नेहरू चाहते तो गाँधी बच जाते ———इंजीनियर श्याम सुन्दर पोद्दार

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गाँधी ने बाल्मीकी मन्दिर में क़ुरान पढ़ी। इसके विरोध में वहां प्रदर्शन होने लगे। गाँधी के प्राण उस समय प्रधान मन्त्री नेहरू के लिये मूल्यवान थे,उन्होंने गाँधी को भंगी कॉलोनी से हटा कर सुरक्षित स्थान, बिरला हाउस, में स्थानांतरित कर दिया। गाँधी ने पाकिस्तान को ५५ करोड़ देने के लिये नेहरू सरकार के बिरुद्ध अनशन करके ५५ करोड़ देने को नेहरू को मजबूर कर दिया। गाँधी के इस अनशन से नेहरू की बहुत किरकिरी हुई। गाँधी के अनशन समाप्ति के बाद २० जनवरी १९४८ गाँधी को मारने के लिये बिरला हाऊस में पाकिस्तान में सताया हुआ हिन्दु शरणार्थी मदन लाल पाहवा ने बम मार कर जान से मारने का प्रयास किया। गाँधी बच गये।
पाकिस्तान में सताए हुए हिन्दु शरणार्थी द्वारा जान लेवा हमला करने पर एक बात तो साफ़ हो गई कि उस समय लाखों की संख्या में जो हिंदू पाकिस्तान से यहां आ रहे थे वह बहुत अधिक परेशान थे और गांधी जैसे नेताओं की दोगली बातों ने उन्हें देश के तत्कालीन नेतृत्व के विरुद्ध भड़का दिया था।
उजड़ कर पाकिस्तान से भारत के लिए चले यह हिंदू शरणार्थी उस समय गांधी के दोगले चरित्र से अत्यधिक दुखी थे।
उस समय यह संकेत स्पष्ट मिल रहे थे कि गांधी की दोगली नीतियों के कारण उन पर हमला हो सकता है। इसलिए उस समय के नेतृत्व के लिए और खासतौर से नेहरू के लिए यह बहुत आवश्यक हो गया था कि वह गांधी की सुरक्षा व्यवस्था में परिवर्तन लाते।
पर ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। उसी का परिणाम था कि मदनलाल पाहवा की घटना के बाद मात्र 10 दिन के भीतर ही नाथूराम गोडसे ने गांधी को मौत के घाट उतार दिया। जितनी सहजता से नाथूराम गोडसे बिरला हाउस में शस्त्र के साथ व गाँधी तक पहुँचने में सफल होता है उसे देखते हुए यही कहा जायेगा गाँधी के जीवन को जीवन हानि की सम्भावना होते हुए भी गाँधी को हमले से बचाने के लिये कुछ नही किया गया। उन्हें मरने दिया गया।
गाँधी की हत्या के बाद नेहरू ने जिस तरह का राजनीतिक लाभ गाँधी हत्या से लेने का खेल खेला उसको देख कर स्पष्ट लगता है कि प्रधान मन्त्री नेहरू ने हत्यारे को गाँधी तक सहजता पहुँचने दिया और वह गाँधी की लाश पर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेकने लगा था। आज तक नेहरू के वंशधर वही काम कर रहे है। जिस तरह गाँधी हत्या के कुछ घण्टे के बाद नेहरू के राजनैतिक प्रतिद्वंदी सावरकर के सुरक्षा अधिकारी अप्पा कासर को बम्बई में गिरफ़्तार किया गया और अप्पा कासर की सुरक्षा से वंचित सावरकर के घर पर नेहरू के गुंडो ने सावरकर की जान से मारने के लिये हमला किया, वह सब यद्यपि अब इतिहास बन चुका है, परंतु यदि उस पर गंभीरता से चिंतन किया जाए तो कई परतें बड़ी रहस्य भरी है।
हिन्दु महासभा के कार्यकर्ताओं के समय पर पहुँच जाने से सावरकर तो बच गये नही तो उनका हाल भी सावरकर के भाई नारायण राव सावरकर की तरह होता और उन्हें मरना पड़ता। अप्पा कासर की गाँधी हत्या के तुरंत बाद फिर सावरकर पर हमले और उसके बाद की घटनाओं से स्पष्ट हो जाता है कि प्रधान मन्त्री नेहरू ने गाँधी को मरने दिया तथा गाँधी की हत्या के बाद क्या क्या करना है उसकी रूपरेखा गाँधी की हत्या से पहले ही बना ली थी। अन्यथा गाँधी की हत्या के कुछ घंटे बाद अप्पा कासर को बिना अपराध बम्बई में गिरफ़्तार नही किया जाता।
कांग्रेस ने १९४५ का चुनाव इस प्रतिज्ञा के साथ जीता था देश का विभाजन गाँधी जी की लाश पर होगा। यानी हम इसे स्वीकार नही करेंगे। लोगों ने कांग्रेस पर बिस्वास किया और ८६ प्रतिशत हिन्दू वोटों के साथ १०२ सीटों में ५८ सीट पाकर सत्ता तक पहुँच गई। इस चुनाव में हिन्दु महासभा को सफलता तो नही मिली पर १४ प्रतिशत वोट अवश्य मिले। कांग्रेस ने विश्वासघात करके देश का बँटवारा स्वीकार कर लिया। उसके सामने समस्या यह थी १९५२ के चुनाव में वह इस विश्वासघात के चलते हिन्दु महासभा के सामने टिक नही पायेगी व अवश्य पराजित होगी। इसलिये हिन्दु महासभा व इसके नेताओं को ठिकाने लगाना है।सावरकर को मारने में विफल हो जाने के बाद गाँधी हत्या काण्ड में सावरकर को नेहरू ने झूठे फँसा दिया व गिरफ़्तार कर लिया।
सावरकर को गाँधी हत्या काण्ड में फ़साने के पीछे नेहरू की मनसा हिन्दु महासभा व सावरकर को बदनाम करने की थी। गाँधी हत्या काण्ड की कोर्ट कार्यवाही का प्रचार इस प्रकार हुआ। जब तक अभियोग पक्ष के अभियोग कोर्ट में जारी रहे बड़े बड़े माइक से कोर्ट की बहस बाहर बैठे पत्रकारों को सुनाई जाती ताकि सारे भारत में यह अभियोग पहुँचे। जब बचाव पक्ष के कहने की बारी आई तो प्रेस का प्रवेश निषेध हो गया। इस तरह खुल कर इन लोगों को बदनाम किया गया। सावरकर को जब निर्दोष कहते हुए जज आत्माचरण ने सावरकर की गिरफ़्तारी को दुर्भाग्यपूर्ण कहा और लिखित टिप्पणी अंकित की “सावरकर ने देश के लिये बहुत कुछ भुगता। इस बात की जाँच की जानी चाहिये कि ऐसे महान नेता का नाम इस हत्याकांड में क्यों घसीटा गया।”
इसके पहले डॉक्टर अम्बेडकर ने सावरकर के वकील भोपटकर से कहा था कि गाँधी हत्याकांड में वीर सावरकर की लिप्तता के कोई साक्ष्य नही है। उन्हें प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल सहयोगियों की असहमति के बावजूद राजनैतिक विद्वेश व षडयंत्र के तहत ज़बरदस्ती अभियुक्त बनाया है”(साप्ताहिक काल पुणे,दि.६ जून १९८३ के अंक में प्रकाशित)
सावरकर पर लाल क़िले से निकलने पर पंजाब security act लगा दिया गया। उन्हें वहां उपस्थिति लाखो समर्थकों से मिलने नही दिया गया,सीधे बम्बई पहुँचा दिया गया। २७ फ़रवरी १९४८ को सरदार पटेल ने लिखा “ऐसा लगता है कि यह षड़यंत्र १० आदमियों तक ही सीमित है,उसमें से २ को छोड़ सभी को गिरफ़्तार कर लिया गया है “।
इस सत्य होने के बावजूद हिन्दु महासभा के सभी बड़े नेता व सारे भारत के ज़मीन स्तर के ४५००० कार्यकर्ता गाँधी हत्याकाण्ड में लिप्तता दिखा कर वर्षों तक जेल में रखे गये। राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ के २५००० कार्यकर्ता जेल में डाल दिये गये।संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। गाँधी हत्या काण्ड से दोष मुक्त हो बरीं होने के कुछ समय बाद सावरकर फिर जेल में डाल दिये गये। उन पर राजनीति नही करने का प्रतिबंध भी १९५२ के चुनाव के पहले तक लगा दिया। इस प्रकार गाँधी हत्या को नेहरू ने राजनैतिज जीत के लिये इस्तेमाल किया व १९५२ का चुनाव जीत गया। गाँधी की हत्या हो जाने से अब भविष्य में अनशन करके उन्हें विरक्त नही होना पड़ेगा। हमारे इतिहास पर षड्यंत्र की गहरी गर्द जमी हुई है । हमें इस गर्द को साफ करने के लिए भगीरथ प्रयास करने की आवश्यकता है । गांधी और नेहरू छाप इतिहास को मिटाकर क्रांतिकारियों का इतिहास पढ़ाकर देश के युवाओं को देश सेवा के लिए तैयार करना समय की आवश्यकता है।

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