सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नींव का एक वर्ष…

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सुरेश चिपलुनकर

कल्पना कीजिए उस दिन की, जब आगामी 21 जून को “विश्व योग दिवस” के अवसर पर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सबसे प्रसिद्ध क्षेत्र अर्थात “राजपथ” पर रायसीना हिल्स के राष्ट्रपति भवन से लेकर ठेठ इण्डिया गेट तक हजारों बच्चे भारतीय ऋषियों की सर्वोत्तम कृतियों में से एक अर्थात “योगाभ्यास” का प्रदर्शन करें और उसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हों. ज़ाहिर है कि इस विराट आयोजन का टीवी प्रसारण होगा, तथा “विश्व योग दिवस” के बारे में देश-विदेश के सभी प्रमुख अखबारों एवं पुस्तकों में इसका उल्लेख किया जाएगा. इसका सामान्य जनमानस पर कैसा प्रभाव पड़ेगा? स्वाभाविक रूप से “योग” (जो अमेरिका रिटर्न होकर “योगा” बन गया है) के बारे में सामान्य भारतीय जनमानस, स्कूली बच्चों तथा युवाओं में एक सकारात्मक छवि बनेगी. योग पर चर्चाएँ होंगी, शोध होंगे, योग को लेकर भ्रान्तियाँ दूर होंगी तथा अमेरिका से वापस लौटा हुआ “योगा” पुनः एक बार विश्व पटल पर “योग” के रूप में स्थापित होगा.

एक वर्ष पहले जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्त्व में भाजपा ने पूर्ण बहुमत से केन्द्र में सरकार बनाई, तब इसके प्रखर आलोचक बुद्धिजीवियों(?) एवं पत्रकारों ने अल्पसंख्यकों को डराते हुए कहा था कि मोदी के आने देश में दंगे हो जाएँगे, साम्प्रदायिक सदभाव बिगड़ जाएगा और देश के सेकुलर ताने-बाने को क्षति पहुंचेगी. मोदी सरकार का एक वर्ष बीत चुका है, अभी तक तो ऐसा कुछ हुआ नहीं है और ना ही होने की कोई संभावना है. अलबत्ता नरेंद्र मोदी एवं संघ परिवार ने वामपंथियों एवं मिशनरियों से सबक सीखते हुए बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” के क्षेत्र में कई ऐसी पहल शुरू की हैं, जिसके निश्चित रूप से दूरगामी परिणाम होंगे. अब सबसे पहला सवाल उठता है कि “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” अर्थात क्या? इसका अर्थ समझने के लिए हमें पिछले साठ वर्ष की सरकारों और उनकी नीयत तथा षड्यंत्र के बारे में संक्षेप में जानना-समझना होगा.

देश हो, समाजसेवा हो, अर्थशास्त्र हो या शिक्षा क्षेत्र हो… सभी क्षेत्रों में प्रतीकों एवं कर्मकाण्डों का अपना महत्व होता है. यदि प्रतीकों एवं सार्वजनिक क्रियाओं को योजनाबद्ध तरीके से संचालित एवं प्रचलित किया जाए, तो वे मनुष्य एवं समाज के अवचेतन मन पर अमिट छाप छोड़ते हैं. उदाहरण स्वरूप बात करें दिल्ली की. जब कभी चर्चाओं में, लेखन में अथवा सन्दर्भों में दिल्ली की बात होती है तो हमारी आँखों के समक्ष अथवा अवचेतन मन में लाल किले या कुतुबमीनार का चित्र उभरता है. ऐसा इसलिए होता है कि अभी तक पिछले साठ वर्षों में शासकीय कार्यक्रमों, सरकारी कर्मकाण्डों तथा वामपंथी प्रभुत्व वाले पाठ्यक्रमों में पिछली चार पीढ़ियों के दिमाग पर लाल किले और कुतुबमीनार के चित्रों को बड़ी सफाई और चतुराई से उकेरा गया है. पिछले कई वर्षों से हमें वही दिखाया-पढ़ाया-सुनाया गया है, जो भारत की “तथाकथित” सेकुलर-वामपंथी विचारधारा के “तथाकथित बुद्धिजीवियों” ने अपने राजनैतिक आकाओं के निर्देश पर जारी किया.

तात्पर्य यह कि, जो भी सरकारें आती हैं, वे केन्द्र अथवा राज्यों में अपनी-अपनी विचारधाराओं तथा राजनैतिक लाभ-हानि के अनुसार पाठ्यक्रम, छवियाँ, प्रतीक रचती रही हैं. दुर्भाग्य से देश के स्वतन्त्र होने के पश्चात “राष्ट्रवादी विचारधारा” कही जा सकने वाली, पाँच-दस वर्ष की टूटी-फूटी सरकारों के अलावा सभी सरकारें (एवं उनके समर्थक दल) ऐसी रही हैं जिन्होंने अपने वोट बैंक के लिए छद्म सेकुलरिज़्म का सहारा लिया. भारतीय इतिहास को विकृत करने वाले इतिहासकारों को प्रमुख पदों पर बैठाया तथा हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान, भारतीय संस्कृति जैसे शब्दों से घृणा करने वाले कथित बुद्धिजीवियों को पुरस्कृत-उपकृत किया. नतीजा यह हुआ कि भारत के विभिन्न पाठ्यक्रमों तथा चार पीढ़ियों के अवचेतन मानस पर ऐसी छवि रच दी गई मानो भारत सिर्फ पराजितों का देश है… ऐसा माहौल बनाया गया मानो अंग्रेजों के आने से पहले भारत में कुछ होता ही नहीं था… यह झूठ प्रचारित किया गया कि विश्व को देने के लिए भारत के पास कुछ नहीं था.

यहीं आकर नरेंद्र मोदी सरकार की सबसे कठिन एवं नई चुनौती आरम्भ हुई. भारत के प्राचीन गौरव को पुनर्स्थापित करने, भारतीय इतिहास के सच्चे नायकों को उनका उचित सम्मान दिलवाने तथा भारत की संस्कृति द्वारा समूचे विश्व को जो अनुपम एवं अनूठा ज्ञान और विचारधारा प्रदान की थी उसका पुनः प्रचार-प्रसार करने की महती जिम्मेदारी को ही “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” कहा जाना चाहिए. पिछले एक वर्ष में भाजपा सरकार ने इस मुद्दे के अनेक पहलुओं पर जमकर काम किया है और धीरे-धीरे अगले पाँच वर्ष में इसके मजबूत परिणाम दिखाई देने लगेंगे.

नरेंद्र मोदी और सुषमा स्वराज ने भारतीय संस्कृति की दो सबसे प्रमुख धरोहरों अर्थात “गीता” एवं “योग” पर सबसे पहले काम शुरू किया. विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने सबसे पहले गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की सुरसुरी छोड़ी और साथ ही यह भी कह दिया कि यह सरकार की प्राथमिकता एवं प्रक्रिया में है. उन्होंने गीता की वकालत करते हुए यह भी कहा कि मनोचिकित्सकों अपने मरीजों का तनाव दूर करने के लिए उन्हें दवाई के साथ-साथ गीता पढ़ने का परामर्श भी देना चाहिए। इससे भी एक कदम आगे बढ़ाते हुए हरियाणा के मुख्यमन्त्री मनोहरलाल खटटर ने मांग की कि गीता को संविधान से ऊपर माना जाना चाहिए। ज़ाहिर है कि नई-नवेली सरकार के इस कदम से सेकुलरिज़्म के पुरोधा भौंचक्के रह गए और उन्हें समझ में नहीं आया कि इसका विरोध कैसे करें? वास्तव में देखा जाए तो सुषमा स्वराज का यह बयान आकस्मिक और आश्चर्यजनक ही था. आकस्मिक इस अर्थ में कि गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करने सम्बन्धी कोई बहस या चर्चा देश में नही चल रही थी और न ही इस आशय की कोई मांग किसी पक्ष की ओर से आई थी. फिर क्या था, लोकसभा की अप्रत्याशित चुनावी हार से तिलमिलाए समूचे विपक्ष ने बवण्डर खड़ा कर दिया… गीता को धार्मिक ग्रन्थ कहा गया, फिर भाजपा-संघ के कथित साम्प्रदायिक एजेण्डे की आलोचना की गई, मुस्लिमों के संगठनों पर दबाव बनाकर उनसे यह कहलवाया गया कि यदि गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित किया गया तो कुरआन और बाईबल को भी किया जाए. जमकर बहस-मुबाहिसे हुए, अखबारों ने गीता के मुद्दे पर अपने पन्ने रंगे, विभिन्न चैनलों पर इस विषय को लेकर आपसी जूतमपैजार भी हुई. लेकिन इससे जनता के बीच भगवतगीता को लेकर जो “छिपा हुआ सन्देश” पहुंचना चाहिए था, वह बराबर पहुँचा.

इसके पश्चात नरेंद्र मोदी का नंबर आया. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अपने उजागर एजेण्डे के तहत उन्होंने अपने प्रत्येक विदेश यात्राओं में सभी देशों के शासनाध्यक्षों को गीता की प्रति भेंट करना शुरू किया. तत्काल ही विदेशी शासकों को भी समझ में आने लगा, कि भारत में सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ है, बल्कि “और भी बहुत कुछ बदला” है और आगे और भी बदलने वाला है. नरेंद्र मोदी ने जापान के सम्राट और वहाँ के प्रधानमंत्री दोनों को गीता की प्रति भेंट की. इसके बाद नरेंद्र मोदी ने अपनी बहुचर्चित अमेरिका यात्रा के दौरान ओबामा दम्पति को भी गीता भेंट की.

इधर जमीनी स्तर पर RSS भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मजबूत करने वाले इस कदम के साथ ताल में ताल मिलाकर चलने लगा. आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने घोषित किया कि मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी 2 दिसंबर को है और इस दिन “गीता जयंती” है। उनके मुताबिक इस दिन भगवतगीता अवतरण के 5151 साल पूरे होते हैं। आरएसएस नेता के अनुसार कलि कैलंडर के हिसाब से यह कलयुग का 5116 साल चल रहा है और गीता उससे 35 साल पहले लिखी गई थी. अतः भगवतगीता पर भारत में पहली बार एक विराट कार्यक्रम आयोजित किया गया. इसका आयोजन आरएसएस से जुड़ी संस्था “ग्लोबल इंस्पिरेशन एंड इंलाइटमेंट ऑफ भगवत गीता (जियो गीता)” संस्था ने किया.

विगत 2 दिसंबर को गीता के रचियता वेद व्यास की तस्वीर वाला डाक टिकट जारी किया गया. इस अवसर पर महात्मा गांधी, विनोबा भावे जैसे स्वतंत्रता सेनानियों जिन्होंने गीता को अपने जीवन में विशेष महत्व दिया, उनके परिजनों को भी लाल किले के समारोह में 7 दिसंबर को सम्मानित किया गया. अलग-अलग देशों से गीता की पांडुलिपियां भी मंगाई गईं. इन्हें एक विशेष प्रदर्शनी में लगाया गया. इस समारोह में 5151 जोड़े उपस्थित थे और 5151 युवक-युवतियां भी जिन्होंने अनुष्ठान करके गीता का पाठ किया. इसी समारोह में यहां ‘विदेशी चिंतक और गीता’, ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गीता का योगदान’, ‘गीता पांडुलिपि’, ‘गीता स्किल ऐंड मैनेजमेंट’ विषय पर प्रदर्शनी भी लगाई गई. कहने का तात्पर्य यह कि जिस भगवतगीता को भारत की पूर्व सरकारों ने कभी भी समुचित स्थान, प्रचार एवं यथोचित सम्मान नहीं दिया था, भाजपा की इस सरकार ने मात्र एक वर्ष के अंदर गीता को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संस्कृति का चमकता हुआ ब्राण्ड बना दिया. यही तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है… और जैसा कि मैंने ऊपर लिखा, प्रतीकों, स्मारकों, चित्रों, शासकीय कर्मकाण्डों का जनमानस पर बहुत प्रभाव पड़ता है… ठीक वैसा ही इस मामले में भी हुआ.

गीताज्ञान एवं अध्यात्म के बारे में छात्रों का ज्ञान बढ़ाने तथा नैतिक बल के उत्थान के लिए मुम्बई महानगरपालिका के सभी स्कूलों में अब भगवदगीता पढ़ाई जाएगी. बृहन्मुंबई महानगरपालिका (एमसीजीएम) के निगम उपायुक्त ने कहा, कि हम छात्रों को स्वतंत्र बनाने और फैसला लेने की उनकी क्षमता को और धार देने के लिए उन्हें भगवदगीता की जानकारी देंगे. इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कष्णा कॉन्श्सनेस (इस्कॉन) की ओर से 15 मार्च को आयोजित गीता चैंपियन लीग प्रतिस्पर्धा के पुरस्कार वितरण समारोह में उन्होंने यह बात कही। एक प्रेस विज्ञिप्ति के मुताबिक, रामदास ने कहा कि एमसीजीएम के अंतर्गत 1,200 स्कूल हैं और कुल 4,78,000 छात्र हैं। कुल 3,500 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत से नौ क्षेत्रीय भाषाओं में बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है। गिरगांव चौपाटी में इस्कॉन के राधा गोपीनाथ मंदिर के आध्यात्मिक गुरू राधानाथ स्वामी ने कहा, हमारे बच्चे हमारा भविष्य हैं. जरूरत इस बात की है कि हम उनकी सुरक्षा करें, भारतीय संस्कृति के बारे में उनका ज्ञानवर्धन करें और समझ विकसित करें। उन्होंने कहा कि भगवदगीता के पाठ से उनमें सकारात्मक सोच विकसित होगी और छात्रों को केंद्रित रहकर नैतिक फैसले लेने में मदद मिलेगी. मोदी-सुषमा के इन प्रयासों पर अंतिम “मास्टर-स्ट्रोक” तब लगा, जब मुम्बई में एक मुस्लिम बच्ची ने भगवतगीता पाठ की चैम्पियनशिप जीत ली. सेकुलरिज्म के पुरोधाओं की गहन चुप्पी से उनकी निराशा भी हाथोंहाथ प्रकट हो गई.

भारतीय संस्कृति की दूसरी सबसे प्रमुख धरोहर अर्थात “योगाभ्यास” पर भी भाजपा की इस सरकार ने देश-विदेश में कई अभूतपूर्व कार्य किए. जैसा कि सर्वविदित है बाबा रामदेव ने रामलीला मैदान काण्ड के बाद काँग्रेस की सरकार को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया था और इस हेतु उन्होंने एक वर्ष तक दस हजार सभाएँ कीं और योग की कक्षाएं लेते-लेते जनता को जागरूक भी करते रहे. वैसे तो योग हजारों साल से भारतीयों की जीवन-शैली का हिस्सा रहा है. दुनिया के कई हिस्सों में इसका प्रचार-प्रसार हो चुका है. कई प्राचीन योगियों तथा योगाचार्य स्वर्गीय श्री अयंगार जैसे कई योगियों सहित बाबा रामदेव ने “योग” को पहले ही अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिला दी थी. परन्तु जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने विश्व पटल पर आक्रामक अंदाज में योग की मार्केटिंग और पैरवी की वह अदभुत था. गौरतलब है कि बीते 27 सितंबर को पीएम नरेंद्र मोदी ने प्रस्ताव पेश किया था कि संयुक्त राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत करनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने पहले भाषण में मोदी ने कहा था कि भारत के लिए प्रकृति का सम्मान अध्यात्म का अनिवार्य हिस्सा है. भारतीय प्रकृति को पवित्र मानते हैं. उन्होंने कहा था कि योग हमारी प्राचीन परंपरा का अमूल्य उपहार है. संयुक्त राष्ट्र में अपना प्रस्ताव रखते वक्त मोदी ने योग की अहमियत बताते हुए कहा था, कि ‘योग मन और शरीर को, विचार और काम को, बाधा और सिद्धि को ठोस आकार देता है. यह व्यक्ति और प्रकृति के बीच तालमेल बनाता है. यह स्वास्थ्य को अखंड स्वरूप देता है. यह केवल व्यायाम नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मनुष्य के बीच की कड़ी है. यह जलवायु परिवर्ततन से लड़ने में हमारी मदद करता है.

मोदी की इस अपील को मानते हुए संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को “विश्व योग दिवस” मनाने का ऐलान किया है. यह निश्चित रूप से भारतीयों एवं भारतीय संस्कृति के लिए गर्व की बात है. यूएन की इस घोषणा के बाद अब इसका फैलाव और तेजी से होने की उम्मीद है. भारत के नेतृत्व में रिकॉर्ड 177 देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था.

प्राप्त सूचना के अनुसार सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजपथ पर योग करेंगे. इस दौरान प्रधानमंत्री के साथ 16 हजार स्कूली छात्र-छात्राएं भी राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक योग करते नजर आएंगे. खास बात यह है कि इस दौरान राजपथ पर दोनों ओर बड़ी तादाद में देशी और विदेशी योग साधक भी मौजूद रहेंगे। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर होने वाले इस आयोजन का जिम्मा “आयुष मंत्रालय” को सौंपा गया है। इसके लिए मंत्रालय ने अपनी तैयारियां भी शुरु कर दी हैं। मंत्रालय मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान से प्राणायाम के आसनों का एक वीडियो भी तैयार करा रहा है। वीडियो का इस्तेमाल योग के प्रचार प्रसार में किया जाएगा ताकि कोई भी व्यक्ति इस वीडियो के जरिए योग के तमाम आसनों को आसानी से सीख सकें। इन सभी तैयारियों के लिए एक विशेषज्ञ समिति भी बनाई गई है। जिसमें व्यास योग इंस्टीट्यूट, बंगलुरू के प्रमुख एस. व्यास और डॉ. ईश्वर वी. वासव रेड्डी शामिल हैं.

योग दिवस के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का मई आखिर से प्रचार -प्रसार किया जाएगा। इसके लिए होर्डिंग्स, टीवी और अखबारों में विज्ञापन दिए जाएंगे। केंद्र की भाजपा सरकार अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मजबूत करने हेतु इस मौके को यादगार बनाने के लिए बड़ा कार्यक्रम कर रही है, जिसमें योग से संबंधित सिक्के और डाक टिकट भी जारी किए जा सकते हैं। सिक्कों और डाक टिकट पर योग व प्राणायाम के आसन को दर्शाने वाली तस्वीरें छापी जाएंगी.

असल में इस तारीख के पीछे एक योग संस्थान की अहम भूमिका है जो पहले से ही 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मना रहा है। उस संस्थान का नाम है कैवल्यधाम योग संस्थान। कैवल्यधाम योग संस्थान महाराष्ट्र के लोनावाला में है और 1924 से ही योग पर प्रशिक्षण और अनुसंधान कर रहा है। कैवल्यधाम की स्थापना स्वामी कुवलयानंद ने की थी और योग पर अपने वैज्ञानिक शोध और अनुसंधान के कारण कैवल्यधाम का नाम पूरी दुनिया में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। कैवल्यधाम देश में पहले ही कई सरकारी संस्थानों के साथ मिलकर योग के क्षेत्र में काम कर रहा है जिसमें शिक्षण संस्था एनसीईआरटी भी शामिल है। हालांकि अमेरिका और यूरोप के कई शों में पहले से ही विश्व योग दिवस का आयोजन होता आ रहा है लेकिन इसकी तिथियां अलग अलग होती हैं। भारत में कैवल्यधाम भी 21 जून को विश्व योग दिवस का आयोजन करता है। गत वर्ष 21 जून को उसने मुंबई में विश्व योग दिवस का आयोजन किया था। इसके तुरंत बाद 24 जून को स्वामी नारायण संप्रदाय के संतो का एक समूह प्रधानमंत्री से दिल्ली में मिला था। पहले से स्वामीनारायण संप्रदाय के साथ मिलकर योग का प्रचार प्रसार कर रहे कैवल्य धाम के प्रतिनिधि भी शामिल थे। आधिकारिक रूप से तो कोई जानकारी नहीं है लेकिन संभवत: इसी मुलाकात के दौरान 21 जून की तारीख विश्व योग दिवस के लिए सुझाई गयी जिसके बाद सितंबर में संयुक्त राष्ट्र के अपने वक्तव्य में प्रधानमंत्री मोदी ने 21 जून को विश्व योग दिवस मनाने की अपील कर दी, जिसे दुनिया ने मान लिया। इधर हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री श्री अनिल विज ने कहा कि योग एवं आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश के ब्रांड एम्बेसडर स्वामी रामदेव एवं मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर की अध्यक्षता में आयोजित सभी मंत्रीगण एवं विभागाध्यक्षों की बैठक में भाग लेंगे। अनिल विज ने बताया कि बैठक में स्वामी रामदेव के साथ आचार्य बालकृष्ण भी मौजूद थे। इस बैठक में स्वामी रामदेव के साथ 21 जून को मनाये जाने वाले विश्व योग दिवस की तैयारियों पर विस्तार से चर्चा हुई तथा योग दिवस को मनाने का ब्लूप्रिंट तैयार किया गया। उन्होंने बताया कि चूँकि दुनिया में पहली बार विश्व योग दिवस मनाया जा रहा है, परन्तु हरियाणा में यह दिवस विशेष तैयारियों के साथ मनाया जाएगा। स्वामी रामदेव हरियाणा में योग एवं आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए ब्रांड एम्बेसडर बनाये गये हैं, इसलिए उनकी सहमति से सभी तैयारियों को अन्तिम रूप दिया जाएगा.

भारत के एक और प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर, ब्रुसेल्स स्थित यूरोपीय संसद में 21 जून को योग दिवस के मौके पर एक विशेष योग समारोह का नेतृत्व करेंगे। यूरोपीय संसद व बेल्जियम में भारत के राजदूत मंजीव सिंह पुरी ने यूरोपीय संसद के राजनीति समूहों के सदस्यों की रजामंदी ली है तथा यूरोपीय संसद में ब्रुसेल्स योग समारोह की मेजबानी के लिए भारत के एक प्रतिनिधिमंडल को भी राजी किया। समस्त बेल्जियम व लक्जमबर्ग में 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए ब्रुसेल्स स्थित भारतीय दूतावास ने योग संघ, स्कूलों तथा शिक्षकों को एक सूत्र में बांधा है। 21 जून को होनेवाले इस समारोह में यूरोपीय संसद तथा बेल्जियम के उच्च स्तरीय प्रतिनिधियों के भाग लेने की उम्मीद है.

यह तो हुई दो प्रमुख मुद्दों अर्थात भगवतगीता और योग की बात… इनके अलावा भी सत्ता संभालने के पहले दिन से ही नरेंद्र मोदी इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के छोटे-छोटे तीरों से कथित बुद्धिजीवियों को घायल करना शुरू कर दिया था. नेपाल यात्रा के दौरान गले में रुद्राक्ष की माला, भगवा वस्त्र धारण किए हुए एवं पशुपतिनाथ मंदिर की पूजा करते हुए किसी प्रधानमंत्री को आज तक भारत की युवा पीढ़ी ने कभी देखा ही नहीं था, इसलिए सभी का अचंभित होना स्वाभाविक था. गंगा आरती में शामिल होना हो, अथवा दक्षिण एशियाई देशों के दौरे पर वहाँ स्थिति शिव मंदिरों में पूजन-अर्चन करना हो… नरेंद्र मोदी ने पुरानी सरकारों की तरह “वोट बैंक की राजनीति” की परवाह न करते हुए सभी हिन्दू धार्मिक कर्मकाण्ड सार्वजनिक रूप से किए, और जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ “छवियों” तथा “प्रतीकों” का जनमानस के मनोभावों पर गहरा प्रभाव पड़ता है. नरेंद्र मोदी जिस भी देश में जाते हैं, वहाँ की मूल संस्कृति को भारत के किसी सांस्कृतिक प्रतीक से जोड़ने का प्रयास अवश्य करते हैं. इसका कूटनीति पर भले ही अधिक प्रभाव ना पड़े, परन्तु उस देश की जनता पर सकारात्मक परिणाम होता है. उदाहरण स्वरूप हाल ही में मंगोलिया की यात्रा के दौरान वहाँ की संसद को संबोधित करते हुए मोदी ने मंगोलिया के राष्ट्रीय प्रतीक में स्थित कमल के फूल को भाजपा और भारत की संस्कृति से जोड़ा… इसी प्रकार दक्षिण कोरिया की यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी ने दो हजार वर्ष पूर्व अयोध्या की राजकुमारी सूर्यरत्ना द्वारा दक्षिण कोरिया की यात्रा एवं कोरियाई राजा किम सुरो से उनके विवाह की चर्चा छेड़ दी. नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत-दक्षिण कोरिया के रिश्ते बहुत प्राचीन हैं, इन्हें और मजबूत बनाना होगा. इस तरह सांस्कृतिक उद्धरणों के जरिये उस देश की जनता के दिल तक पहुँचने का यह अंदाज़ निराला है. इसके अलावा नरेंद्र मोदी श्रीलंका जैसे बौद्ध बहुल देश में बौद्ध भिक्षुओं के समक्ष शीश नवाते अथवा चीन में बौद्ध एवं हान सम्प्रदाय के मठों में धार्मिक क्रियाएँ करते देखे जाते हैं. चीन दौरे के प्रतिफल में नरेंद्र मोदी ने बहुप्रतीक्षित मानसरोवर मार्ग को खुलवाने की सहमति हासिल कर ली. अब भारतीय श्रद्धालुओं को अपेक्षाकृत आसान रास्ते से सीधे गाड़ियों के सहारे मानसरोवर की धार्मिक यात्रा करने का सुख मिलेगा. यह सारे उपक्रम उसी राष्ट्रवाद का एक हिस्सा हैं जिसे केन्द्र की भाजपा सरकार बड़ी सफाई से इस युवा पीढ़ी के दिमाग में बैठाना चाहती है. गत चार मई को बुद्ध पूर्णिमा पर जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने विशाल पैमाने पर तालकटोरा स्टेडियम में बौद्ध धर्मगुरुओं का सम्मेलन एवं सम्मान समारोह आयोजित किया, उससे कई कथित दलित चिंतकों एवं जातिवादी नेताओं के माथे पर बल पड़ गए.

हाल ही में मध्यप्रदेश के नर्मदा किनारे रावेरखेड़ी ग्राम में मराठा साम्राज्य के अपराजेय योद्धा बाजीराव पेशवा की समाधि पर उनकी पुण्यतिथि मनाई गई. मैं भी इस समारोह में उपस्थित था. वहाँ पर जानकारी मिली कि सरदार सरोवर एवं इंदिरा सागर बाँधों के जलभराव के कारण बाजीराव पेशवा की यह समाधि नर्मदा नदी के डूब क्षेत्र में आने वाली थी. स्थानीय ग्रामीणों तथा हिंदूवादी संगठनों के पदाधिकारियों ने पूर्ववर्ती UPA सरकार के समक्ष इस समाधि को बचाने की गुहार लगाई, परन्तु ठेठ प्रधानमंत्री स्तर तक पहुँचने के बावजूद कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई. ऐसा लग रहा था मानो काँग्रेस की सरकार ने बाजीराव पेशवा के अंतिम स्मृति चिन्ह को खत्म करने की ठान ली हो. परन्तु ईश्वर की कृपा से केन्द्र में सरकार बदली, बाजीराव पेशवा की इस समाधि के नदी तरफ वाले हिस्से पर चालीस फुट ऊँची “रिटेन वाल” बनाई गई ताकि डूब में आने के समय नर्मदा का पानी अंदर प्रवेश ना करे. “तुगलक से लेकर औरंगजेब तक को महान बताने वाली पिछली सरकार के कर्ताधर्ताओं के लिए यह एक मानसिक झटका ही कहा जाएगा.

भारत के गौरवशाली इतिहास को जानबूझकर विकृत करने तथा भारतीय राजाओं को “सदैव पराजित एवं अपमानित” दर्शाकर कई पीढ़ियों को मानसिक गुलाम बनाने तथा हीनभावना से ग्रसित करने का जो षड्यंत्र वामपंथी इतिहासकारों ने पिछले पचास वर्ष में लगातार चलाया था, अब इस मोदी सरकार में उसका खात्मा करने का वक्त आ गया है. भारतीय इतिहास शोध परिषद् (ICHR) की सलाहकार समिति से रोमिला थापर एवं इरफ़ान हबीब जैसे कथित इतिहासकारों को निकाल बाहर किया गया है. भाजपा सरकार की मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी पर शपथ ग्रहण करते ही पहले दिन से जिस तरह वैचारिक हमले और बेसिरपैर की आलोचनाएँ हुईं वह कथित इतिहासकारों की उसी छटपटाहट का नतीजा है. हाल ही में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह बयान देकर पुनः खलबली मचा दी कि यदि अकबर महान माना जा सकता है तो महाराणा प्रताप को महान क्यों नहीं मानना चाहिए? राजनाथ सिंह ने कहा की महाराणा प्रताप ने बादशाह अकबर से हार ना मानते हुए अंत समय तक उनसे मुकाबला किया। वे चाहते तो बादशाह से संधि करके अपने प्राण बचा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया तथा अपने प्राणों की आहुति देना अधिक मुनासिब समझा. इसीलिए मैं स्वयं उन्हें महान मानता हूँ. उन्होंने कहा, कि ‘इतिहास को सही संदर्भों में पेश किया जाना चाहिए. महाराणा प्रताप, शिवाजी, बाजीराव पेशवा, तात्या टोपे, मराठा साम्राज्य एवं विजयनगरम साम्राज्य को आने वाली पीढ़ियों के समक्ष एक मिसाल के रूप में पेश किया जाना चाहिए, जिससे देश को प्रेरणा मिलेगी। अर्थात विभिन्न पाठ्यपुस्तकों में भारतीय इतिहास को विकृत करने की भद्दी बौद्धिक कोशिशों पर लगाम कसना भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ही एक हिस्सा है.

भाजपा सरकार के पहले रेल बजट में रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने हिन्दू श्रद्धालुओं के लिए विशेष ट्रेन यात्रा सर्किटों की भी घोषणा की. इसके अनुसार शक्तिपीठों की यात्रा हेतु “देवी सर्किट”, ज्योतिर्लिंगों की यात्रा हेतु “ज्योतिर्लिंग सर्किट” तथा “जैन रेलवे सर्किट” की घोषणा की गई… इसी के साथ “अजमेर-हैदराबाद मुस्लिम/सूफी सर्किट” “बौद्ध सर्किट” एवं नांदेड-अमृतसर सिख सर्किट की भी घोषणा करके विरोधियों का मुँह बन्द कर दिया. इन धार्मिक ट्रेनों के “सामाजिक व राजनैतिक प्रभाव” को समझना आसान है. इसके अलावा पाकिस्तान से प्रताड़ित होकर भारत आने वाले हिंदुओं के लिए भाजपा सरकार ने आधार कार्ड बनवाने की अनुमति दे दी है, जिससे इन हिंदुओं को भारतीय नागरिक बनने एवं स्थायी शरण लेने का मार्ग प्रशस्त हो गया है. ज़ाहिर है कि जब अवैध रूप से भारत में आने वाले और यहाँ आकर लूटपाट, भीख, वेश्यावृत्ति एवं गन्दगी फैलाने वाले बांग्लादेशी यहाँ आराम से ना सिर्फ रह सकते हैं, बल्कि वामपंथियों एवं ममता बनर्जी के वोट बैंक प्रेम में उनके मतदाता परिचय पत्र भी बन सकते हैं, तो फिर बुरी तरह लुटे-पिटे बेचारे पाकिस्तानी हिंदुओं ने क्या बिगाड़ा है?

कुल मिलाकर बात यह है, कि भगवतगीता तथा योग से लेकर भारतीय संस्कृति के सभी सुस्थापित प्रतीक चिन्हों को पुनर्स्थापित करने, एवं उनका प्राचीन वैभव पुनः वापस दिलवाने की इस “राष्ट्रवादी” मुहिम में छोटे-बड़े क़दमों से सफर आरम्भ हो चुका है. नेहरू के प्रतीक को बड़ी समझदारी के साथ सरदार पटेल की छवि से विस्थापित किया जा रहा है… २ अक्टूबर नामक “शासकीय कर्मकांड अवकाश” को स्वच्छता अभियान से रिप्लेस किया जा रहा है.. स्वाभाविक है कि इस युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने एवं साथ लाने इस “मिशनरी छाप रणनीति” में समय जरूर लगेगा, परन्तु इसके दूरगामी परिणाम होंगे. और मजे की बात यह कि वामपंथियों एवं कथित रूप से सेकुलर बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोगों को यह समझ में भी आने लगा है कि भाजपा सरकार का यह “सॉफ्ट राष्ट्रवाद” कैसे उनकी जमीन खिसकाने जा रहा है तथा भविष्य में इन्हें बहुत दुःख देने वाला है. ज़ाहिर है कि यह सरकार कम से कम चार साल तो और रहेगी ही, तब तक उन्हें और क्या-क्या देखने को मिलेगा खुदा जाने… नरेंद्र मोदी कतई जल्दी में नहीं लगते, गरम-गरम खाने से मुँह जलने की संभावना है, वे आराम से ठण्डा करके ही खाएँगे.

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