ओ३म् “स्वस्थ, सुखी व दीर्घ जीवन का आधार सन्ध्योपासना व इसके मन्त्रों का अर्थ सहित चिन्तन”

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मनुष्य जीवन परमात्मा से हम सबको अपनी आत्मा और शरीर की उन्नति के लिये मिला है। आत्मा की उन्नति का साधन सत्य ज्ञान की प्राप्ति सहित उसके अनुरूप आचरण करना है। ईश्वर के ध्यान, चिन्तन, उपासना को सन्ध्या कहा जाता है। सन्ध्या का अर्थ है ईश्वर का भली भांति ध्यान करना है। सन्ध्या के लिये यह आवश्यक है कि हम ईश्वर, जीवात्मा सहित इस सृष्टि को भली प्रकार से जानें। ईश्वर व आत्मा का ज्ञान हमें सृष्टि के पदार्थों का त्यागपूर्वक भोग करने की शिक्षा देता है और मनुष्य में वैराग्य भाव को उत्पन्न करता है। विवेकपूर्वक विचार करने पर मनुष्य यह अनुभव करता है कि जीवन का पर्याप्त समय ईश्वर व आत्मा के चिन्तन, ध्यान, विचार, वेदों व ऋषियों के ग्रन्थों के स्वाध्याय, अध्ययन व प्रचार आदि में व्यतीत होना चाहिये। महर्षि दयानन्द ने वेद और समस्त वैदिक साहित्य का गहन अध्ययन किया था। उन्हें सभी विषयों का ज्ञान था और इसके साथ वह कर्म-फल सिद्धान्त को भी भली प्रकार से जानते थे। मनुष्य को अपने किये शुभ व अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। इस सिद्धान्त से यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य यदि अशुभ या पाप कर्म करेगा तो ईश्वर उसे उन कर्मों का दण्ड अवश्य देगा। ईश्वर सर्वव्यापक एवं सर्वान्तर्यामी होने से सभी जीवों के सभी कर्मों का साक्षी व द्रष्टा है। वह किसी मनुष्य के किसी कर्म को कदापि भूलता नहीं है। यही कारण है कि हमारे ऋषि व विद्वान अपना जीवन ईश्वर प्राप्ति की साधना, वेदों के शिक्षण व प्रचार तथा यज्ञादि सद्कर्मों में व्यतीत करते थे। वेदों के अध्ययन व चिन्तन-मनन से भी यही स्पष्ट होता है कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य ज्ञान प्राप्ति कर ईश्वरोपासना व यज्ञादि कर्मों को करना है। इससे मनुष्य शुभ कर्मों की वृद्धि तथा पूर्व किये कर्मों के फलों का भोग कर दुष्ट-कर्मों के बन्धन से मुक्त होकर अपने जीवन को श्रेष्ठ व उत्तम बना सकता है। ऐसा करने से मनुष्य जन्म व मरण के क्लेश व दुःखों से मुक्ति अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति में अग्रसर होता है। जीवात्माओं को सुख देने, उनका कल्याण करने व उन्हें जन्म-मरण से छुटाकर मोक्ष प्रदान करने के लिये ही ईश्वर ने सृष्टि की आदि में वेदों का ज्ञान दिया था। ऋषि दयानन्द वेदों के मन्त्र-द्रष्टा ऋषि व विद्वान थे। उन्होंने ईश्वर व वेदों के ज्ञान का प्रत्यक्ष कर वेदों को ईश्वरीय ज्ञान व सब सत्य विद्याओं की पुस्तक घोषित किया है। वेदों का अध्येता भी वेदों के पदों, पदार्थ, भाषा तथा मन्त्रों में निहित ज्ञान को जानकर यह अनुभव करता है कि यह मानवरचित ज्ञान न होकर ईश्वरीय ज्ञान ही है। इसी कारण पूर्व ऋषियों व ऋषि दयानन्द ने वेदों का पढ़ना व पढ़ाना तथा सुनना व सुनाना सब आर्यों अर्थात् मनुष्यमात्र का परम धर्म अर्थात् अनिवार्य कर्तव्य माना है।

ऋषि दयानन्द ने वेद एवं ऋषियों के साहित्य के अनुसार ईश्वर की उपासना को सभी मनुष्यों का प्रमुख कर्तव्य मानकर पंचमहायज्ञ विधि पुस्तक का निर्माण किया है और उसमें ईश्वर के ध्यान व चिन्तन सहित उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना हेतु ‘सन्ध्या’ को प्रथम स्थान दिया है। उनके अनुसार ईश्वर चिन्तन व सन्ध्या आदि करने से मनपुष्य की आत्मा के मल व दोष अर्थात् दुर्गुण, दुव्यर्सन एवं दुःख दूर हो जाते हैं और इनका स्थान कल्याणकारी गुण, कर्म व स्वभाव लेते हैं जिनसे मनुष्य का जीवन श्रेष्ठ, सफल व उत्तम बनता है। ऋषि दयानन्द ने सन्ध्या की जो विधि लिखी है वह मनुष्य को श्रेष्ठ ज्ञान से युक्त कराने के साथ ईश्वर व आत्मा का ज्ञान भी कराती है एवं साथ ही ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना करते हुए जीवन के लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण पदार्थ स्वस्थ शरीर, ऐश्वर्य, सुख, बल, यश, दीघार्यु आदि पदार्थों को भी प्राप्त कराती है। यह पदार्थ हम संसार में धन का व्यय करके प्राप्त नहीं कर सकते। इससे यह सिद्ध होता है कि धन का स्थान ईश्वर व जीवात्मा के ज्ञान, ईश्वरोपासना आदि कर्तव्य, वेद आदि ग्रन्थों के स्वाध्याय के बहुत बाद में आता है। मनुष्य का लक्ष्य दुःखों की पूर्णतया निवृत्ति है। मनुष्य के सभी दुःख ईश्वरोपासना एवं शुभ-कर्म आदि के करने से ही दूर होते हैं। अतः मनुष्यों को धर्मानुकूल व्यवसाय आदि के कार्यों को करते हुए ईश्वर की उपासना व यज्ञ आदि कर्मों से विरत नहीं होना चाहिये।

इस लेख में हम सन्ध्या के उपस्थान प्रकरण के एक मन्त्र का उल्लेख कर उसमें निहित उदात्त व श्रेष्ठ ईश्वर-स्तुति-प्रार्थना-उपासना को प्रस्तुत कर रहे हैं। इस मन्त्र में ईश्वर से जो वस्तुयें मांगी गई हैं वही मनुष्य की सर्वोत्तम आवश्यकतायें व सम्पत्तियां हैं। यह मन्त्र यजुर्वेद 36/4 है जो कि निम्न हैः

तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताछुक्रमुच्चरत्।
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं
श्रृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः
स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्।।

इस मन्त्र में कहा गया है कि ब्रह्म अर्थात् ईश्वर सबका द्रष्टा है। वह धािर्मक विद्वानों का परम हितकारक है। ईश्वर समस्त ब्रह्माण्ड में सृष्टि के पूर्व, पश्चात् और मध्य में सत्यस्वरूप से वर्तमान रहता है। वह सब जगत् की रचना वा उत्पत्ति करने वाला है। उसी ब्रह्म को हम 100 वर्षों तक देखें। उस ब्रह्म की कृपा से हम 100 वर्ष तक जीवित रहें। उस ब्रह्म की वेदवाणी को हम ऋषियों व विद्वानों से 100 वर्ष तक सुनें। उसी ब्रह्म के वेद वर्णित सत्यस्वरूप का हम अन्य लोगों को उपदेश करें। वह ब्रह्म हम पर कृपा करें जिससे हम किसी के अधीन न होकर पूरी आयु पर्यन्त स्वतन्त्र रहें। उस परमेश्वर की आज्ञापालन और कृपा से हम सौ वर्षों के उपरान्त भी उसकी सृष्टि व कार्यों को देखें, जीवित रहें, वेदों का अध्ययन व श्रवण करें, दूसरों को सुनायें व स्वतन्त्र रहें। मन्त्र का तात्पर्य है कि रोगरहित स्वस्थ शरीर, दृढ़ इन्द्रिय, शुद्ध मन और आनन्द से युक्त हमारा आत्मा सदा रहे। एक परमेश्वर ही सब मनुष्यों का उपास्यदेव है। जो मनुष्य सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ व सृष्टिकर्ता ईश्वर को छोड़कर दूसरे की उपासना करता है वह पशु के समान होके सब दिन दुःख भोगता रहता है। इसलिये ईश्वर के प्रेम में मग्न होकर और अपने आत्मा व मन को परमेश्वर में लगाकर परमेश्वर की स्तुति और प्रार्थना सदा करनी चाहिये।

यह वेदमन्त्र व वेदों के अन्य सभी मन्त्र मानवीय रचनायें नहीं हैं अपितु ईश्वर का नित्य व नाशरहित ज्ञान है जो सृष्टि की आदि में ईश्वर ने चार ऋषियों के अन्तःकरण में अपने सर्वान्तर्यामीस्वरूप से प्रेरणा करके प्रदान किया था। उपर्युक्त मन्त्र में परमात्मा मनुष्यों को मन्त्र के भावों के अनुरूप स्तुति व प्रार्थना करने की प्रेरणा करता है। मनुष्य को दृष्टि की शक्ति, श्रवण शक्ति, वाक् शक्ति, गन्ध ग्रहण शक्ति व स्पर्श शक्ति आदि ईश्वर से ही प्राप्त होती है। इसके लिये ईश्वर का धन्यवाद करने व उससे प्रार्थना करने से वह हमारे शरीर सहित इन सभी शक्तियों को 100 वर्ष व अधिक समय तक हमारे शरीर में बनाये रखे, यह प्रार्थना हमें करनी चाहिये। इसके लिये हमें सन्ध्या करते हुए अपने मन को पवित्र रखकर उपर्युक्त मन्त्र का अर्थ सहित एक व अनेक बार उच्चारण करना है। मनुष्य को उसके शरीर में यह शक्तियां जन्म के समय से परमात्मा से ही प्राप्त हुई हैं और वही इनको स्वस्थ रखने के साथ इन्हें हमारी लम्बी आयु तक निर्दोष रख सकता है। अतः हमें वेदानुकूल जीवन व्यतीत करते हुए ईश्वर से शरीर, आरोग्य व 100 वर्ष की आयु मांगनी चाहिये। ईश्वर हमारी पात्रता को जानते हैं। जिस प्रकार एक पिता अपने योग्य व पात्र पुत्र को अपनी सभी धन सम्पत्ति सौंप देता है, ऐसा ही अक्षय धन व सम्पत्तियों का स्वामी ईश्वर भी करता है। वह भी पिता की भांति हमें इन सब सम्पत्तियों व शक्तियों को प्रदान करते हैं। इसके लिये हमें अपने मन की पवित्रता के साथ ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना करनी ही अपेक्षित है। ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जो स्वास्थ्य, ऐश्वर्य व दीघार्यु आदि इन सम्पत्तियों को न चाहता हो। अतः सबको वेदमार्ग का अनुसरण करना चाहिये। ऐसा करके हम सुखी, सम्पन्न, दीर्घायु हो सकते हैं व धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त हो सकते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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