चतुर्वेद पारायण यज्ञ के सातवें दिन के सत्र में आचार्य विद्या देव जी ने कहा : पशु रोगों की चिकित्सा के लिए भी है यज्ञ का विधान*

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*चतुर्वेद पारायण महायज्ञ सातवाँ दिवस 14 वाँ सत्र*

ग्रेटर नोएडा ( विशेष संवाददाता) वेदों ने मनुष्य के स्वास्थ्य की व्यवस्था तो की ही है साथ ही पशु पक्षियों के स्वास्थ्य के लिए भी विधान किया है। जब स्वामी दयानंद जी कहते हैं कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है तो उसका अर्थ यही है कि वेद ज्ञान से इतर कुछ भी नहीं है संपूर्ण ज्ञान विज्ञान वेदों में समाविष्ट है। इस प्रकार के विचार व्यक्त करते हुए यज्ञ के ब्रह्मा आचार्य विद्या देव जी ने कहा कि इस वर्ष देश के राजस्थान ,गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में गोवंश की संक्रमण बीमारी लंपी का प्रकोप है। जिसको आज का पशु चिकित्सा विज्ञान समझ नहीं पा रहा है। आचार्य श्री ने कहा कि यदि देश में वैदिक ज्ञान विज्ञान को समझ कर उसके अनुसार पशु चिकित्सा विज्ञान पर काम किया जाता तो इस बीमारी में जितने पशुओं का नाश हो गया है उतना नहीं होता।


लोगों को वेद के ज्ञान विज्ञान को समझने और उसके अनुसार अपनी जीवन चर्या वह दिनचर्या बनाने के लिए प्रेरित करते हुए वैदिक विद्वान आचार्य विद्या देव जी ने आगे कहा कि लाखों गोवंश इस समय पीड़ित है । जिसके प्रति लोगों की उदासीनता बढ़ती जा रही है। गोवंश को इस समय लोगों ने अपने लिए अनुपयोगी मानना शुरू कर दिया है । जिसके कारण गोवंश खेतों में या सड़कों पर भटकता फिर रहा है। इसका कारण केवल एक है कि पशुओं के उचित रखरखाव के लिए वैदिक दृष्टिकोण अब बीते दिनों की बात हो गई है। जिससे पंचगव्य का शुद्ध रूप में मिलना संभव नहीं रहा है। इसका परिणाम यह रहा है कि मनुष्य का स्वास्थ्य चौपट हो रहा है और वह नई नई बीमारियों से ग्रसित हो रहा है। यदि समय रहते हम नहीं चेते तो भयंकर विनाश हमारी प्रतीक्षा कर रहा है।
मुरसदपुर गुरुकुल में चल रहे महायज्ञ के ब्रह्म आचार्य विद्या देव ने कहा कि अथर्ववेद ,यजुर्वेद में गोवंश के स्वास्थ्य की कामना की गई है। चौपाये पशुओं को प्रताड़ित करने वाले संक्रमक रोगों की चिकित्सा का विवरण वेद के सैकड़ों मंत्रो में मिलता है। यदि उन्हें समझ लिया जाए तो हम पशु चिकित्सा में आशातीत सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि ऋग्वेद में रोगजनक कीटो बैक्टीरिया वायरस को वत्र कहा गया है, साथ पशुओं की चिकित्सा के प्राचीन ग्रंथ पशुआयुर्वेद में यज्ञ धूनी आदि के माध्यम से पशुओं के संक्रामक रोग की चिकित्सा का उल्लेख मिलता है। गांव में पशु पालकों द्वारा बरसात के मौसम में दुख निकालने की प्रथा इसी का रूप है। विद्या देव जी ने अपील की है कि सभी पशुपालकों को अपने पशुओं की डेरी में गुगल नीम हल्दी चिरायता अर्क मदार से यज्ञ या धूनी देनी चाहिए साथ ही लंपी रोग से हुए घावो में यज्ञ की राख में घी मिलाकर फिटकरी के साथ लगाना चाहिए। गुरुकुल में इस रोग की आयुर्वेदिक प्राकृतिक चिकित्सा के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था है।
आचार्य श्री ने कहा कि ग्वार और कार्तिक के महीनों में मनुष्य और पशु दोनों को ही संक्रामक रोग होते हैं। उसका कारण होता है कि बरसात के मौसम में अनेक कीट पतंगे सांप आदि असमय मर जाते हैं जिससे उनके शरीरों से निकलने वाली बदबू वातावरण में फैलती है। इस बदबू से संक्रामक रोग खेलते हैं। हमारे ऋषि मुनि वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले होते थे जो इन महीनों में विशेष रुप से यज्ञ आदि किया करते थे। जिससे कि ऐसे संक्रामक रोगों का निदान हो जाता था। आज भी हमें इसी प्रकार के आचरण को अपनाने की आवश्यकता है।

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