बाबाओं की समानांतर सत्ता के दुष्फल

बाबाओं के पास जो भीड़ जमा होती है, उसके मूल में दुख है, अभाव है, गरीबी है या अशांति है। कोई बेटे से परेशान है, कोई बहू से, कोई नौकरी से, कोई जमीन के झगड़े में फंसा है और किसी को कोर्ट-कचहरी के चक्कर में जायदाद बेचनी पड़ गई है। या तो धन ही नहीं है और अगर धन है, तो शांति नहीं है। ऐसे में धर्मभीरु व्यक्ति ज्योतिषियों और बाबाओं की शरण में जाता है। इस तरह लोग सम्मान और बेहतर जीवन की आस में डेरा सच्चा सौदा जैसे अपरंपरागत पंथ की ओर आ रहे हैं। 
भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार हमारे जीवन में इस तरह से घर कर चुका है कि अब हमें इन पर कोफ्त नहीं होती, परेशानी नहीं होती। इसी तरह से गवर्नेंस से जुड़ी अथवा प्रशासनिक भूल और अक्षमता को भी हम चुपचाप बर्दाश्त करते चलते हैं और इसका कोई सक्रिय विरोध नहीं करते। यदि गलतियों की रोकथाम न की जाए, तो समय बीतने के साथ-साथ हम जीवन में गलतियों और भूलों को जीवन का हिस्सा मानकर स्वीकार करना आरंभ कर देते हैं। जब हम सामाजिक अथवा प्रशासनिक भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लेते हैं और प्रशासनिक भूलों पर आवाज नहीं उठाते तो हम सुनिश्चित कर लेते हैं कि एक समाज के रूप में हम असफल होते चलें और हमारा नैतिक-सामाजिक पतन आरंभ हो जाए।
बुजुर्ग समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन के समय सारे देश ने एकजुट होकर कांग्रेस के भ्रष्टाचारी शासन के विरुद्ध आवाज उठाई थी। लेकिन बाद में उस आंदोलन के कारण उपजी आम आदमी पार्टी के नैतिक पतन ने हमें इस हद तक हताश किया कि अब हमें लगता ही नहीं कि हमें भ्रष्टाचार का विरोध करना चाहिए। निर्भया के लिए लोग मोमबत्तियां लेकर इक_े हो गए, लेकिन उसके बाद हम सब अपने कामों में मशगूल हो गए। निकम्मी सरकारों के कारण कभी जाट आंदोलन हुआ तो कभी व्यापमं कांड में पचासों आदमियों के मारे जाने के बावजूद सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी। गोरखपुर में जब अस्पताल में छोटे-छोटे अबोध नौनिहाल मृत्यु का ग्रास बने तो सरकारों ने कामचलाऊ हमदर्दी दिखा दी और अब जब एक बलात्कारी बाबा को अदालत ने सजा सुनाई तो दो सरकारें उसके सामने बेबस नजर आईं। बाबा के गुंडों ने तबाही मचा दी। अब तक 38 लोगों के मरने की खबर है, बहुत लोग घायल हो गए हैं और न जाने कितनी सार्वजनिक व निजी संपत्ति स्वाह हो गई है। जैसे-जैसे बाबा के जीवन की परतें खुल रही हैं, नई-नई बातें सामने आ रही हैं।
दुखद सत्य यह है कि तरह-तरह के आरोपों के बावजूद प्रसिद्धि पाने और दिन-ब-दिन शक्तिशाली होते जाने वाले बाबाओं में ये अकेले नहीं हैं। बाल योगेश्वर, सत्य साईं बाबा, निर्मल बाबा, राधे मां, राम पाल, आसा राम आदि कितने ही नाम हैं जिन पर आरोप लगते रहे, लेकिन उनके भक्तों में कमी नहीं आई। राजनीतिज्ञ लोग अपने वोटों की खातिर उनकी शरण में जाते रहे और इस प्रकार इन बाबाओं की प्रसिद्धि बढ़ती रही, शक्ति बढ़ती रही। इनके पास अकूत संपत्ति इक_ी होती चली गई और दिखावे के सामाजिक कार्यों के माध्यम से जनता के सम्मुख सिर्फ इनका नकली चेहरा ही सामने आया। बाबा रामदेव हरियाणा सरकार के ब्रांड एंबेसेडर हैं, पर वे हरियाणा के लिए क्या कर रहे हैं? बाबा रामदेव तो अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर भी हरियाणा नहीं आए थे। मीडिया के फोकस में यह क्यों नहीं आया कि ब्रांड एंबेसेडर के रूप में वह हरियाणा सरकार से कितने पैसे ले रहे हैं? पिछले दिनों मीडिया ने बढ़-चढ़ कर डेरा सच्चा सौदा और इसके प्रमुख के खिलाफ खबरें दीं और अपनी ईमानदारी, बहादुरी और निष्पक्षता पर खुद ही अपनी पीठ ठोंक रहा है। लेकिन कोई भी यह नहीं बताता कि यह केस तो पिछले पंद्रह साल से चल रहा था, तब मीडिया का रुख क्या था? कोई यह नहीं बताता कि जब रामपाल को घेरने के लिए पुलिस को नाकों चने चबाने पड़े थे, तब उसके अलावा किसी और डेरे या बाबा की छानबीन क्यों नहीं की गई? यह बहुत अच्छी बात है कि गुरमीत राम रहीम को बलात्कार के दो अलग-अलग मामलों में 10-10 साल की सजा सुना दी गई है, जो एक के बाद एक चलेंगी यानी राम रहीम के अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए उसे 20 साल की कैद तथा 15-15 लाख के जुर्माने की सजा सुनाई गई है, लेकन मीडिया में यह कोई क्यों नहीं बताता कि अब भी सारा फोकस केवल अकेले गुरमीत राम रहीम पर ही क्यों है? क्या देश में अन्य सभी नकली बाबा खत्म हो गए हैं? और मीडिया ही क्यों, इन पंद्रह सालों में सारे मानवाधिकार संगठन और महिला संगठन क्या कर रहे थे? कितने संगठन प्रताडऩा की शिकार इन दो महिलाओं के समर्थन में आए?
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब एक समाज के रूप में हम भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लेते हैं, उसके खिलाफ आवाज उठाना बंद कर देते हैं तो वस्तुत: हम इस बात की उपेक्षा कर रहे होते हैं कि लोग असफल क्यों होते हैं, समाज का पतन क्यों होता है और इसकी रोकथाम कैसे की जा सकती है। जब तक हम इन बाबाओं के उदय के मूल कारण पर विचार नहीं करके समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचेंगे, तब तक हम समस्या का समाधान भी नहीं कर सकते। समाज में बढ़ते भ्रष्टाचार के बीच निरंतर कमजोर और असहाय होता नागरिक, अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई, राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकारियों की असंवेदनशीलता, समाज में छूआछूत और गैर बराबरी का बोलबाला आदि ऐसी व्याधियां हैं जिनके कारण ये बाबा लोग फलते-फूलते हैं। अमीर से अमीर आदमी भी गुरुद्वारे में सबके साथ जमीन पर बैठकर लंगर छकता है, लेकिन अपने घर में या दफ्तर में वह अपने सहकर्मियों के साथ बराबरी का व्यवहार नहीं करता। बाबाओं के डेरे में गरीब-अमीर का फर्क खत्म हो जाता है, सब बराबर हो जाते हैं और अमीर आदमी सहज ही एक गरीब, कमजोर और साधनहीन गुरुभाई की सहायता को तैयार रहता है। अपने राजनीतिक और प्रशासनिक संपर्कों के चलते गुरु की गद्दी पर बैठा व्यक्ति अपने शिष्यों के कई काम करवा देता है।
बाबाओं के पास जो भीड़ जमा होती है, उसके मूल में दुख है, अभाव है, गरीबी है या अशांति है। कोई बेटे से परेशान है, कोई बहू से, कोई नौकरी से, कोई जमीन के झगड़े में फंसा है और किसी को कोर्ट-कचहरी के चक्कर में जायदाद बेचनी पड़ गई है। या तो धन ही नहीं है और अगर धन है, तो शांति नहीं है। ऐसे में धर्मभीरु व्यक्ति ज्योतिषियों और बाबाओं की शरण में जाता है। राम रहीम जैसे गुरुओं का उत्थान इस ओर इंगित करता है कि सरकारें, राजनीति और परंपरागत धर्म लोगों की एक बड़ी संख्या को संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं, इसलिए वे कुछ सम्मान और बेहतर जीवन की आस में डेरा सच्चा सौदा जैसे अपरंपरागत पंथ की ओर चल पड़ते हैं। इससे यह भी पता चलता है कि एक समाज के रूप में हम अंदरूनी रूप से कितने ज्यादा बंटे हुए हैं। परिणाम यह है कि राम रहीम जैसे गुरु अपनी सामानांतर सत्ता चला सकते हैं और अपने सामने अकसर सरकारों को भी बेबस बना सकते हैं। चिकित्सा जगत की भाषा में कहें, तो यह प्लैसिबो इफेक्ट है, जो उन्हें शांति प्रदान करता है। होम्योपैथी में हर दवाई का आधार मीठा है। डाक्टर लोग कई बार सिर्फ मीठा आधार ही दे देते हैं, जिसे मरीज दवाई समझ कर खाता है और ठीक महसूस करता है। यही तब होता है जब हम किसी किसी बाबा की शरण में जाते हैं। यह धर्म का प्लैसिबो इफेक्ट है।
बड़ा सवाल यह है कि एक समाज के रूप में हमें अब क्या करना चाहिए? बाबाओं की छानबीन, उनकी वैध-अवैध संपत्तियों, अवैध आश्रमों पर रोक, उनके कहने पर मतदान, मानवाधिकार संगठनों, महिला संगठनों के कामकाज की गहन छानबीन, असत्य का विरोध, भ्रष्टाचार का विरोध, क्षेत्र-धर्म-भाषा के नाम पर मतदान आदि पर रोकथाम के लिए सघन प्रयास ही हमारी सामाजिक व्याधियों का समाधान है। आशा की जानी चाहिए कि हमारा बुद्धिजीवी वर्ग अब जागेगा और इस ओर निश्चित प्रयास आरंभ करेगा।

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