मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

rose-तनवीर जाफरी-

‘नरेंद्र मोदी सरकार के एक वर्ष के शासनकाल में देश का अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय भय, आतंक, उपेक्षा तथा भेदभाव के वातावरण में रह रहा है’ -देश के अनेक राजनैतिक व सामाजिक विश्लेषकों के उक्त कथन को एक बार फिर उस समय बल मिला जबकि पिछले दिनों मुंबई के एक प्रतिष्ठित हीरा उद्योग से जुड़ा यह समाचार सामने आया कि ज़ीशान अली खां नामक एमबीए करने वाले छात्र को उसकी तमाम योग्यताओं के बावजूद नौकरी देने से कंपनी ने केवल इसलिए इंकार कर दिया क्योंकि वह मुस्लिम समुदाय से संबंध रखता है। हालांकि ज़ीशान खां को कंपनी की ओर से प्राप्त हुए इस आशय के पत्र के सार्वजनिक होने  तथा मुंबई पुलिस द्वारा ज़ीशान खां की धार्मिक भावनाओं को आहत करने संबंधी प्राथमिकी दर्ज किए जाने के बाद कंपनी ने इस आशय के पत्र से यह कहकर पीछा छुड़ाने की कोशिश की कि ऐसा पत्र कंपनी के एक कर्मचारी द्वारा उसकी गलती के कारण लिखा गया था। परंतु तब तक एच के ई नामक एक्सपोर्ट फर्म की यह करतूत मीडिया में सुिर्खयों में अपनी जगह बना चुकी थी।

देश में लागू आरक्षण व्यवस्थाओं के अतिरिक्त हमारे देश का न केवल संविधान बल्कि देश का धर्मनिरपेक्ष मिज़ाज भी इस बात की इजाज़त नहीं देता कि किसी व्यक्ति को उसकी योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि धर्म के आधार पर सेवा करने का अवसर दिया जाए। परंतु इसके बावजूद देश में सक्रिय सांप्रदायिक शक्तियां अपनी ओर से इस बात के पूरे प्रयास कर रही हैं कि देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को मौका मिलते ही चोट पहुंचाई जाया करे। इसके बावजूद हमारा देश तथा यहां के रहने वाले प्रत्येक धर्म व जाति के लोग भारतवर्ष को विश्व का सबसे सुरक्षित व लोकतांत्रिक देश समझते आ रहे हैं। मुंबई आधारित जिस एचकेई एक्सपोर्ट कंपनी ने ज़ीशान को धर्म के आधार पर नौकरी न दिए जाने का पत्र जारी किया था उसी कंपनी में नौकरी हेतु चयनित किए गए ज़ीशान के एमबीए के ही दो सहपाठियों ओंकार बंसोड़े तथा मुकुंद मणि पांडे ने ज़ीशान के साथ कंपनी के सौतेले व्यवहार के विरुद्ध रोष जताते हुए इस कंपनी में नौकरी करने से इंकार कर दिया। इस घटना से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि देश में चंद सिरफिरे लोग ही सांप्रदायिक हो सकते हैं परंतु देश का संपूर्ण ढांचा तथा यहां का बहुसंख्य समाज धर्मनिरपेक्ष तथा सांप्रदायिक सौहाद्र्र पर विश्वास करने वाला है।

धर्म के आधार पर सौतेलापन बरते जाने का यह कोई इस देश का नया मामला नहीं है। कई दशकों से या कहें कि आज़ादी के समय से ही इस प्रकार की शक्तियां इस देश में सक्रिय हैं। परंतु उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद हमारा देश अपने बुनियादी धर्मनिरपेक्ष मिज़ाज को कायम रखे हुए है। छत्रपति शिवाजी से लेकर अब तक देश का करोड़ों हिंदू देश की पीरों-फकीरों की सैकड़ों दरगाहों व मज़ारों पर नतमस्तक होता आ रहा है। गुरूद्वारों तथा चर्च में पूरी श्रद्धा के साथ जाता है। देश की अनेक मस्जिदों में जाकर नमाजि़यों से अपने बीमार बच्चों लिए दुआएं कराता हैं। मोहर्रम के जुलूस में छबीलें लगाता है तथा ताजि़यादारी व मातमदारी करता है।

यहां एक बार फिर मुझे यह लिखने में कोई हिचकिचाहट नहीं कि हिंदू धर्म विश्व का अकेला ऐसा धर्म है जिसका मिज़ाज अन्य धर्मों की तुलना में सबसे अधिक सहनशील व एक-दूसरे के धर्म का मान-सम्मान करने का जज़्बा रखने वाला है। ऐसे में यदि किसी विशेष विचारधारा अथवा इसी काम में जुटे कुछ विशेष संगठनों के लोग धर्म के आधार पर किसी को नौकरी न देने जैसे अनैतिक कार्यों में शामिल भी हों तो इसका अर्थ यह कतई नहीं लगाया जा सकता कि हिंदू धर्म अथवा देश का बहुसंख्य हिंदू समाज ऐसी सोच रखता है। जहां तक इस प्रकार की कट्टर विचारधारा रखने वाली शक्तियों का प्रश्र है तो निश्चित रूप से यह ताकतें देश में पूरी तरह से सक्रिय हैं। गुजरात में 2002 में इस विचारधारा के संगठनों द्वारा दंगों के समय इस आशय के पर्चे बांटे गए तथा पोस्टर दीवारों पर चिपकाए गए जिनमें गुजरात के हिंदुओं को यह निर्देश दिया गया था कि वे मुसलमानों का सामाजिक, आर्थिक तथा व्यवसायिक बहिष्कार करें। यानी कोई हिंदू किसी मुस्लिम दुकानदार से न तो कोई सामान खरीदे न ही उसे नौकरी पर रखे, न ही उससे किसी प्रकार का लेन-देन करे। निश्चित रूप से इस विचारधारा से जुड़े लोग व संस्थाओं व संस्थानों के इसी विचार के स्वामी वहां ऐसा कर भी रहे हैं। ऐसे सैकड़ों उदाहरण सुनने को मिल चुके हैं कि किसी मुसलमान व्यक्ति को अमुक व्यक्ति ने अथवा अमुक हाऊसिंग सोसायटी में किराए पर मकान नहीं दिया गया। परंतु वहीं उसी गुजरात से ऐसी खबरें भी आती हैं कि इसी हिंदू समाज के लोगों द्वारा विभिन्न शहरों में ऐसी कालोनी का निर्माण भी कराया जा रहा है जहां सभी धर्मों के लोगों के रहने हेतु मकान उपलब्ध कराए जाते हैं।

इस आलेख के संदर्भ में मुझसे जुड़ी कुछ घटनाओं का उल्ल्ेाख करना यहां प्रासंगिक है, का जि़क्र करना चाहूंगा। 1988 में मैं दिल्ली में गारमेंट एक्सपोर्ट के व्यापार से जुड़ा था। उस समय मुझे अपने कारोबार में लगाने के लिए कुछ पैसों की ज़रूरत पड़ी। मैंने अपने एक परिचित चार्टड एकाऊंटेंट सुमित जैन से इस बाबत जि़क्र किया। वह फौरन एक फाईनेंस कंपनी से मुझे ब्याज पर पैसे दिलाने के लिए राज़ी हो गया। साऊथ एक्सटेंशन स्थित उस कंपनी के दफ्तर में सुमित मेरे साथ गया। उसने कंपनी के मालिक को मेरा नाम बताए बिना यह कहा कि यह मेरे मित्र हैं इन्हें एक लाख रुपया चाहिए। उसने सुमित से गारंटी लेने को कहा जिसके लिए सुमित तैयार हो गया। मेरे सामने कंपनी के मालिक ने ऋण संबंधी फार्म रख दिए और उसे भरने को कहा। जब मैंने फार्म भरकर दिया और कंपनी के मालिक ने मेरा नाम पढ़ा तो वह नाम पढ़ते ही चौंक गया। पूरा फार्म पढ़े बिना वह सुमित को उठाकर एक अन्य कमरे में ले गया। उसने सुमित से साफ कह दिया कि में किसी मुसलमान को ऋण नहीं देता। परंतु इस घटना ने मेरे मन में हिंदुओं के प्रति निराशा अथवा निरादर का भाव इसलिए पैदा नहीं होने दिया क्योंकि मुझे ऋण दिलाने हेतु ले जाने वाला तथा मेरी ज़मानत लेने वाला व्यक्ति भी हिंदू ही था। इसी प्रकार छात्र आंदोलनों के समय मुझे कई बार जेल यात्रा भी करनी पड़ी। इत्तेफाक से हर बार जब भी मुझे ज़मानत पर रिहा होने की ज़रूरत महसूस हुई उस समय मेरे हिंदू साथियों ने ही मेरी ज़मानत कराई।

इसी प्रकार एक बार की घटना है कि मेरे कुछ हिंदू मित्रों ने मुझे साथ लेकर अमरनाथ यात्रा पर जाने का कार्यक्रम बनाया। मैं अपने साथियों के साथ अंबाला के करीब राजपुरा (पंजाब)स्थित उस ग्रुप के पास गया जो प्रत्येक वर्ष तीर्थ यात्रियों को अमरनाथ यात्रा पर ले जाने का एक बड़ा नेटवर्क संचालित करता है। यात्रा संचालक ने हमारी फोटो ले ली और मेरे साथी और मैं निर्धारित फार्म भरने लगे। जब भरा हुआ फार्म यात्रा संचालक को दिया गया तो वह मेरा नाम देखकर विचलित हो गया। वह बोला कि यह तो मुसलमानों वाला नाम लगता है। इस पर मेरे साथ गए हिंदू साथियों ने बड़े गर्व से कहा कि हां हम सब मित्र हैं और यह मुसलमान ही हैं। यह सुनकर उस यात्रा संचालक ने मेरा नाम यात्रियों की सूची में लिखने से मना कर दिया और उसने साफ कहा कि अमरनाथ यात्रा में किसी मुसलमान को जाने की ज़रूरत क्या है? उसकी इस हरकत पर मेरे साथियों ने भी अपना नाम यात्रियों की सूची से कटवा दिया। अब इस घटनाक्रम में भी गौरतलब यह है कि कहां तो इतिहास इस बात का साक्षी है कि अमरनाथ गुफा में शिवलिंग बनने की सूचना ही एक मुस्लिम चरवाहे परिवार द्वारा दी गई थी और खबरों के अनुसार आज भी अमरनाथ पर चढऩे वाले चढ़ावे का एक निर्धारित हिस्सा उस मुस्लिम परिवार को दिया जा रहा है। और कहां यह मामूली सा यात्रा संचालक जोकि इसी यात्रा के नाम पर चंदा इकट्ठा कर अपनी व अपने परिवार की रोज़ी-रोटी चला रहा है वह हिंदू धर्म का स्वयंभू ठेकेदार बनकर यह निर्णय लेने लगे कि किस व्यक्ति को यात्रा पर ले जाना है या किसे नहीं, यह कितना हास्यास्पद है।

दिल्ली में मुझे विभिन्न स्थानों पर किराए पर मकान लेकर रहने का अवसर मिला। कभी किसी ने धर्म या जाति के बारे में नहीं पूछा। हां यह प्रश्र ज़रूर कई मकान मालिकों द्वारा किए गए कि आप शाकाहारी हैं या मांसाहारी? यह प्रश्न अपनी जगह पर उचित भी है क्योंकि कोई शुद्ध शाकाहारी व्यक्ति नहीं चाहेगा कि उसके घर में कोई किराएदार मांस अथवा अंडा बनाकर खाए। इस प्रकार की आपत्ति अथवा ऐसी जांच-पड़ताल ने कभी मुझे विचलित भी नहीं किया। क्योंकि यह सवाल धर्म से नहीं बल्कि खान-पान से जुड़ा प्रश्न था। परंतु यदि किसी को धर्म के आधार पर किराए पर मकान न दिया जाए तो उसका उपेक्षित महसूस करना स्वाभाविक है। परंतु इसके बावजूद इस बात की कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती कि पूरा का पूरा देश या समूचा हिंदू समाज ऐसी ही सांप्रदायिक दुर्भावना का शिकार है। ऐसी शक्तियां जब कभी ज़ीशान जैसे लोगों को धर्म के आधार पर नौकरी न देकर धर्म आधारित भेदभाव करने की कोशिश करती हैं उस समय शीघ्र ही ओंकार बंसोड़े तथा मुकुंद मणि पांडे जैसे ज़ीशान के सहयोगी उसे कंधे से कंधा मिलाकर इस बात का सुबूत दे देते हें कि भारतवर्ष का असली ढांचा सांप्रदायिक सौहार्द तथा धर्म आधारित सहयोग की बुनियाद पर खड़ा है।

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