मोदी सरकार का नया अवतार

modi jiऐसा लग रहा है कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र की समझदारी में अब धीरे-धीरे विकास होता जा रहा है। उनकी अहमन्यता और अक्खड़पन की छवि बदल रही है। उन्होंने कोलकाता में जो ताज़ा बयान दिया,वह इसका प्रमाण है। 16000 हज़ार करोड़ रूपए के इस्को इस्पात कारखाने का उद्घाटन करते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तारीफ़ के पुल बाँध दिए। उन्होंने कहा कि यदि ममता सहयोग नहीं करतीं तो इतना बड़ा यह कारखाना यहाँ खड़ा ही नहीं होता ! यह बीमार ही पड़ा रहता। यह बना है टीम-भावना के कारण। इस टीम का नाम है, टीम इंडिया। टीम इंडिया सिर्फ केंद्र सरकार से नहीं बनती। सिर्फ भाजपा की सरकार से नहीं बनती। यह बनती है–केंद्र और सारे राज्यों की सरकारों से मिलकर। यह पार्टीबाजी से नहीं बनती। उससे ऊपर उठकर बनती है। पार्टी-हित से राष्ट्रहित ऊपर होता है। इसी भावना से प्रेरित होकर संसद ने पिछले सप्ताह बांग्लादेश के साथ थल-सीमा विधेयक सर्वसम्मति से पारित किया। हो सकता है कि सभी दलों के इस निर्णय ने मोदी को पिघला दिया। वे भाजपा-नेता नहीं, राष्ट्र के नेता की तरह बात कर रहे हैं। वरना क्या वजह है कि उन्होंने ममता बनर्जी- जैसी वाचाल और कटुभाषी महिला के लिए इतने मखमली शब्दों का इस्तेमाल किया।

 मोदी ने ममता के बहाने भारतीय संघवाद को भी रेखांकित किया। एक हिंदू संघवादी अब भारतीय संघवाद की बात कर रहा है, क्या यह चेतना का विकास नहीं है ? संघीय शासन का सीधा-सादा अर्थ है—विकेंद्रित शासन । विकेंद्रीकरण सिर्फ शासन में ही नहीं, पार्टी में, परिवार में, समाज में और सरकार में—सभी जगह होना चाहिए। शक्ति के ध्रुवीकरण का ही दूसरा नाम तानाशाही है । मोदी सरकार अपने पहले साल में विकेंद्रीकरण का उलट रूप ही मानी जा रही है। यह रूप संघ, पार्टी, सरकार, और राष्ट्र सभी पर हावी रहा है। मोदी सरकार की लोकप्रियता के नीचे लुढ़कने का एक बड़ा कारण यह भी रहा है। अब लगता है कि मोदी सरकार का नया अवतार हो रहा है ।

 यदि यही अवतार उत्कर्ष पर पहुँचें और पराकाष्ठा प्राप्त करे तो कोई कारण नहीं है कि भारत की राजनीति उस ‘एकात्म भाव’ पर न पहुँचे, जिसका सपना दीनदयाल उपाध्याय ने देखा था । यदि सतारूढ़ लोगों में आवश्यक उदारता और विनम्रता हो तो भूमि–अधिग्रहण या सामान्य कर या कला धन कानून को पारित करवाने में कोई कठिनाई क्यों होगी ? टीम इंडिया की धारणा की यही परीक्षा होगी । जो भी कानून पिछली सरकार ने बनाए हैं या संसद ने पारित किए हैं, उन्हें सेंत-मेंत में रद्द करने की बजाय यदि आम राय का और सलाह—मश्विरा का रास्ता चुना जाए तो टीम इंडिया की धारणा अपने आप साकार हो जाएगी।

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