महामना मालवीय का सपना

सदानंद शाही
अंग्रेजों ने शिक्षा के माध्यम से भारत की चेतना पर काबिज होने का असली कोशिश 1835 में की। लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा की सिफारिश की। 1854 में कलकत्ता विश्वविद्यालय, 1858 में बंबई और मद्रास विश्वविद्यालय बना। 1882 में शिक्षा आयोग बैठा और इसी साल में लाहौर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। 1887 में लार्ड लिटन ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना की। शिक्षा व्यवस्था के द्वारा भारत के मन पर कब्जे की इन्हीं कोशिशों के बीच राष्ट्रीय शिक्षा चिंता ने जन्म लिया। अमृतसर में खालसा कॉलेज बना। रांची में नया कॉलेज बनाने के लिए दान मिला। अलीगढ़ कॉलेज की स्थापना हुई। नवाब रामपुर ने बरेली कॉलेज की स्थापना की। राष्ट्रीय शिक्षा के लिए राजा बलरामपुर आगे आए। विवेकानंद की प्रेरणा से टाटा अनुसंधान केंद्र बना। कहने का अभिप्राय यह कि देश में राष्ट्रीय शिक्षा के लिए वातावरण बन रहा था। देश के विभिन्न हिस्सों के आकाश में राष्ट्रीय शिक्षा के बादल उमड़-घुमड़ रहे थे। महामना मदन मोहन मालवीय ने इसी दौर में काशी हिंदू विश्वविद्यालय का सपना देखा। राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की तीन धाराएं एक साथ सक्रिय थीं। 1904 में मिंट हाउस में काशी नरेश प्रभुनारायण सिंह की अध्यक्षता में महामना ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का प्रस्ताव रखा। श्रीमती एनी बेसेन्ट ने 1907 में ‘यूनिवर्सिटी ऑफ इंडिया’ का प्रस्ताव रॉयल चार्टर के पास भेजा। राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का एक और सपना दरभंगा नरेश रामेश्वर सिंह के मन में पल रहा था। राष्ट्रीय शिक्षा के लिए काशी में यत्नशील ये तीनों धाराएं एक में मिल गईं।
सन 1911 में दरभंगा नरेश रामेश्वर सिंह ने अपने सपने को मालवीयजी के सपने से जोड़ दिया। आगे चल कर श्रीमती एनी बेसेन्ट ने इस महान सपने को अपने सेंट्रल हिंदू स्कूल की ठोस जमीन दी। यह हमें सदैव याद रखना चाहिए। इस तरह एक राष्ट्रीय शिक्षा केंद्र का कारवां मालवीयजी के शुभ्र धवल नेतृत्व में आगे बढ़ गया। देखते-देखते मालवीयजी का यह सपना भारत की जनता की आकांक्षा से जुड़ गया। भारत के इतिहास में एक नया नालंदा जन्म ले रहा था। इसका निर्माता कोई एक राजा-महाराजा नहीं था। एक फकीर इसका नेतृत्व कर रहा था। विश्वविद्यालय की खातिर धन देने के लिए राजा-महराजाओं से लेकर सामान्य जनता तक में होड़ मच गई थी।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना जनता की राष्ट्रीय शिक्षा की आकांक्षा का प्रतीक बन गई थी। यह विश्वविद्यालय सिर्फ अमीरों, राजाओं, महराजाओं और भारत की तत्कालीन सरकार की मदद से नहीं बना, इसके निर्माण में देश की आम जनता का योगदान किसी से कम नहीं है। इनमें भारत के सामान्य स्त्री-पुरुष हिंदू-मुसलमान सब शामिल थे। मुरादाबाद में मालवीयजी के व्याख्यान के बाद एक मुसलमान सज्जन आंखों में आंसू और हाथ में पांच रुपए लिये हुए खड़े हुए और ले जाकर मालवीयजी के चरणों पर रख दिए और कहा मैं बहुत गरीब आदमी हूं, तब भी इस नेक काम में मैं पांच रुपए देता हूं। इस दान से सबकी आंखें डबडबा आईं।
एक दूसरा प्रसंग है। मुजफ्फरपुर में एक भिक्षा मांगने वाली ने अपनी दिन-भर की कमाई दान दे दी। एक व्यक्ति ने अपनी फटी कमीज दान में दे दी, जिसे नीलाम करके धन जुटाया। नीलामी की कमीज खरीदने वाले व्यक्ति ने वह कमीज भी संग्रहालय के लिए वापस कर दी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना एक ऐसी जरूरत थी जिसे देश की असंख्य स्त्रियों ने महसूस किया और अपने गहने तक दान में दे दिए। मदन मोहन मालवीय ने इस राष्ट्रीय कहें, जातीय कहें या कौमी कहें, संस्थान के निर्माण के गौरव में शामिल होने का अवसर हर आम-ओ-खास को दिया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लिए महामना ने जो यात्राएं कीं, वे महात्मा गांधी की दांडी यात्रा की याद दिलाती हैं। दांडी यात्रा से गांधी ने भारत की आम जनता में यह भरोसा और विश्वास जगाया कि वे हीन और तुच्छ नहीं हैं। भारत की आजादी की महान लड़ाई में वे भी बराबर के भागीदार हैं। नमक के साथ गांधी की उठी हुई मु_ी ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देने की महान प्रेरणा बन गई।
इसी तरह काशी हिंदू विश्वविद्यालय भी राष्ट्रीय शिक्षा के नवनिर्माण का प्रतीक बन गया था। अंग्रेजों की यह दलील थी कि भारतीय लोग निर्माण नहीं कर सकते। वे संस्था नहीं चला सकते। देश नहीं चला सकते। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण ने अंग्रेजों की इस दलील का जवाब दे दिया।
महामना ने विश्वविद्यालय के लिए जो ध्येय निश्चित किए थे, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं: एक, हिंदू शास्त्र तथा संस्कृत भाषा के अध्ययन की वृद्धि, जिसके द्वारा भारतवर्ष की प्राचीन सभ्यता में जो कुछ भी श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण था उसकी तथा हिंदुओं की प्राचीन संस्कृति तथा भावनाओं की रक्षा और मुख्यत: हिंदुओं में, और सार्वजनिक रूप से सर्वसाधारण में उसका प्रचार हो सके। दो, कला और विज्ञान की सर्वतोमुखी शिक्षा तथा अन्वेषण की वृद्धि। तीन, आवश्यक प्रयोगात्मक ज्ञान के साथ साथ विज्ञान, शिल्पादि कला, कौशल तथा व्यवसाय संबंधी ऐसे ज्ञान की वृद्धि जिससे देशी व्यवसाय तथा धंधों की उन्नति हो। चार, धर्म और नीति को शिक्षा का आवश्यक या अभिन्न अंग मान कर युवकों में सदाचार का संघटन या चरित्र निर्माण का विकास करना।
विश्वविद्यालय के इस महान उद््देश्य को विश्वविद्यालय के कुल-गीत में बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है- ‘प्रतीचि प्राची का मेल सुंदर।’ इस मेल में बौद्धिकता, तार्किकता और हार्दिकता के मेल का भी आवाहन था।आज हम विश्वविद्यालयों की रैंकिंग को लेकर परेशान रहते हैं। रैंकिग से ज्यादा जरूरी है विश्वविद्यालय की मौलिकता।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय की मौलिकता तार्किकता और हार्दिकता के मेल में है। एक अखिल भारतीय समावेशिता का आग्रह। इस मौलिकता ने भारत को किस-किस रूप में प्रेरित और प्रोत्साहित किया, इसका आकलन होना बाकी है। साहित्य में नवजागरण की चर्चा होती है। हिंदी में छायावादी काव्य को नवजागरण का तीसरा चरण कहा जाता है। छायावाद के एक प्रमुख स्तंभ जयशंकर प्रसाद इसी बनारस में थे। ‘कामायनी’ जैसी महान कृति आई जिसमें श्रद्धा और इड़ा जैसी बिल्कुल नई स्त्रियां दिखाई देती हैं। ऐसी स्त्रियों से पहले हमारा परिचय नहीं था। ये भावी भारत की स्त्रियां थीं।
इन स्त्रियों को गढऩे में काशी हिंदू विश्वविद्यालय की भूमिका थी। कामायनी 1936 में प्रकाशित होती है। 1916 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय बनता है। सह-शिक्षा के साथ शुरू होता है। 1927 में महिला महाविद्यालय की स्थापना होती है। विश्वविद्यालय परिसर में भावी भारत की स्त्रियां (लड़कियां) अवतरित होती हैं। स्त्री मुक्ति भारतीय नवजागरण की चेतना का प्रमुख पहलू है। इस विश्वविद्यालय का इस नजरिये से भी बहुत बड़ा योगदान है। भारत की स्वाधीन चेतना के निर्माण में।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने सौ वर्ष पूरे कर लिये हैं। सौ वर्ष किसी विश्वविद्यालय के लिए बहुत ज्यादा नहीं होते। यदि विश्वविद्यालय को आने वाली शताब्दियों में भी स्वाधीन चेतना का प्रेरणा-स्रोत बने रहना है, देश को शिक्षित मस्तिष्क देना है, तो उसे अपनी मौलिकता बनाए और बचाए रखनी है। संस्थाओं में उठा-पटक चलती रहती है, लेकिन वे अपनी मौलिकता के नाते ही जानी जाती हैं। महामना मदन मोहन मालवीय जानते थे कि असहमति को स्थान दिए बगैर कोई विश्वविद्यालय मौलिक नहीं हो सकता। उनके पास असहमति से संवाद बनाए रखने की अद््भुत सामथ्र्य थी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की पुरानी कार्यवाही पढि़ए- विश्वविद्यालय के संस्थापक पर सवाल उठाए गए। मालवीयजी कभी भी उन सवालों से घबराए नहीं, विचलित नहीं हुए बल्कि आगे बढ़ कर उनसे संवाद किया। यदि उच्च शिक्षा संस्थान का गौरव कायम रखना है तो अन्वेषण के लिए, मौलिकता और नवीनता के लिए तथा असहमति के लिए जगह बनाए रखनी होगी।

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