वैदिक धर्म में मकर संक्रांति की वैज्ञानिकता

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[15/01, 12:11 pm] Dr. DK Garg G greno: मकर संक्रान्ति
मकर संक्रांति भारत का प्रमुख पर्व है। मकर संक्रांति (संक्रान्ति ) पूरे भारत और नेपाल में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है।
तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। किन्तु मकर संक्रान्ति उत्तरायण से भिन्न है।यह पर्व बहुत चिरकाल से चला आता है। यह भारत के सब प्रांतों में प्रचलित है अतः इसको एकदेशी न कहकर सर्वदेशी कहना चाहिए। सब प्रांतों में इसके मनाने की परिपाटी में भी समानता पाई जाती है।
प्रचलित पौराणिक कथा:–इस पर्व की एक कथा भी प्रचलित है कि भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं और शनि मकर राशि के स्वामी है। इसलिए इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। पवित्र गंगा नदी का भी इसी दिन धरती पर अवतरण हुआ था, इसलिए भी मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन की गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते है सागर में जा मिली थीं। इसीलिए आज के दिन गंगा स्नान का महत्व भी है।
वैज्ञानिक कारणः
पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। इस दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा बदलता है, थोड़ा उत्तर की ओर ढलता जाता है। इसलिए इस काल को उत्तरायण भी कहते हैं।
प्रभु के नियम से हमारी पृथिवी सूर्य को केन्द्र बनाकर उसकी निरन्तर परिक्रमा कर रही है। यह पृथिवी जितने समय में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है उतने समय को एक सौर वर्ष कहा जाता है। सूर्य की जिस वर्तुलाकार परिधि पर पृथिवी परिभ्रमण करती है उस घेरे के १२ भाग कल्पित कर लिये गये हैं। उन १२ भागों के नाम मेष, वृष,मिथुन व कर्क आदि रखे गये हैं। ये नाम घेरे रूप क्रान्तिवृत्त के १२ स्थानों पर आकाशस्थ नक्षत्रपुञ्जों से मिलकर बनी हुई, उनसे कुछ मिलती जुलती आकृति वाले पदार्थों के नाम पर रख लिये गये हैं। जैसे कि नक्षत्रपुञ्जों से बनी हुई कोई आकृति यदि मकर से मिल रही है तो उस भाग को मकर कहते हैं। इन आकृतियों वाले १२ भागों को राशि कहते हैं। जब पृथिवी इस क्रान्तिवृत्त पर एक राशि से दूसरी राशि में गति करती है तब उसे संक्रान्ति कहते हैं। इसमें मकर राशि की संक्रान्ति होने से यह पर्व मकर संक्रान्ति कहलाता है। मकर संक्रान्ति होते ही पृथिवीवासियों को सूर्य ६ मास तक उत्तर की ओर उदय होता हुआ दृष्टिगोचर होने लगता है। ६ मास के इस काल को उत्तरायण काल बोलते हैं। इसी प्रकार कर्क राशि की संक्रान्ति से दक्षिणायन आरम्भ हो जाता है।सूर्य के प्रकाशाधिक्य के कारण उत्तरायण को महत्त्व प्राप्त है।उत्तरायण काल के छः मास में सूर्य का राज्य विशेष होता है , इसलिये उत्तरायण प्रकाश है, ज्ञान है।
ज्योतिष के आचार्य बतातें हैं कि उत्तरायण का आरम्भ मकर संकान्ति के दिन से पहले हो जाता है परन्तु मकर संक्रान्ति पर्व पर ही दोनों पर्व एक साथ मनाये जाने की परम्परा चली आ रही है। भविष्य में इन्हें अलग अलग तिथियों पर मनायें जाने पर विचार भी किया जा सकता है। जो भी हो इस पर्व को मनायें जाने का मुख्य उद्देश्य मकर संक्रान्ति का ज्ञान कराने सहित 6 माह की अवधि वाले उत्तरायण के आरम्भ से है जिससे लोग हमारे पूर्वजों के ज्योतिष विषयक ज्ञान व रुचि से परिचित हो सकें।
मकर संक्रान्ति के अवसर पर शीत अपने यौवन पर होता है। जनावास, जंगल, वन, पर्वत सर्वत्र शीत का आतंक छा रहा है, चराचर जगत शीतराज का लोहा मान रहा है, हाथ पैर से सिकुड़ जाते है, “रातों जानु दिवा भानुः” रात्रि में जंघा और दिन में सूर्य, किसी कवि की यह उक्ति दोनों पर आजकल ही पूर्णरूप से चरितार्थ होती है। दिन की अब तक यह अवस्था है कि सूर्यदेव उदय होते ही अस्ताचल के गमन की तैयारियाँ आरम्भ कर देते है। मानो दिन रात्रि में लीन हुआ जाता है। रात्रि सुरसा राक्षसी के समान अपनी देह बढ़ाती ही चली जाती थी। अन्त में उसका भी अन्त आया। आज मकर संक्रान्ति के मकर ने उसको निगलना आरम्भ कर दिया। आज सूर्यदेव ने उत्तरायण में प्रवेश किया। इस काल की महिमा संस्कृत साहित्य में वेद से लेकर आधुनिक ग्रंथ सर्वशेष वर्णन किया गया है। वैदिक ग्रंथों में उसको ‘देवयान’ कहा गया है।
आजीवन ब्रह्मचारी भीष्म पितामह ने इसी उत्तरायण के आगमन पर शर-शैय्या पर शयन करते हुए प्राणोत्क्रमण की प्रतीक्षा की थी। ऐसा प्रशस्तियाँ किसी पर्वता (पर्व बनने) से कैसे वन्चित रह सकता था।
प्रचलित कथानक का आध्यात्मिक विश्लेषण:
इस कथा में अलंकार की भाषा का प्रयोग हुआ है। जिसके मुख्य बिंदुओ पर ध्यान देः
पौष मास : भरी सर्दियों के अंतिम माह में को पौष मास कहते हैं
२ भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने गएः इसका तात्पर्य ये है की लंबी चलने वाली सर्दियों में इस माह से धरती पर पड़ने वाली शनै शनै सूर्य की किरणे पिछले माह से ज्यादा तीव्र और मोहक और लाभदायक होती है। स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में ईश्वर के सौ से ज्यादा नामो की व्याख्या की है जिनमे ईश्वर का गुणों पर आधारित एक नाम शनि भी और सूर्य भी है और हम सभी ईश्वर की संतान है। इसलिए इस कथा में कहा है की ृृसूर्य भगवान अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं‘‘
3 शनि मकर राशि के स्वामीः मकर में कुछ विशेष गुण होते है,और सूर्य की मीठी धूप से ऊर्जा ग्रहण करता है इसी प्रकार छोटा सा दिखने वाला मानव भी सूर्य की ऊर्जा पाकर तेजस्वी बनता है।
4 मकर संक्रांति के दिन की गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते है सागर में जा मिली थीं का मतलब है की पहाड़ो पर सर्दी के कारण जमी हुई पिघलने लगती और और नीचे ली तरफ नदियों द्वारा प्रवाहित होती हुई गांव और शहरों से निकलती हुई सागर में जा मिलती है।
5.आज के दिन गंगा स्नान –पौराणिक कथानक में अलंकार की भाषा के प्रयोग के कारण अज्ञानतावश इस दिन गंगा स्नान का प्रचलन शुरु हुआ। लेकिन ये हमारी अज्ञानता का सूचक है।भरी सर्दी में गंगा स्नान से कोई मुक्ति नहीं मिलने वाली है उल्टे बीमारी का खतरा ही है।
कबीर दास सदियों पहले कह गये थे,
नहाए धोए क्या भया, जो मन मैल न जाय।
मीन सदा जल में रहे, धोए बास न जय।।‘‘
अर्थात् मछली हमेशा जल में रहती है, लेकिन इतना धुलकर भी उसकी दुर्गंध समाप्त नहीं होती। उसी तरह, अगर मन ही मैला है तो शरीर को नहलाने और स्वच्छ करने से क्या हासिल होगा ? आवश्यक है कि अंदर के विकार और कलुष को मिटाया जाये !
सर्दियों में समाप्त होने के समय शरीर से चर्म रोग होने की सम्भवना अत्यधिक होती है ,और इस समय पहाड़ो से सस्ने वाला शीतल जल औषधि युक्त होता है जिसमे नहाने से चर्म रोगो में लाभ मिलता है इसलिए आज से निरंतर स्नान की सलाह दी जाती है।
जीवन को उत्तरायण की ओर ले चलने के संकल्प का प्रेरक पर्व मकर संक्रान्ति को माना गया है —
मृत्युञ्जयी भीष्म पितामह ने अपने देह का त्याग करने के लिये उत्तरायण के आगमन तक प्रतीक्षा की थी। अध्यात्म के क्षेत्र में ज्ञान रूपी सूर्य का आत्मा से सीधा सम्बन्ध है। न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ज्ञान के सदृश पवित्र कुछ नहीं है और ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं है। इस ज्ञान के प्रकाश से जीवन उत्तरायण की ओर अग्रसर होता जाता है। ऐसे जीवन का धनी जब भी शरीर छोड़ता है तब उसे प्रभु की व्यवस्था से तद्विशिष्ट गर्भ अगले उत्तम जीवन के लिये खींचता है अथवा मुक्ति का पात्र होने पर मोक्ष धन को प्राप्त करता है।
अतः सृष्टि की मकर संक्रान्ति रूप घटना से प्रेरित होकर जीवन के उत्तरायण की ओर हम भी संक्रान्ति करें। यह संकल्प ग्रहण करना ही पर्व की पर्वता है।।।
मकर संक्रान्ति पर्व पर पतंग उड़ाने का वास्तविक अर्थ:
यजुर्वेद मे पतंग शब्द के साथ एक मन्त्र आता हैः-
त्रि शद्धाम विराजति वाक् पतङ्गाय धीयते प्रति वस्तोरह द्युभिः द्यद्य (यजुर्वेद का तृतीय अध्याय मन्त्र संख्या 8)
कहते हैं कि इस मन्त्र के जाप पाठ से सिद्धि मिलती है और इसीलिये मकर संक्रान्ति के दिन पतंग उड़ाई जाए, यानी इस मन्त्र का जाप करें।
वास्तविकता क्या है?
मन्त्र का जाप, पाठ इस वेद के कर्मकाण्ड मे नहीं है अतः इस मन्त्र के जाप-पाठ से हवन करने पर भी सिद्धि नहीं मिलती। यजुर्वेद कर्म का वेद है, इसका मतलब है कि ज्ञान पाकर कर्म करने से सिद्धि मिलती है। धार्मिक विद्वानों के संग, शिल्पक्रिया सहित विद्याओं की सिद्धि, श्रेष्ठ विद्या-गुण का दान आदि का नाम यजुर्वेद है।
तो अब प्रश्न है कि वेद मन्त्र में आये पतंग पद का भावार्थ क्या है ??
उत्तरः-महर्षि दयानन्द जी ने इस पतङ्गाय पद का अर्थ किया है ‘‘पतति गच्छतीति पतङ्गस्तस्मा अग्नये (धीयते) धार्यताम्‘‘ अर्थात् चलने चलाने आदि गुणों से प्रकाशयुक्त अग्नि के लिए ध् पतन-पातन आदि गुणों से प्रकाशित एवं गतिशील अग्नि के लिए।
मनुस्मृति के श्लोक (1ध्21) के अनुसार “संसार की सारी वस्तुओं के नाम, कर्मों के नाम का मूल-आदि-स्रोत वेद है” ।
वेद में से ले लेकर सारे पदार्थों वस्तुओं स्थानों का नामकरण हुआ क्योंकि उस-उसमें वह समान गुण थाध्है ।
वर्त्मान में जो पतंग दिखती या उड़ती हैं उनका नाम इसलिए है क्यों की उसमें निम्न गुण हैंः-
१) चलने चलाने का गुणध्पतन-पातन आदि गुण
२) गतिशील
एक बार फिर मन्त्र पाठ करें —
त्रि शद्धाम विराजति वाक् पतङ्गाय धीयते प्रति वस्तोरह द्युभिः
आज के दिन पतंग उड़ाने का वास्तविक भाव है कि मकर संक्रान्ति के दिन जब नई फसल के बीज प्रस्फुटित होते ही, धरती पर उत्तरायण का खुशनुमा मौसम आने वाला हो तो हम अपनी भावी कार्यों की योजना बनाये और उसको गतिशीलता प्रदान करने का संकल्प लें। हमारी योजनाये और विचारों का प्रवाह ऐसा जो आकाश की ऊंचाइयों को छुए।मनुष्य के ऊंचा उठने की सीमा आकाश होनी चाहिए। दृढ़ संकल्प ही उन्नति का आधार है। नए और रचनात्मक कार्यों का संकल्प लेकर उन पर क्रियाशील होने का संकेत है ये पर्व। यह अच्छा और महत्वपूर्ण संदेश है।
पतंग उड़ाते रहो ईश्वर साथ है, हर पल मदद करने हेतु। वर्तमान में इसका अर्थ कागज की पतंग से कर दिया है। आप ‘‘पतंग‘‘आप उड़ा रहे हैं तो इसका वास्तविक अर्थ समझें कि यह पतंग शब्द वैदिक है ।
प्रश्नः जब ‘‘दक्षिणायन‘‘ लगता है तब उत्तरायण की तरह उसे क्यों नहीं मनाया जाता?
इसका उत्तर है जैसे कि रात की अपेक्षा दिन कार्य करने के लिए उत्तम है वैसे ही शास्त्र कारों और उपनिषद कारों ने भी दक्षिणायन की अपेक्षा उत्तरायण को विभिन्न प्रकार के संस्कारों को संपन्न कराने के लिए उपयुक्त माना है।
इस पर्व की वास्तविक तिथि क्या है-
ये पर्व हम हर वर्ष १४ जनवरी को मनाते है जबकि उत्तरायण तो १ पौष तदनुसार २२ दिसम्बर को प्रारंभ हो जाता है।अतः वास्तव में ये पर्व तो २२ दिसम्बर से प्रारंभ होते हैं बडे दिन के रूप में। मकर राशि में सूर्य २२ दिसम्बर को प्रवेश करता है। यंत्र महल (जन्तर मंतर) उज्जैन के भूतपूर्व अधीक्षक सुप्रसिद्ध ज्योतिषी पुरुषोत्तम शास्त्री के अनुसार मकर संक्रान्ति २२ दिसम्बर अर्थात् १ पौष को ही मनानी चाहिए जब हेमन्त ऋतु का अंत और शिशिर का प्रारंभ होता है। आयुर्वेद की मान्यता के अनुसार भी शिशिर ऋतु से उत्तरायण का आरंभ बताया है।
पर्व के मनाने का ढंगः भारत के सभी प्रान्तों में अपने अपने तरीके से इस पर्व पर शीत के प्रभाव को दूर करने के उपाय किये जाते दिखाई देते हैं। वैद्यक शास्त्र ने शीत के प्रतीकार के लिए तिल, गुड़, तेल, तूल (रूई) का प्रयोग बताया है। तिल इन तीनों में मुख्य हैं। पुराणों में तिल के महत्व के कारण कुछ अतिश्योक्ति कर इसे पापनाशक तक कह दिया गया।
किसी पुराण का प्रसिद्ध श्लोक है ‘तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमो तिलोदकी। तिलभुक् तिलदाता च षट्तिला पापनाशनाः।।’
अर्थात् तिल-मिश्रित जल से स्नान, तिल का उबटन, तिल का हवन, तिल का जल, तिल का भोजन और तिल का दान ये छः तिल के प्रयोग पापनाशक हैं। मकर संक्रान्ति के दिन अक्सर तिल और गुड़ के लड्डू बनाकर दान किये जाते हैं और ईष्ट मित्रों में बांटे जाते हैं। तिल को कूट कर उसमें खांड मिलाकर भी खाते हैं। यह एक प्रकार से मिष्ठान्न की भांति रुचिकर होता है।
महाराष्ट्र में इस दिन तिलों का ‘तिलगुल’ नामक हलवा बांटने की प्रथा है और सौभाग्यवती स्त्रियां तथा कन्याएं अपनी सखी-सहेलियों से मिलकर उन को हल्दी, रोली, तिल और गुड़ भेंट करती हैं। यह पर्व प्राचीन भारत की संस्कृति का दिग्दर्शन कराता है जिसका प्रचलन स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर भी किया गया है। प्राचीन रोमन लोगों में मकर संक्रान्ति के दिन अंजीर, खजूर और शहद अपने ईष्ट मित्रों को भेंट देने की रीति थी। यह भी मकर संक्रान्ति पर्व की सार्वत्रिकता और प्राचीनता का परिचायक है।
इस दिन खिचड़ी का सेवन करने का भी वैज्ञानिक कारण है। खिचड़ी पाचन को दुरुस्त रखती है।अदरक और मटर मिलाकर खिचड़ी बनाने पर यह शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है और बैक्टीरिया से लड़ने में मदद करती है।
इस दिन यज्ञ करने का भी विधान किया गया है।यज्ञ करने से वातावरण दुर्गन्धमुक्त होकर सर्वत्र सुगन्ध का प्रसार करने वाला होता है।यज्ञ के गोघृत व अन्न-वनस्पतियों की आहुतियों का सूक्ष्म भाग वायुमण्डल को हमारे व दूसरे सभी के लिए सुख प्रदान करने में सहायक होता है। आर्यपर्व पद्धति में यज्ञ करते हुए हेमन्त और शिशिर ऋतुओं की वर्णनपरक ऋचाओं से विशेष आहुतियों का विधान किया गया है जिससे यज्ञकर्ता व गृहस्थी उनसे परिचित हो सकें।
विधि की क्या विडम्बना है जिस देश ने समस्त विश्व को ज्योतिष् का ज्ञान दिया , वह स्वयं ज्योतिष् वेदाङ्ग की अवहेलना कर रहा है।
पर्व विधि:
ऽ सामूहिक यज्ञ -सुबह और सायकाल को करें
ऽ यज्ञ सामग्री में टिल और गुड़ जरूर मिलाये
ऽ खिचड़ी का सेवन करें और खिचड़ी और इसको बनाने का सामान वितरित करे
ऽ जो लोग सर्दी के कारण व्यायाम और स्नान आदि नहीं कर रहे है वे अब स्नान और व्यायाम सुरु कर दे
[17/01, 8:20 am] Dr. DK Garg G greno: गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म =एक विस्तृत अध्ययन
पार्ट 1
Dr DK Garg

Note -यह आलेख महात्मा बुद्ध के प्रारम्भिक उपदेशों पर आधारित है। ।और विभिन्न विद्वानों के विचार उपरांत है। ये 6 भाग में है।

इसको पढ़कर वे पाठक विस्मय का अनुभव कर सकते हैं जिन्होंने केवल परवर्ती बौद्ध मतानुयायी लेखकों की रचनाओं पर आधारित बौद्ध मत के विवरण को पढ़ा है ।

कृपया अपने विचार बताए।

क्या बुद्ध ने कभी ये कहा की वह भगवान् है ?

बुद्ध ने कभी ये नहीं कहा कि वे भगवान है, और ना ही कभी सीधे सीधे ये कहा कि भगवान नहीं है। वे नहीं चाहते थे कि इस सवाल के चक्कर में पड़ा जाए। बुद्ध का दर्शन आस्तिकों और नास्तिकों, दोनों के लिए है। लेकिन उनके दर्शन में से ज्ञान के मोती लेने के बजाए स्वयं को आस्तिक कहने वालो ने उन्हें खुद भगवान बना दिया गया और बाकि महापुरुषों और अन्य ईश्वर के अस्तित्व को भुलाने पर तुले हैं।
यह ज़िद केवल आज नहीं, यह बुद्ध के वक़्त पर भी थी।

मालुंकयपुत्त भिक्षु बुद्ध के पास पहुँचे और कहा कि जो चौदह बिना जवाब के प्रश्न हैं, उनका उत्तर दें, नहीं तो मैं आपकी सीख को ही छोड़ दूँगा। ये चौदह प्रश्न संसार के अनादि होने या ना होने (Eternal or not), अनंत होने या ना होने (infinite or not), इंसान के शरीर और आत्मा के अलग होने ना होने, और मृत्यु के पश्चात जीवन की आशंका से संबंधित हैं। बुद्ध ने इसके जवाब में एक उदाहरण दिया कि –
किसी आदमी को एक ज़हरीला तीर लगा। उसके परिजन उसे वैद्य के पास लेकर गए ताकि तीर निकाला जाए और उसके दर्द को ख़त्म किया जाए। लेकिन वह इंसान इस बात पर अड़ गया कि मैं तीर तब नहीं निकलवाऊँगा जब तक मुझे यह ना बताया जाए कि तीर किसने चलाया? क्या वह ब्राह्मण था, क्षत्रिय था या व्यापारी? उसका रंग कैसा था? उसका कद कितना था – लंबा था या छोटा? वह तीर सीधा था या मुड़ा हुआ था? जिस धनुष से तीर चला, वह धनुष किस चीज़ से बना था? उसकी प्रत्यंचा कौनसे पदार्थ से बनी थी? और इस तरह वह आदमी तीर के ज़ख्म और दर्द के साथ ही मर जाता है। और इन सवालों का जवाब उस वक़्त भी उसके पास नहीं होता।

सारांश=यदि बुद्ध के साथ हुए वार्तालाप पर ध्यान दे तो उन्होंने बहुत से प्रश्नों के उत्तर टाल दीए जिनको वो अनावश्यक समझते थे। कालांतर में उनके शिष्यों ने गलत अर्थ अपना लिया जैसा की आज भी है की देश में हजारों की संख्या में धर्म गुरु है और उनके शिष्य उन्हें भगवान मानकर उनकी तस्वीर पर माला चढ़ाते है,पूजा करते है,गले में ताबीज डालते है, क्योंकि वे धर्म गुरु इस विषय पर शांत है।इसके दोनो मतलब निकाल सकते है। बुद्ध को संशयवादी या अज्ञेयवादी (agnostic) कह सकते हैं।गौतम बुद्ध चाहते हैं कि आप इन प्रश्नों को छोड़कर पहले अपना तीर निकालें, अपने दुःख का अंत करें।
एक और बात , बुद्ध समाज सुधार के लिए महात्मा बने और अपनी योग्यता से ये कार्य किया,राज पाठ भी छोड़ा ,लेकिन इसका गलत अर्थ नही निकालना चाहिए की वे भगवान थे,भगवान होते तो बिना जंगलों मे गए और बिना राज पाठ छोड़े स्वत ये कार्य कर सकते थे, जिस ईश्वर ने अग्नि ,जल ,वायु ,सूर्य ,समुंद्र ,प्रथ्वी ,जीव जंतु आदि बनाए है उसके लिए ये सब संभव है,जन्म लेने की आवश्यकता नहीं।

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