देश की राजनीति का डिब्बा नहीं ईंजन रहा है बिहार

hamara biharब्रजकिशोर सिंह

मित्रों,आप बिहार को गरीब कहकर हँसी भले हीं उड़ा लें लेकिन इस बात से आप इंकार नहीं कर सकते कि बिहार के लोगों में जो राजनैतिक विवेक है वो कई पढ़े-लिखे और समृद्ध कहलानेवाले राज्यों के मतदाताओं में भी नहीं है। यही कारण है कि चाहे छठी सदी ईसा पूर्व के बौद्ध और जैन धर्म आंदोलन हों या चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य का भारत को एक राष्ट्र में बदलने का अभियान या 1857 का पहला स्वातंत्र्य संग्राम हो या 1920 का असहयोग आंदोलन हो या 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन या 1974 का जेपी आंदोलन बिहार ने ईंजन बनकर देश की राजनीति को दिशा दिखाई है। बिहार के लोग इतिहास को दोहराने में नहीं नया इतिहास बनाने में विश्वास रखते हैं।

मित्रों,अब से कुछ ही महीने बाद बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और बिहार की सारी यथास्थितिवादी शक्तियों ने एकजुट होना शुरू कर दिया है। उनको लगता है कि बिहार में 1995 और 2000 ई. जैसे चुनाव-परिणाम आएंगे। ये विकास-विरोधी,बिहार की शिक्षा को रसातल में पहुँचा देनेवाले,भ्रष्टाचार को सरकारी नीति बना देनेवाले और बिजली,चारा,अलकतरा,दवा-खरीद,धान-खरीद,पुल-निर्माण,एस्टीमेट आदि घोटालों की झड़ी लगा देनेवाले घोटालेबाज लोग सोंचते हैं कि बिहार में अगले चुनावों में भी लोग जाति के नाम मतदान करेंगे और इन जातिवादियों की नैया फिर से किनारे लग जाएगी। नीतीश जी ने तो कई बार मंच से कहा था कि अगर साल 2015 तक बिहार के हर घर में बिजली नहीं पहुँचती है तो वे वोट मांगने ही नहीं जाएंगे। बिजली तो मेरी पंचायत जुड़ावनपुर बरारी में ही नहीं है। शाम होते ही पूरी पंचायत अंधेरे के महासागर में डूब जाती है तो क्या नीतीश जी सचमुच इस चुनाव में वोट नहीं मांगेंगे? नीतीश जी ने 2010 के चुनाव जीतने के बाद कहा था कि इस कार्यकाल में उनकी सरकार भ्रष्टाचार के विरूद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति अख्तियार करेगी तो क्या बिहार से भ्रष्टाचार समाप्त हो गया? फिर क्यों बिहार में रोजाना नए-नए घोटाले सामने आ रहे हैं? क्या यही है जीरो टॉलरेंस की नीति?

मित्रों,कितने आश्चर्य की बात है कि पूरी दुनिया में सत्ता-पक्ष को हराने के लिए मोर्चे बनाए जाते हैं,गठबंधन किए जाते हैं लेकिन बिहार में विपक्ष को रोकने के लिए पहले महाविलय का नाटक किया गया और अब गठबंधन की नौटंकी की जा रही है। कल तक लालू-राबड़ी राज आतंकराज था और लालू-राबड़ी आतंकवादी थे लेकिन आज बड़े भाई और भाभी हो गए हैं। लालू जी भी मंचों से कहा करते थे कि ऐसा कोई सगा नहीं जिसको नीतीश ने ठगा नहीं और खुद पहुँच गए उस आदमी की शरण में जिसने पूरे बिहार की जनता को ठगा है और आज लालू भी खुद को ठगे हुए महसूस कर रहे हैं। नीतीश ने लालू को किनारे लगाकर कांग्रेस से खुद को मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित करवा लिया है और खुद को राजनीति का पीएचडी कहनेवाले लालू जी की समझ में ही नहीं आ रहा है कि अब करें तो क्या करें?

मित्रों,यह सच्चाई है कि जबतक बिहार में भाजपा नीतीश सरकार में शामिल थी तब तक बिहार ने 14 प्रतिशत की दर से विकास किया। तब भी नीतीश कुमार कहा करते थे कि इस रफ्तार से विकास करने पर भी बिहार को अन्य विकसित राज्यों की बराबरी में आने में 20 साल लग जाएंगे और उनके पास 20 साल तक इंतजार करने  लायक धैर्य नहीं है। आज उन्होंने जबसे भाजपा को सरकार से निकाल-बाहर किया है बिहार की विकास दर आधी हो चुकी है और 7 प्रतिशत तक लुढ़क चुकी है। जाहिर है कि अब तो नीतीश जी को 100 सालों तक इंतजार करने लायक धैर्य एकत्रित करना पड़ेगा। लेकिन सवाल उठता है कि क्या बिहार की जनता 100 सालों तक इंतजार करेगी? क्या भारत की तीसरी सबसे बड़ी युवा आबादी को धारण करनेवाले बिहार के लोगों के पास आज 100 सालों तक विकास का इंतजार करने लायक धैर्य है?

मित्रों,कदापि नहीं,कदापि नहीं!!  इतना ही नहीं भाजपा को हटाने के बाद से बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति में इतनी गिरावट हो चुकी है कि लगता है कि बिहार फिर से नीतीशकथित आतंकराज में पहुँच गया है। लालू-नीतीश बिहारी होकर भी बिहार को नहीं समझ पाए हैं। बिहार कोई दिल्ली नहीं है जो बार-बार मूर्खता करे और अपने विकास के मार्ग को रायता विशेषज्ञों को मत देकर खुद ही अवरूद्ध कर ले। बिहार के लोग कम पढ़े-लिखे भले हीं हों लेकिन बिहार का अनपढ़ चायवाला या रिक्शावाला भी इतनी समझ रखता है कि कौन उसका और उसके राज्य का वास्तविक भला चाहता है। बिहार की जनता में अब विकास की भूख जग चुकी है। वैसे भी केंद्र की मोदी सरकार ने बिहार की सारी मांगों को एकसिरे से न सिर्फ मंजूर कर लिया है बल्कि उससे भी ज्यादा दे दिया है जितने कि नीतीश कुमार की सरकार ने मांग की थी। इतिहास गवाह है कि बिहार की जनता लगातार नए प्रयोग करने में विश्वास रखती है। वो लालू और नीतीश दोनों को देख चुकी है,परख चुकी है इसलिए ये दोनों तो इसबार के चुनाव में शर्तिया माटी सूंघते हुए ही दिखनेवाले हैं। भाजपा अगर बिहार में जीतती है तो निश्चित रूप से भारतमाता की बांयीं बाजू को मजबूत बनाने के नरेंद्र मोदी के संकल्प पर तेज गति से काम होगा और दुनिया में भारत अतुल्य भारत तो बनेगा ही वसुधा पर बिहार का भी जोड़ा नहीं मिलेगा। 1947 में जो बिहार प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश में दूसरा स्थान रखता था 2047 आते-आते कदाचित पहला स्थान प्राप्त कर लेगा और बिहार की जनता इस बात को बखूबी जानती और समझती है। ये बिहार की पब्लिक है बाबू और ये जो पब्लिक है वो सब जानती है,कौन बुरा है कौन भला है ये न सिर्फ पहचानती है बल्कि देश में सबसे ज्यादा पहचानती है।

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