हमारे देश को प्रयोगशाला बनाकर नये-नये प्रयोग करते जाने की राजनीतिज्ञों की पुरानी परम्परा है। जब किसी प्रयोग पर करोडों-अरबों रूपया व्यय हो जाता है तो फिर उसे भुला दिया जाता है या जब उस प्रयोग के गलत परिणाम राजनीतिज्ञों को मिलने लगते हैं तो उन्हें जनता को न बताकर चुपचाप उस योजना को ही बट्टे खाते में डाल दिया जाता है।
अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘स्वच्छता अभियान’ अपने प्रशंसनीय स्तर पर कारगर सिद्घ हो रहा है। इसकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम होगी। साफ सफाई हमारा राष्ट्रीय संस्कार बनना ही चाहिए। प्रधानमंत्री श्री मोदी की भावना भी बड़ी पवित्र है-सरकार को इस ओर ध्यान देना ही चाहिए। इस अभियान की सफलता का प्रमाण ये है कि अब हमें रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड आदि सार्वजनिक स्थलों पर पहले की अपेक्षा बहुत अधिक सफाई दिखायी देने लगी है। अब लोग कुछ भी खा-पीकर दौने फेंकने के लिए डस्टबिन खोजते दिखाई देते हैं। उन्हें कहीं भी फेंकने में लोगों को शर्म आने लगी है। लोगों को लगने लगा है कियदि इन्हें हम कहीं भी फेंक देंगे तो माना जाएगा कि हम सभ्य नहीं हैं, या हम सफाई अभियान में सहयोग नहीं कर रहे हैं। जब ऐसी भावना कार्य में परिणत हो जाती है तो समझना चाहिए कि हम कुछ नया सीख भी रहे हैं और उसे अपना भी रहे हैं। दौने को डस्टबिन तक पहुंचाकर लोग ऐसा अनुभव करते हैं कि जैसे वह भी प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छता अभियान’ में सम्मिलित हो गये हैं। इससे पता चलता है कि पीएम मोदी ने राजनीतिज्ञों के प्रति उठते जनविश्वास को स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है और साथ ही जनता ने उन्हें जननायक भी मान लिया है-यह भी स्पष्ट है।
इस सबके उपरान्त भी प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छता अभियान’ में कुछ खामिया हैं। उनकी ओर भी ध्यान दिया जाना अति आवश्यक है। प्रधानमंत्री से देश को बहुत अपेक्षाएं हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी यह देखें कि उनके मंत्री, सांसद और प्रदेशों के मुख्यमंत्री, उनके मंत्री और विधायक लोग इस कार्यक्रम को सफल बनाने में सचमुच रूचि ले रहे हैं या नहीं। इस देश में अधिकांश जनप्रतिनिधि केवल नाटक करते हैं-वे दिल से किसी अभियान के साथ खड़े नहीं होते हैं, वे केवल झाडू लेकर सफाई अभियान में सहयोगी होने का नाटक करते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और उस फोटो को अपने नेता के पास किसी प्रकार से पहुंचवाकर ही अपने कत्र्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। प्रधानमंत्री मोदी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के उस वक्तव्य को कांग्रेस को घेरने के लिए इस समय कई बार प्रयोग कर चुके हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी भी योजना का 85 प्रतिशत पैसा ऊपर ही समाप्त हो जाता है। गांव तक जाते-जाते वह 15 पैसा रह जाता है। राजीव गांधी का यह वक्तव्य उनकी भ्रष्टाचार के प्रति पकड़ और सोच को स्पष्ट करता है। यह अलग बात है किवे उस पर अंकुश नहीं लगा पाये। यह उनका कम और व्यवस्था का दोष अधिक था। फिर भी प्रधानमंत्री मोदी उनके कथन का राजनीतिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं-वह कांग्रेस को कैसे घेरें?-ये उनका अधिकार है। हमने यह प्रसंग इसलिए उठाया कि जो स्थिति प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय थी-वही आज है। भ्रष्टाचार किसी भी सरकारी कार्यालय में या विभाग में पहले की भांति ही फलफूल रहा है। न्यायालयों तक में इसमें कहीं कमी नही आयी है। जब न्याय के मंदिर ही न्याय को बेच रहे हों तो मानना पड़ेगा कि व्यवस्था भी स्वच्छता चाहती है। पर व्यवस्था में बैठे लोग केवल झाड़ू हाथ में लेकर उसका फोटो खिंचवाते हैं और सफेद कपड़ों में काला दिल लिए हुए ये जनप्रतिनिधि थोड़ी देर में वहां से रफूचक्कर हो जाते हैं। प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे ऐसी प्रवृत्ति पर रोक लगाते हुए जनप्रतिनिधियों को कत्र्तव्य के प्रति जागरूक करें।
इस समय हमारे देश की नदियों को और विशेषत: गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने की ओर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है, इसे भी हम उचित मानते हैं। परन्तु जितना शोर है उतना काम नहीं है। ‘नाटक अधिक और काम कम’- यह प्रवृत्ति ही तो कांग्रेस को सत्ता से बाहर ले गयी थी और वही वह प्रवृत्ति थी जिसने नेताओं और अधिकारियों को समाचार पत्रों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में विज्ञापन दे-देकर सरकारी पैसे को विज्ञापनों पर व्यय करने के लिए प्रेरित किया और अपनी पीठ अपने आप थपथपाकर वे स्वयं ही खुश होते रहे कि इस योजना के इस प्रकार प्रचार-प्रसार से उनकी वोटों की फसल लहलहा रही है। पीएम मोदी देखें कि ऐसी प्रवृत्ति कहीं आज भी तो जीवित नहीं है? हमारा मानना है कि वह प्रवृत्ति मरी ही नहीं थी तो जीवित रहने का या न रहने का कोई प्रश्न नहीं है। सारी सम्भावनाएं हैं कि वह जीवित है। इस प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगना चाहिए। सरकार अपनी योजना का प्रचार-प्रसार करे और उसका राजनीतिक लाभ ले, यह उसका अधिकार हो सकता है-पर हमारा पैसा योजनाओं के सही रूप से क्रियान्वयन पर ही व्यय हो-यह लोगों का मौलिक अधिकार है।
जहां तक नदियों को प्रदूषण मुक्त करने की बात है तो इनके विषय में यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक नदी को नाले प्रदूषित करते हैं। इन नालों को जब तक नदियों से जोडऩा जारी रहेगा तब तक नदियां प्रदूषण मुक्त नहीं हो सकतीं। ऐसे में नदियों को प्रदूषण मुक्त करने की बात केवल नाटक बाजी ही बनकर रह जाती है। राजनीतिक लोग नालों को प्रदूषण मुक्त करने की बात कहें तो इससे उनका उपहास उड़ेगा कि कैसी मूर्खता की बात कर रहे हैं, भला नाला भी प्रदूषण मुक्त हो सकता है? तब वे नदियों को प्रदूषण मुक्त करने की बात कहने लगते हैं। कहने का अभिप्राय है कि चोर (नाला) अपना काम करता रहेगा और ये कहेंगे कि हमने चोरी रोक दी है, मूर्ख बनाने का कितना सस्ता तरीका है? इस तरीके के चलते ही कानपुर के सारे बूचड़खाने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार की नाक के नीचे चल रहे हैं और वे गंगा को मैला कर रहे हैं। सरकार ने उन्हें बंद कराकर गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का कौन सा ढंग खोजा है? क्या कोई इसे बता सकता है? क्या ही अच्छा हो कि सरकार इन नालों के पानी को कृषि के लिए प्रयोग करे और पुन: फिल्टर करके उसे पीने योग्य बनाकर लोगों के लिए भेजे। पर नदियों में इस गंदे पानी की एक बूंद भी न पडऩे दे। इससे नदियां स्वयं ही प्रदूषण मुक्त हो जाएंगी। उनकी विमल धारा पीने के काम आने लगेगी। अत: हमारा मानना है कि नदी स्वच्छता अभियान को ‘नाला स्वच्छता अभियान’ का नाम देकर ‘नदियों को बचाओ’ जैसे व्यावहारिक नारे से जोडऩा चाहिए।
अब आते हैं लोगों के खुले शौच पर रोक लगाने की प्रधानमंत्री की सोच पर। यह योजना भी बहुत ही प्रशंसनीय है। विशेषत: महिलाओं के लिए तो यह बहुत ही आवश्यक हो गया था कि उनकी इज्जत बचाने के लिए इस योजना को लागू किया जाए। पर खामियां यहां भी हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि खुले में शौच जाना अपराध नहीं है, अपराध है शौच को खुला छोडऩा। खुले में दूर जंगल में जाकर शौच जाना तो स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त है। सार्वजनिक स्थलों पर या घनी आबादी के बीच खुले में शौच करना दण्डनीय हो, पर गांव देहात में लोगों को सुबह की सैर करने और दूर जंगल में जाकर शौच करने के लिए भी प्रेरित किया जाए। यह वैदिक परम्परा है, इसे आधुनिकता के व्यामोह में भूलना भी गलती होगी। हमारे पूर्वज दूर जंगल में सुबह की सैर करते हुए जाते थे और वहीं एकान्त में गड्ढा खोदकर शौच करते थे। उसके पश्चात उस गड्ढे को भर देते थे अर्थात ‘गंदगी पर मिट्टी डाल देते थे।’ आज भी देहात में ‘गंदगी पर मिट्टी डालने’ का मुहावरा प्रचलित है। उसका अर्थ समझने की आवश्यकता है। गंदगी पर मिट्टी डालने से मनुष्य का मल वायु को प्रदूषित नहीं करता था। साथ ही वह मिट्टी की उर्वराशक्ति को बढ़ाता था। तीसरे, वह किसी की नजर नहीं आता था, जिससे उस पर किसी का पैर नहीं पड़ता था। चौथे उस मल को बहाने के लिए पानी की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। जैसा कि आजकल पांच सदस्यों के परिवार को अपने घर में मल को बहाने के लिए ही कम से कम 10 बाल्टी पानी की प्रतिदिन आवश्यकता होती है। इसके पश्चात भी वह मल सीवरेज से या गन्दे नाले से बहकर जब नदियों में जाता है तो वह उल्टे उन्हें प्रदूषित करता है। सेफ्टी टैंक से भी गंदा पानी रिस-रिसकर हमारे भूगर्भीय पेयजल को प्रदूषित कर रहा है। जिससे आंतों की बीमारियां और कैंसर जैसा प्राणलेवा रोग देश में फैल रहा है। आर. ओ. की खोज करके कुछ कंपनियों की तो चांदी कट रही है-पर यह आरओ तो साधन संपन्न लोगों के घर की चीज है। गरीबों के लिए हम क्या कर रहे हैं?- उन्हें तो प्रदूषित पानी पीने के स्वतंत्र छोडक़र उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। वे मर रहे हैं और साधन सम्पन्न लोग मौज कर रहे हैं। संभवत: ‘गरीबी हटाने’ का सही ढंग देश के स्वच्छता अभियान में लगे लोगों को मिल गया है। चोरी रोकनी है तो पीएम महोदय चोर को ही मारना होगा। यह व्यंग्य नहीं है-यह तो इस लेखनी का दर्द है, जिसे देश के करोड़ों संजीदा लोग अनुभव कर रहे हैं। उनकी आवाज को आप सुनें और स्वच्छता अभियान की कमजोरियां व खामियों पर भी ध्यान दें लोगों को आपसे बहुत उम्मीद है।

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