मुलायम सिंह यादव की मैनपुरी सीट के क्या है समीकरण

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अजय कुमार

उत्तर प्रदेश की मैनपुरी लोकसभा सीट बेहद खास है। यह वह सीट है जो यादव परिवार का गढ़ मानी जाती है। इस सीट पर आज तक बीजेपी जीत दर्ज नहीं कर पाई है। 2014 में जब पूरे देश में मोदी लहर थी तब भी इस सीट पर उनका जादू नहीं चला।

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने पिता की सियासी विरासत बचाने के लिए अपनी पत्नी डिंपल यादव को मैदान में उतार कर यह जता दिया है कि वह मैनुपरी को लेकर किसी पर विश्वास नहीं करते हैं। मुलायम की मृत्यु के बाद रिक्त हुई मैनपुरी लोकसभा सीट के लिए होने वाले उप-चुनाव में समाजवादी पार्टी ने डिंपल यादव को मैदान में उतारा तो मुलायम कुनबे के उन लोगों पर वज्रपात हो गया जो इस सीट पर अपनी दावेदारी कर रहे थे। इसमें भतीजे अखिलेश यादव से नाराज चल रहे शिवपाल यादव भी हैं। इसके अलावा इस सीट पर यादव परिवार से ही धर्मेंद्र यादव और तेज प्रताप यादव जैसे नेताओं के नाम चर्चा भी चर्चा में थे, लेकिन अखिलेश ने पत्नी डिंपल पर भरोसा जताया है। इस तरह नेताजी की खास विरासत को अखिलेश यादव अपने परिवार में ही बनाए रखेंगे। यही नहीं डिंपल को जीत दिलाने के लिए समाजवादी पार्टी ने बड़ा दांव चलते हुए पूर्व मंत्री आलोक शाक्य को मैनपुरी का जिलाध्यक्ष बना दिया है।

उत्तर प्रदेश की मैनपुरी लोकसभा सीट बेहद खास है। यह वह सीट है जो यादव परिवार का गढ़ मानी जाती है। इस सीट पर आज तक बीजेपी जीत दर्ज नहीं कर पाई है। 2014 में जब पूरे देश में मोदी लहर थी तब भी इस सीट पर उनका जादू नहीं चला। 2014 और 2019 में मैनपुरी से चुनाव लड़े समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव को ही जीत हासिल हुई। बीच में आजमगढ़ के लिए मैनपुरी छोड़ देने पर भी उनके भतीजे तेज प्रताप यादव ने उपचुनाव जीता था। अब उनके निधन के बाद बीजेपी पूरे दमखम से यहां पर कमल खिलाने की कोशिश में लग गई है। मैनपुरी लोकसभा सीट पर 1952 से लेकर 1971 कांग्रेस को जीत हासिल हुई। 1977 की सत्ता विरोधी लहर में जनता पार्टी ने कांग्रेस के प्रत्याशी को हरा दिया। हालांकि 1978 में यहां उपचुनाव हुए जिसमें कांग्रेस की इस सीट पर वापसी हुई। 1980 में कांग्रेस ने मैनपुरी लोकसभा सीट एक बार फिर गंवा दी और 1984 में उनके प्रत्याशी को एक बार फिर जीत मिली। यह वह साल था जब कांग्रेस को इस सीट पर आखिरी बार जीत मिली थी। 1992 में समाजवादी पार्टी का गठन करने के बाद मुलायम सिंह यादव इस सीट से 1996 में चुनाव लड़े और उन्होंने भारी अंतर से जीत हासिल की। उसके बाद से लगातार हर चुनाव में इस सीट पर समाजवादी पार्टी का ही कब्जा रहा है।

मैनपुरी संसदीय सीट में पांच विधानसभाएं आती हैं। जिनमें मैनपुरी, भोगांव, किशनी, करहल और जसवंतनगर शामिल हैं। आपको बता दें कि जसवंतनगर विधानसभा सीट से मुलायम के भाई शिवपाल सिंह यादव विधायक हैं और उन्होंने एसपी से अलग होने के बाद भी अपने भाई की जीत के लिए उन्हें हर तरह से समर्थन देने का ऐलान किया है। यूपी में 2017 के विधानसभा चुनाव में पांच विधानसभा सीटों में से सिर्फ एक सीट भोगांव में बीजेपी को जीत मिली थी जबकि बाकी की चार सीटों पर एसपी के प्रत्याशी ही जीते थे।

मैनपुरी जिले में कुल 17.4 लाख मतदाता हैं और इनमें से 7 लाख की संख्या यादव वोटरों की है। दूसरे नंबर पर शाक्य मतदाता हैं, जिनके करीब 3 लाख वोटर हैं। इस तरह अखिलेश यादव ने यादव बिरादरी के अलावा शाक्यों को भी साधने की कोशिश की है ताकि चुनावी जीत में सेंध की कोई आशंका न रहे। इससे पहले भाजपा ने 2019 के आम चुनाव में मुलायम सिंह यादव के मुकाबले प्रेम सिंह शाक्य को उतारा था, जिन्हें 4 लाख से ज्यादा वोट मिले थे। वहीं मुलायम सिंह को 5 लाख ज्यादा मत मिले थे और जीत का अंतर एक लाख से भी कम था। माना जाता है कि भाजपा कैंडिडेट को शाक्य वोटरों के अच्छे खासे वोट मिले थे।

ऐसे में इस बार किसी भी तरह से वोट न बंट पाए, इसकी कोशिश अखिलेश यादव ने पहले से ही शुरू कर दी है। 2019 के आंकड़े को देखते हुए ही कहा जा रहा था कि मुलायम सिंह यादव के गढ़ को बनाए रखना इतना आसान भी नहीं है। हालांकि इस बार सपा को सहानुभूति का वोट भी मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा शाक्य जिलाध्यक्ष के जरिए शाक्यों के बीच भी पैठ की आस है। समाजवादी पार्टी ने डिंपल यादव को उम्मीदवार घोषित करने से पहले यहां का जिलाध्यक्ष पूर्व मंत्री आलोक शाक्य को बना कर शाक्य मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद करने का दांव चला है। पार्टी के लोगों का कहना है कि पूर्व मंत्री आलोक कुमार शाक्य तीन बार भोगांव से विधायक रह चुके हैं। इनके पिता राम औतार शाक्य भी दो बार विधायक रहे हैं। अभी तक भाजपा यहां से शाक्य चेहरे पर दांव लगाने की तैयारी में है लेकिन सपा ने जिलाध्यक्ष बनाकर समीकरण साध लिया। भाजपा इस साल की शुरुआत में ही सपा की गढ़ कही जाने वाली रामपुर और आजमगढ़ लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर चुकी है। इसलिए सपा के लिए मैनपुरी जीतना अब प्रतिष्ठा का भी सवाल है।

गौरतलब है कि डिंपल यादव ने पहली बार 2012 में संसद का रुख किया था। उन्होंने लोकसभा उपचुनाव में कन्नौज सीट से जीत हासिल की थी, जिसे सीएम बनने के बाद अखिलेश यादव ने छोड़ा था। इसके बाद 2014 के आम चुनाव में भी डिंपल को जीत मिली थी, लेकिन 2019 में वह भाजपा के ब्रजेश पाठक के हाथों हार गई थीं। अब यदि डिंपल यादव को मैनपुरी में विजय मिलती है तो उनकी लोकसभा में तीसरी पारी होगी। मैनपुरी लोकसभा उप चुनाव में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव को सपा उम्मीदवार घोषित करने पर भाजपा ने तंज कसा है। पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि सपा में कार्यकर्ता सिर्फ नारेबाजी करने के लिए हैं और चुनाव लड़ने का अधिकार केवल सैफई कुनबे को है। प्रदेश भाजपा प्रवक्ता ने कहा है कि सपा में कार्यकर्ता तो केवल जिंदाबाद मुर्दाबाद नारे लगाने के लिए बचे हैं। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव ने उप चुनाव में डिंपल यादव को प्रत्याशी बनाकर साफ कर दिया है कि वह परिवारवाद की राजनीति से बाहर नहीं आ सकते हैं।

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