समुंद्र की सरताज ,बजाऊ जनजाति”

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हिंद महासागर , पेसिफिक ओसियन में इंडोनेशिया, ब्रुनेई फिलिपींस जैसे दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के समुद्र तट दीपों पर बजाउ जनजाति लाखों वर्षों से निवास करती है| दुनिया में इनकी संख्या केवल 12 लाख के लगभग है| समुंदर इन का घर बन गया है यह समुंदर में ही तैरते हुए घर बनाती है… इस जनजाति का 3 वर्ष का बच्चा भी Sea में सैकड़ों फीट का गोता लगाने में माहिर हो जाता है…. पूरे दिन में इस जनजाति के अधिकांश लोग फिश कैचिंग के लिए औसत 12 घंटे समुंदर में ही पानी में गुजारते है.. गोता लगाते हुए। समुंदर के ऊपर नहीं समुंद्र गहरे चित्र विचित्र समुंद्र में… पृथ्वी की यह एकमात्र जनजाति है अर्थात मनुष्य है जो पानी के भीतर सर्वाधिक सांस रोककर रह सकती है… बीसवीं शताब्दी तक तो किसी ने इस विषय पर शोध ही नहीं किया था…|

21वीं सदी में तमाम शोध अब इस जनजाति की विलक्षण क्षमता पर हुए हैं.. बड़ी ही चौकाने वाली बात निकल कर आई है लाखों वर्षों से समुंदर के अंदर रहने के कारण गोताखोर अभ्यास के कारण इस जनजाति के शरीर का अंग तिल्ली जिसे स्प्लिन बोला जाता है आम अन्य मनुष्यों के मुकाबले 50 फ़ीसदी बड़ा है…|

तिल्ली हमारे शरीर का बेशकीमती अंग है जो शरीर में रेड ब्लड सेल बनाता है रेड ब्लड सेल में ऑक्सीजन डालता है जब हम सांस को रोकते हैं या दुर्घटनावस सांस लेने में घबराहट होती है तो तिल्ली तेजी से ऑक्सिजनेटेड रेड ब्लड सेल शरीर में भेजने लगती है… क्योंकि इस जनजाति में यह अंग अन्य मनुष्यों के मुकाबले 50 फ़ीसदी बड़ा है तो इस कारण समुद्र के भीतर जब यह गोता लगाते हैं तो इनके शरीर में ऑक्सिजनेटेड ब्लड अधिक देर तक दौड़ता रहता है… जिस कारण अधिक देरी तक सांस रोक लेते हैं…|

एंथ्रोपॉलजिस्ट बताते हैं यह जनजाति दक्षिण भारत से होते हुए लंका से दक्षिण एशियाई समुद्री देशों में गई है|
यह जनजाति श्रीलंका की मूल निवासी जनजाति वेदा जनजाति से निकली है…। रावण कोई छोटा-मोटा राजा नहीं था उसके दक्षिण पूर्वी एशिया से ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप तक छोटे-बड़े समुद्री उपनिवेश थे | कभी ऑस्ट्रेलियाई मूल निवासी माओरी लोगों को दक्षिण भारत की जनजातियों विशेष तमिलनाडु में पाए जाने वाली जनजातियों की फोटो गूगल कर लेना दोनों जनजातियों शारीरिक रचना कद काठी में बहुत मिलती जुलती है| भाषा विज्ञानी बताते हैं आंध्रालय शब्द से ही ऑस्ट्रेलिया शब्द निकला है.. उसी का ही अपभ्रंश रूप है|

सचमुच परमात्मा जहां चाह, वहां रहा निकाल देता है | दीप, दीपआंतर की भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार प्रतीक जीव जंतु जिसमें मनुष्य भी शामिल है उसके शरीर को ढाल देता है| वैज्ञानिक उसे जेनेटिक म्यूटेशन कह देते हैं, साधारण लोग इसे चमत्कार कह कर संबोधित कर देते|

आर्य सागर खारी ✍✍✍

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