाऊं क्या? भगत सिंह बोले नहीं वह हमारा काम नहीं है वह भूल गई जेल फांसी को और उपहास के मूड में बोली तो किसी को ढेला मार कर आ जाऊं ,सुनकर भगत सिंह खिलखिला कर हंस पड़े और आसपास के दूसरे लोग भी|

सोचती हूं मां बेटे की ऐसी हंसी इतिहास ने कितनी बार देखी है?

भगत सिंह की मां से अंतिम मुलाकात फांसी से 20, 22 दिन पूर्व हुई थी| भगत सिंह ने कहा “फांसी के दिन आप ना आना बेबे जी” आप रोएगी बेहोश हो जाएंगी लोग आप को संभालेंगे या लाश लेंगे ,कुलबीर को भेज देना अगर जेल वालों ने दे दी तो वह लाश ले जाएगा भगत सिंह के लिए उनकी मृत्यु निमंत्रित मृत्यु थी इसलिए फांसी के बाद कि उनकी लाश उनके लिए सर्वोत्तम उपलब्धि थी| इसलिए अपनी लाश की बात वे इतनी निर्लिप्तता से कह गए ,पर उनकी मां के कलेजे में उस समय काली का जो तांडव नृत्य हुआ होगा उसे तो वही जान सकती है|

किसी गीतकार कवि ने इस अंतिम मुलाकात का वर्णन शब्दों में इस प्रकार किया है |

    "  तू ना रोना के तू है भगत सिंह की मां

      मर कर भी लाल तेरा मरेगा नहीं 

       घोड़ी चढ़कर तो दुल्हन लाते सभी 

        हंसकर फांसी हर कोई चढ़ेगा नहीं"

सचमुच इन संस्करणों को पढ़कर सुनकर लगता है… मां विद्यावती ही अपनी कोख से शहीदे आजम भगत सिंह जैसा वीर पैदा करने की योग्यता रखती थी…. इसकी एकछत्र अधिकरणी थी| असाधारण पुत्र की असाधारण मां… मां तो होती ही असाधारण.. लेकिन मां विद्यावती की ममता वीरता के आगे असाधारण शब्द भी बोना साबित हो जाता है ………!

आर्य सागर खारी ✍✍✍

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