वैदिक सम्पत्ति : तृतीय खण्ड ; अध्याय – ईसाई और आर्यशास्त्र

images (29)

गतांक से आगे…..

यहाँ तक हमने विदेशियों द्वारा नवीन सम्प्रदायों का प्रवर्तन और वैदिक साहित्य का विध्वंस दिखलाया । अब हम यह समस्त कथा यहीं पर समाप्त करते हैं । इतने ही वर्णन से अनुमान करने के लिए मौका न छोड़ना चाहिये और तुरन्त ही यह बात ध्यान में ले लेना चाहिये कि जब दीर्घकाल के बाद भी आज साहित्यविध्वंश का पता इतनी अधिकता से लग सकता है , तो न जाने अगले जमाने में पता लगाने से कितना पता मिलता और किन किन विदेशियों
_________________________
+ Syphilis appears to have been unknown in India till the end of the fiflecath or beginning of the sixteenth century , when it was introduced by the Portuguese .
( The Ocean of Story , by Penger , )
_________________________
ने क्या क्या रचना की है जाना जाता । इसलिए यदि कोई हिन्दू धर्म की अव्यवस्था और आर्यजाति की दुर्गति का कारण जानना चाहे , तो वह इतने ही वर्णन से अच्छी प्रकार समझ सकता है । आज हिन्दुओं में जो नाना प्रकार के कुसंस्कार , अविद्या और अनैक्यता दिखलाई पड़ती है और आज जो आर्यजाति पतित दशा में पहुँची है , उसका कारण इस वर्णन पर से सहज ही दिखने लगता है। क्योंकि यह मानी हुई बात है कि , मनुष्यजाति का पतन अनैक्य , अविद्या घोर अनाचार से ही होता है । हमारे इस समस्त वर्णन से स्पष्ट हो रहा है कि , आार्यों में विदेशियों के द्वारा अनेको मतमतान्तरों , दार्शनिक विचारों और अनेकों सम्प्रदायों का प्रचार हुआ है और उसी से हममें अनैक्यता उत्पन्न हुई है । इसी तरह विदेशियों के ही द्वारा धर्म के नाम से मद्य , मांस , व्यभिचार आदि दुर्व्यसन और अनाचार भी आर्यो में दाखिल हुए है , जिनसे हममें हर प्रकार की दुर्बलता , निरुत्साह और अपवित्रता समा गई है । इसी तरह विदेशियों की ही कृपा से हम में अविद्या का प्रचार भी हुआ है । जहाँ मद्य , मांस और व्यभिवार हो , जहाँ जंगली व्यवहार ही धर्म हो , जहाँ वंचक और अविवेकी मनुष्य गुरु बन जाँय और जहाँ इसी तरह के गुरुओं की बात पर विश्वास किया जाना धर्म हो , वहाँ विद्या का प्रचार कैसे हो सकता है ? विद्या तो इन सब उपद्रवों की शत्रु है । इसीलिए यहाँ गुरुपूजा , गुरुओं की सम्प्रदायपूजा और गुरुओं की वाक्यपूजा ही ने सब विद्याओं का स्थान ले लिया । वही जो कुछ कहें वह सत्य और सब झूठ हो गया । इन गुरुओं के आदेश से देश की प्रधान जनसंख्या शूद्र हो गई और वह विद्या से अलग हुई । बची हुई थोडीसी संख्या का आधा भाग स्त्रियों का भी विद्या से अलग हुआ , तथा ब्राह्मण , क्षत्री और वैश्य सब विदेशी गुरुओं की आज्ञा पालन करने और उनकी ही सेवा करने में लग गये । ऐसी स्थिति में विद्या कौन पढ़े ? इस तरह से सारी हिन्दू समाज में अनैक्यता , अनाचार और अविद्या का साम्राज्य हो गया और इन तीनों दुर्गुणों के कारण आर्यजाति का हर प्रकार से पतन हो गया , जिसका चित्र सब के सामने विद्यमान है ।
इस इतिहास से यह निश्चय कर लेना सहज है कि अब हमें क्या करना चाहिये , अर्थात् हमें धार्मिक विश्वासों में किस प्रकार फेरफार करना चाहिये । हम कहते हैं कि सत्यासत्य के निर्णय के लिए अर्थात् वैदिक धर्म और आसुरी विश्वासों का निश्चय करने के लिए और दोनों का अन्तर जानने के लिए यही उत्तम कुंजी है कि , हम केवल वेदोंपर ही विश्वास करें , अन्य ग्रन्थों पर नहीं । क्योंकि रावण से सायण तक और कबीर से एनी बीसेंट के द्वारा स्थापित द्रविढ़ावतार तक समस्त विदेशी धर्मप्रचारकों के द्वारा आर्यधर्म में आधे से अधिक आसुरी विश्वासों का मिश्रण किया गया है । इसलिए वेदों को स्वतःप्रमाण और अन्य ग्रन्थों को परतःप्रमाण मानने का जो प्राचीन विश्वास चला आता है , उसी को मान्य समझकर प्रत्येक आर्यहिन्दू को चाहिये कि , वह वेदों का स्वाध्याय करके केवल संहिताओं से ही अपने धर्म कर्म की शिक्षा ग्रहण करे । क्योंकि मनु महाराज स्पष्ट शब्दों में कह रहे हैं कि वेदों को छोड़कर अन्य ग्रन्थों में श्रम करने से आर्यत्व नहीं रह सकता । इसका कारण स्पष्ट है कि अन्य ग्रन्थों में मनुष्यों की कपोलकल्पना का होना संभव है । किन्तु वेद ईश्वरप्रदत्त हैं , इसलिए उनके आदेश निर्भ्रान्त हैं । थोड़े से विष के मिलने से जिस प्रकार पका हुआ अन्न का बहुत बड़ा भाग त्याज्य समझा जाता है , उसी तरह दूषित साहित्य के पढ़ने से भी विषतुल्य आसुरी भावों के चिपक जाने का अन्देशा रहता है । इसलिए अपने धर्म को वेदानुकूल ही बनाना चाहिये । परन्तु दुःख से कहना पड़ता है । कि आसुरी भावों की उत्पत्ति , उनका विस्तार और आर्य विश्वासों में उनके मिश्रण का यह इतिहास स्पष्ट बता रहा है कि आज तक वेदों की किस प्रकार उपेक्षा हुई है । अनार्यों ने उनको नष्ट करने की प्रेरणा से उनकी महत्ता की उपेक्षा की है और आर्यों ने उनकी निर्मल शिक्षा के प्राप्त करने और उस शिक्षा के ग्रहण करने में उपेक्षा की है । अर्थात हर प्रकार से वेदों की उपेक्षा हुई है । जो वेद ईश्वरीय ज्ञान हैं और जो मनुष्य की शिक्षा के लिए आदिसृष्टि में दिये हैं , उनकी उपेक्षा करके मनुष्यजाति कैसे सुखी हो सकती है ? विशेष कर आर्यजाति कैसे आर्यत्व की रक्षा कर सकती है और कैसे पतन से बच सकती है ? प्राय ने वेदों की उपेक्षा करके प्रामुरी सिद्धान्तों को ग्रहण किया , इसीलिए उनका पतन हुआ , जो इस समय सबके सामने है । प्रतः आर्यो के इस पतन का कारण वेद नहीं हैं , प्रत्युत इस पतन का कारण तो वेदों की उपेक्षा ही है।

मूल लेखक रघुनंदन शर्मा
प्रस्तुति : देवेंद्र सिंह आर्य
(क्रमशः)

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
mariobet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betper giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
betticket giriş
betnano giriş
betper giriş
savoybetting giriş
grandpashabet giriş
jojobet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betnano giriş
restbet giriş
safirbet giriş
betnano giriş
restbet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
sonbahis giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
pumabet giriş
betpas giriş
betpas giriş
betnano giriş
betwild giriş
betnano giriş
dedebet giriş
betnano giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş