देश का आधुनिकता और ऐश्वर्य के नाम पर भौतिकवाद ज्यों-ज्यों पांव पसारता जा रहा है-मानव जीवन पर उसका उतना ही घातक प्रभाव पड़ता जा रहा है। उदाहरण के लिए आप ए.सी. को लें। ए.सी. के प्रयोग से निकलने वाली एक घातक गैस मानव स्वास्थ्य को बड़ी गहराई से और घातक रूप से प्रभावित कर रही है। ए.सी. कार में बैठकर चलने वाला एक व्यक्ति जब ए.सी. का प्रयोग करता है तो वह बाहर के दर्जनों लोगों के हिस्से की ठण्डक को अपनी गाड़ी के माध्यम से चूस जाता है। जिससे बाहरी मौसम में और अधिक गरमी बढ़ती है। वास्तव में ए.सी. आदि के अंधाधुंध प्रयोग से ग्लोबल वार्मिंग जैसी एक वैश्विक समस्या का जन्म हुआ है।
इस समस्या को समझने और देखने के कई दृष्टिकोण हो सकते हैं। एक तो यह कि एनसीआर में बैठा व्यक्ति ए.सी. के माध्यम से गाड़ी में ठण्डक में रहने को अपना अधिकार मानता है और यह भी मानता है कि उसने अपनी गाड़ी में पैसे ही इसलिए व्यय किये हैं कि वह उसे अधिक से अधिक विलासितापूर्ण बना सके और अधिक से अधिक आराम का जीवन बसर कर सके।
दूसरा दृष्टिकोण ये हो सकता है कि प्रकृति को अपने अनुकूल बनाकर अर्थात मशीनीकरण के माध्यम से प्रकृति को जैसे चाहें वैसे नचाना मनुष्य का नैसर्गिक अधिकार है, इसलिए ए.सी. का प्रयोग करना मनुष्य का नैसर्गिक अधिकार है, भले ही यह अधिकार वह प्रकृति के साथ अपनी हैकड़ी का प्रयोग करके प्राप्त कर रहा है। एक तीसरा दृष्टिकोण है-यह दृष्टिकोण शुद्घ भारतीय है। इसमें प्रकृति के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ करना अपराध है। प्रकृति के नियमों को और प्रकृति की गति को बाधित करना सर्वथा अतार्किक और अनुचित है। इसमें मानव के लिए मर्यादा स्थापित की गयी है कि प्रकृति को अपने अनुसार मत ढ़ालो, अपितु स्वयं प्रकृति के अनुसार ढ़ले रहो। इससे प्रकृति के साथ तुम्हारी शत्रुता नहीं बढ़ेगी और वह तुम्हारी स्वाभाविक मित्र बनी रहकर रक्षा करती रहेगी।
पहले दृष्टिकोण के चलते मानव समाज को कुछ सुविधाजनक स्थितियां अनुभव होती हैं। मानव का यह स्वभाव है कि वह सुविधाजनक सरलता को, मर्यादा और अनुशासन की कठोरता की अपेक्षा शीघ्र अपना लेता है। यदि शरीर को कठोर परिश्रम करके ठीक अर्थात स्वस्थ रखा जाता है तो उसमें अधिक कठोरता है, मर्यादा है और अनुशासन है। अत: उसे व्यक्ति अपने लिए हेय और त्याज्य मानता है, जबकि जिसमें सरलता है और थोड़ा सा धन व्यय करके जिसे खरीदा जा सकता है-उसे वह आराम से क्रय कर लेता है। इस दृष्टिकोण के चलते संसार में करोड़ों ए.सी.कारों के कारण करोड़ों लोगों का जीना दूभर हो रहा है। लोगों को प्राणलेवा बीमारियां लग रही हैं और सारे समाज को इन ए.सी.कार वालों या गाड़ी वालों ने ‘स्लो पॉयजन’ के माध्यम से मारने की तैयारी कर ली है।
इस प्रकार की समीक्षा करने से पता चलता है कि मानव ने ए.सी.कारों या गाडिय़ों का निर्माण करके मानवता का लाभ न करके उसका अहित ही किया है। ए.सी. गाड़ी को इस प्रकार जब एक व्यक्ति प्रयोग करते हुए सडक़ पर चलता है तो भारतीय मनीषा उसे ‘चोर’ कहती है। पर आधुनिक समाज और उसकी मान्यताएं उसे चोर न कहकर सम्मानित दृष्टि से देखती हैं। भारतीय दृष्टिकोण में किसी दूसरे के हिस्से का खाना तो चोरी है ही साथ ही ऐसे कार्य भी चोरी की श्रेणी के हैं जिन्हें आपके द्वारा करने से अन्य लोगों के जीवन का स्वास्थ्य पर विपरीत और घातक प्रभाव पडऩे की संभावना हो। भारत के ऋषियों ने वैदिक धर्म के जिन सिद्घान्तों को मानवता के लिए हितकर समझा था-उनमें सर्वाधिक उपयोगी सिद्घान्त यज्ञ माना गया है। यज्ञ के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति का यह पवित्र कार्य है कि वह धूल, धुआं, ध्वनि के माध्यम से और मन, वचन एवं कर्म के माध्यम से जितना भी प्रदूषण फैलाता है उतना ही उसे नित्य प्रदूषण को साफ भी करना चाहिए। इस प्रकार के चिन्तन और उत्कृष्ट मानवीय दृष्टिकोण से ही समाज में अनुशासन और शान्ति व्यवस्था स्थापित रह सकती है। आजकल के लोगों ने अपने निहित-स्वार्थ के लिए चोरी की परिभाषा को संकीर्ण कर लिया है वह चोरी करता रहता है और चोरी की परिभाषा ऐसी गढ़ी है कि वह चोर रहकर भी चोर न रहने पाये। इसी प्रकार की परिभाषा के चलते समाज में इस समय भी ऐसे अपराध हो रहे हैं जो अपराध होकर भी अपराध की श्रेणी में नहीं हैं। इन्हीं में से एक अपराध ये है कि मानव ए.सी. कारों या गाडिय़ों का प्रयोग कर रहा है और दूसरों के जीवन जीने के अधिकार का सीधे हनन करते हुए व सीधे मानव समाज के स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव डालते हुए भी उसे वह अपराध मानने को तैयार नहीं है। इस प्रकार की प्रवृत्ति से पता चलता है कि मानव पढ़-लिखकर अपने कत्र्तव्यों से विमुख हो गया है। ऐसी आधुनिकता और पढ़ाई लिखाई का क्या अर्थ रह जाता है जो व्यक्ति को पढ़ा-लिखाकर ऐसा आधुनिक बनाये कि वह दूसरों के जीवन और स्वास्थ्य पर कुठाराघात करता चला जाए? जो लोग आज पढ़-लिखकर ऐसे कार्यों में लगे हैं और जिनके माध्यम से दूसरों के जीवन व स्वास्थ्य पर विपरीत व घातक प्रभाव पड़ रहा है वे मध्यकाल के महमूद गजनी, बलबन, अलाउद्दीन और बाबर आदि ही माने जाने चाहिए। अंतर केवल इतना है कि उन लोगों ने इस समय तलवार से लोगों के गले काटे थे और आज के ये गजनी, बलवन, अलाउद्दीन व बाबर अपनी गाडिय़ों के माध्यम से लोगों के जीवन का हनन कर रहे हैं।
मानव को संवेदनशील बनाना और प्रत्येक व्यक्ति के जीवन व स्वास्थ्य का बड़ी उत्तमता व गम्भीरता से सम्मान करना सिखाना शिक्षा का पहला उद्देश्य है। भारत ऐसी ही शिक्षा को देने का पक्षधर रहा है। प्राचीनकाल से ही मनुष्य को मनुष्य बनाकर समाज के लिए उपयोगी बनाना भारतीय शिक्षा पद्घति का प्रमुख उद्देश्य रहा है। आज के मानव को सभ्य मानव तभी माना जाएगा जब वह दूसरों के जीवन और स्वास्थ्य का सम्मान करना और ध्यान रखना सीख जाएगा। बड़ा आदमी बनता है-बड़ी बातों को अपने आचरण और व्यवहार में अपनाने से। मानव उस समय तक बड़ा आदमी नहीं बन सकता है-जब तक वह समदर्शी नहीं हो जाता है। समता का सुरमा डालकर सभी को समभाव से देखने का अभ्यासी नहीं बन जाता है और जितना वह अपने अधिकारों की रक्षा चाहता है उनके प्रति सदा सावधान और जागरूक रहता है-उतनी ही सावधानी और जागरूकता से वह दूसरों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील नहीं हो जाता है। अच्छा हो कि मनुष्य अपनी चोरी के वैधानिकीकरण करने के स्थान पर नैतिकता का पालन करे। चोरी का वैधानिकीकरणचोरी का वैधानिकीकरण एक महाचोरी है और उसी महाचोरी ने मनुष्य को मनुष्य के प्रति संवेदनाशून्य बनाया है। संवेदनाशून्यता की यही स्थिति मानव समाज को आज पतन की वर्तमान अवस्था तक ले आयी है।

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