इंदिरा की बेरुखी, 2 साल के वरुण संग ससुराल छोड़तीं मेनका… कैसे उजड़ा खुशहाल गांधी परिवार?

कैसे उजड़ा खुशहाल गांधी परिवार

दीपक वर्मा

आपातकाल के बाद, 1977 में इंदिरा गांधी सत्‍ता से बेदखल कर दी गईं। आम चुनाव में हार के बाद इंदिरा अपनी बहुओं, पोते-पोतियों के साथ 12, विलिंगटन क्रेसेंट में शिफ्ट हो गईं। उस दौर में, संजय गांधी की पत्‍नी मेनका ‘सूर्या’ मैगजीन निकालती थीं। अपनी सास के विरोधियों को किनारे लगाने में मेनका ने कोई कसर न छोड़ी। मैगजीन में इंदिरा के विरोधियों के बारे में एक के बाद एक खुलासे छप रहे थे। मेनका की दिलचस्‍पी राजनीति में थी। यह बात किसी से नहीं छिपी थी मगर इंदिरा को तो सोनिया ज्‍यादा भाने लगी थीं। खाने के मेन्‍यू से लेकर साड़ी चुनने तक में इंदिरा, सोनिया से मदद लेती थीं। उस छोटे घर के भीतर गांधी परिवार में बड़ी दरारें पड़ने लगीं। सोनिया को सास से मिल रही तरजीह मेनका की समझ से परे थी। 1980 में संजय गांधी की अकस्‍मात मृत्‍यु के बाद टकराव बढ़ गया। 1982 आते-आते नौबत यहां तक आ गई कि मेनका को घर छोड़ना पड़ा।

दरार तो काफी पहले पड़ने लगी थी…

गांधी परिवार में सत्‍ता की लड़ाई 1980 से काफी पहले शुरू हो चुकी थी। संजय की मौत के बाद घर की बात बाहर आ गई। घर में झगड़े पहले भी हुआ करते थे। एक बार तो मेनका इतनी नाराज हो गईं कि शादी की अंगूठी निकालकर संजय की तरफ फेंक दी थी। इंदिरा इस बात से काफी नाराज हुईं क्‍योंकि वह अंगूठी उनकी मां, कमला नेहरू की थी। नए घर में, सोनिया ने राहुल और प्रियंका के लिए आया नहीं रखवाई। वह खाना खुद बनाती थीं। उसी दौर का एक किस्‍सा है जो बीके नेहरू के सामने हुआ। सोनिया गांधी की जीवनी लिखने वाले रशीद किदवई के अनुसार, अंडा ठीक से फ्राई नहीं होने पर संजय ने सोनिया को खूब सुनाया था। BK नेहरू ने अपनी किताब Nice Guys Finish Second में 12, विलिंगटन क्रेसेंट वाले घर के बारे में लिखा है, ‘सोनिया कुक थीं, मेनका केवल खाती थीं। इंदिरा के दो बेटे और उनकी बीवियों के बीच निश्चित तौर पर सबकुछ ठीक नहीं था।’ मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने भी राजीव और संजय में अनबन का जिक्र किया है।

सोनिया को मिलती तरजीह से खफा थीं मेनका

12, विलिंगटन क्रेसेंट वाले घर में सोनिया और इंदिरा काफी करीब आ गए। सोनिया अक्‍सर खान मार्केट में सब्जियां खरीदती दिख जातीं। घर के पीछे वह ब्रॉकली उगाने लगी थीं। इंदिरा कई मोर्चों पर चुनौतियों से जूझ रही थीं मगर सोनिया की तारीफ का कोई मौका नहीं छोड़ती थीं। सोनिया के प्रति इंदिरा का ऐसा तरजीही रवैया मेनका को रास नहीं आया। आखिर वह भी तो ‘सूर्या’ मैगजीन के जरिए सास की मदद में लगी थीं।

ऐसा नहीं कि सोनिया और मेनका के रिश्‍ते हमेशा तल्‍ख ही रहे। जनवरी 1980 में इंदिरा फिर प्रधानमंत्री बनीं। परिवार 1, सफदरजंग रोड स्थित आवास में शिफ्ट हुआ। उस दौरान मेनका गर्भवती थीं। सोनिया ने उनका खूब खयाल रखा। 13 मार्च 1980 को वरुण गांधी का जन्‍म हुआ। तनाव था मगर उतना नहीं कि कोई बड़ा कदम उठाया जाए। लेकिन दिसंबर 1980 में संजय गांधी की विमान हादसे में मौत के बाद सबकुछ बदल गया।

मेनका को अखर गया इंदिरा का वह फैसला

संजय गांधी ने मध्‍यावधि चुनाव में अमेठी लोकसभा सीट पर बंपर जीत दर्ज की थी। उनकी अचानक मौत के बाद इंदिरा टूट गईं। किदवई लिखते हैं कि संजय की मौत के लिए इंदिरा कभी खुद को जिम्‍मेदार ठहरातीं, कभी मेनका को। विमान हादसे में एक बेटा गंवा चुकी इंदिरा अब राजीव गांधी पर दबाव बना रही थीं कि वह फ्लाइंग करियर खत्‍म कर दें। राजीव ऐसा करने के मूड में नहीं थे लेकिन मां के साथ रहने के लिए छुट्टी ले ली। उधर, मेनका स्‍वाभाविक रूप से खुद को संजय के राजनीतिक उत्‍तराधिकारी के रूप में देख रही थीं। इंदिरा ने मेनका को अपना निजी सचिव बनाने का वादा भी किया था।

मेनका के राजनीति में उतरने की सोनिया ने पुरजोर खिलाफत की। इंदिरा ने भी मेनका के बजाय राजीव को अमेठी से चुनाव लड़ाने का फैसला किया। मेनका को इससे ठेस पहुंची। बाद में उन्‍होंने कहा भी कि संजय की मौत के बाद इंदिरा और परिवार के अन्‍य सदस्‍यों का रवैया उनके प्रति बदल गया था। बकौल मेनका, ‘मैं समझ गई कि मैं उनके लिए बस मेनका थी, और कुछ नहीं।’ मेनका अपने दम पर राजनीति में उतरने की कोशिश में लग गईं।

तल्‍खी बढ़ी और घर छोड़कर चली गईं मेनका

मेनका की उम्र उस वक्‍त बमुश्किल 25 साल रही होगी। संजय की विरासत राजीव के हाथों में जा रही थी। दिसंबर 1980 के बाद से पीएम आवास में झगड़े बढ़ गए। इंदिरा और मेनका छोटी-छोटी बातों पर लड़ पड़ते थे। खुशवंत सिंह ने अपनी आत्‍मकथा में लिखा है कि अनबन इतनी बढ़ गई कि दोनों का एक छत के नीचे साथ रहना मुश्किल हो गया। 1982 में मेनका ने प्रधानमंत्री आवास छोड़ दिया। ऊपर जो तस्‍वीर आप देख रहे हैं, उसमें एक कर्मचारी घर से संजय का पोर्ट्रेट लेकर जाता दिख रहा है।

…और बिखर गया एक खुशहाल परिवार

मेनका ने अगले साल अकबर अहमद के साथ मिलकर राष्‍ट्रीय संजय मंच नाम से पार्टी बना ली। इसी के साथ, इंदिरा के घर में मेनका की वापसी के रास्‍ते बंद हो गए। महज दशक भर पहले तक जो परिवार हंसता-खेलता और खुशहाल था, अब बिखर चुका था। तस्‍वीर उसी वक्‍त की है। गाड़ी में मेनका के साथ वरुण नजर आ रहे हैं।

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