“परमात्मा के सिवा हमारा कोई चिरस्थाई सुखदाता सहारा नहीं है”

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ओ३म्
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हम लगभग सत्तर वर्ष पूर्व जन्में हैं। कुछ वर्ष बाद हमें संसार से चले जाना हैं। हम कहां से आये हैं और मृत्यु के बाद कहां जायेंगे, हमें इसका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं है। वेदादि शास्त्र पढ़ने के बाद हमें यह ज्ञान होता है कि संसार में ईश्वर, जीव तथा प्रकृति का अनादि व नित्य अस्तित्व हैं। यह तीनों पदार्थ नाशरहित हैं, सदा बने रहेंगे, इनका कभी अभाव नहीं होगा। इन तीन सत्ताओं में ईश्वर की सत्ता चेतन सत्ता है जो एक है। ईश्वर संख्या में दो, तीन, चार व अधिक नहीं हैं। जगत के कर्ता ईश्वर की पूरी सत्ता एक है जो अत्यन्त सूक्ष्म, निराकार, सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञ आदि गुणों से युक्त होने पर भी हमें आंखों से दिखाई नहीं देती। उसी ने इस सृष्टि को सब जीवों को सुख देने के लिए बनाया है। बिना कर्ता के संसार में कोई भी बुद्धिपूर्वक उपयोगी रचना नहीं होती। यह सृष्टि भी सृष्टिकर्ता ईश्वर की रचना है। यह सृष्टि सप्रयोजन रचना है। यह सृष्टि परमात्मा ने चेतन, अल्पज्ञ, एकदेशी, ससीम, जन्म-मरण धर्मा जीवों के लिए बनाई है। सभी जीव भी इस सृष्टि में अनादि काल से विद्यमान हैं जिनकी कभी उत्पत्ति वा निर्माण नहीं हुआ। जीवात्मायें संख्या में अनन्त हैं। ईश्वर इनका अनादि, नित्य सखा व साथी है। यह दोनों, ईश्वर तथा जीव, अनादि काल से साथ-साथ हैं और अनन्त काल तक साथ-साथ रहेंगे। ईश्वर अजन्मा है और आनन्दस्वरूप है। उसका मनुष्य आदि प्राणियों के समान जन्म व मरण नहीं होता। जीवों को जन्म व मरण परमात्मा से प्राप्त होता है। मनुष्य के जन्म व मरण का कारण उसकी आत्मा के मनुष्य योनि में किए गए शुभाशुभ कर्म हुआ करते हैं।

हमने पूर्वजन्म में जो शुभाशुभ कर्म किये थे, उनका सुख व दुःख रूपी फल भोगने के लिए परमात्मा ने हमें वर्तमान जन्म दिया है। हमने इस जन्म में जो कर्म किए हैं वह सभी कर्म और पूर्वजन्मों के अभुक्त कर्म मिलकर हमारी मृत्यु के बाद होने वाले जन्मों वा उनकी जाति, आयु और भोग का आधार होंगे। वेद व ऋषियों के बनाये शास्त्रों एवं आप्त वचनों में जन्म का कारण कर्म को माना गया है। यह सिद्धान्त तर्क एवं युक्तिसंगत होने से सत्य एवं यथार्थ है। इस सिद्धान्त को हमें जानना व समझना है। इसे जानकर ही हम असत्य को छोड़कर सत्य कर्मों में प्रवृत्त होकर अपने दुःखों का निवारण कर सकते हैं। हम ईश्वर के सत्यस्वरूप के ज्ञान व उसकी उपासना से जन्म व मरण से छूट कर आनन्दमय परमात्मा को प्राप्त होकर मोक्ष का आनन्द लेते हुए सृष्टि व जगत् में विद्यमान रह सकते हैं। ऐसा नहीं करेंगे तो हमारा बार-बार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म होगा और हमें सुख व दुःख दोनों प्राप्त होते रहेंगे। जन्म-मरण वा आवागमन आदि से मुक्ति सहित मनुष्यों को अपने सत्य कर्तव्यों के बोध के लिए ही परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में आदि चार ऋषि अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को वेदों का ज्ञान दिया था। वेदों के ज्ञान के आविर्भाव के पश्चात ऋषियों व योगियों ने ईश्वर का साक्षात्कार कर सत्यज्ञान को प्राप्त करके उपनिषद, दर्शन एवं मनुस्मृति आदि सत्य शास्त्रों की रचनायें की थी। लगभग दो शताब्दी पूर्व हमारे आर्यावर्त देश में ऋषि दयानन्द का जन्म हुआ था। उन्होंने वेद तथा ऋषियों के बनाये हुए सभी सद्ग्रन्थों वा शास्त्रों का अध्ययन करने सहित योगाभ्यास द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार किया था। मनुष्यों को सद्ज्ञान एवं कर्तव्यादि से परिचित कराने के लिए उन्होंने सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कार विधि, आर्याभिविनय आदि अनेक ग्रन्थों की लोकभाषा हिन्दी में रचना की। धर्मोपदेश, व्याख्यान तथा शास्त्रार्थ आदि द्वारा भी उन्होंने वेदों का प्रचार किया। उनके यह सभी ग्रन्थ एवं उनका जीवनचरित्र भी हमारे ज्ञान एवं मार्गदर्शन के लिए लाभदायक हैं। ऋषि दयानन्द के इन ग्रन्थों का स्वाध्याय वा अध्ययन करने से हम इस सृष्टि के प्रयोजन तथा जीव को दुःखों से छुड़ाने के सभी सत्य साधनों से परिचित होकर अपने पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों का भोग कर दुःखों से मुक्त तथा सुखों से युक्त आनन्दमय मोक्ष को प्राप्त हो सकते हैं। मोक्ष की प्राप्ति ही जीवात्मा की सर्वोत्तम उन्नति व परम गति होती है।

संसार में चेतन ईश्वर, चेतन जीव तथा जड़ प्रकृति तीन सत्ताओं वा पदार्थों का ही अस्तित्व है। यह तीन तत्व व पदार्थ अनादि व नित्य हैं। इन्हें कभी किसी अन्य सत्ता ने बनाया नहीं है। जीव संख्या में अनन्त हैं। यह अनादि काल से कर्म-फल बन्धन में फंस कर जन्म व मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं। यह सिद्धान्त हम पर तथा सभी मनुष्य आदि प्राणियों पर समान रूप से लागू हो रहा है। जब हम जन्म लेते हैं तो हमारा सम्बन्ध हमारे इस जन्म के माता, पिता, दादा, दादी, नाना, नानी आदि अनेक सम्बन्धियों से होता है। कुछ समय बाद हम अपने आचार्यों, मित्रों, भाई-बहिनों आदि से भी परिचित होते हैं। यह सभी सम्बन्ध इसी जन्म में साथ निभाते हैं। जन्म से पूर्व हमारा सम्बन्ध वर्तमान जन्म के सम्बन्धियों व सामाजिक सम्बन्धियों से नहीं होता। पूर्वजन्म में हमारे जो सम्बन्धी होते हैं, उन्हें हम इस जन्म में भूल जाते हैं। ऐसा ही इस जन्म में मृत्यु होने पर भी होगा। इस जन्म के सभी सम्बन्धियों से हमारे सम्बन्ध समाप्त हो जायेंगे और हमें उनकी किसी प्रकार की स्मृति नहीं रहेगी। हमारा पुनर्जन्म होगा और पुनर्जन्म में हमारे नये माता, पिता व अन्य सभी सम्बन्धी बनेंगे। इस वार्ता से यह ज्ञान होता है कि हमारे अपने माता, पिता, आचार्य, सन्तानें, मित्र व अन्य सम्बन्धियों से सम्बन्ध अस्थाई हैं। ईश्वर के अतिरिक्त हमारे सब सम्बन्ध जन्म के बाद बने हैं और मृत्यु के बाद सब टूट जायेंगे। हमारा कर्तव्य है कि हम इन बातों वा प्रश्नों पर विचार करें और अपने वर्तमान जीवन में सुखों की प्राप्ति सहित परजन्म में भी सुख प्राप्ति की अवस्था पर चिन्तन करें। हमारे इन सभी प्रश्नों का उत्तर हमें वैदिक साहित्य सहित ऋषि दयानन्द जी के साहित्य से प्राप्त होता है जो कि सत्य एवं यथार्थ हैं।

हमें ज्ञात होता है कि हमारा जगत के स्वामी एवं कर्ता ईश्वर से चिरस्थाई सम्बन्ध है। हमारा और ईश्वर का परस्पर माता, पिता, भ्राता, भगिनि, बन्धु, सखा, मित्र, आचार्य, राजा, न्यायाधीश आदि अनेकानेक सम्बन्ध हैं। ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध कभी समाप्त नहीं होगा। यह सम्बन्ध अनादि काल से है और अनन्त काल तक बना रहेगा। हर काल, दिन, रात्रि, मृत्यु के बाद, जन्म से पूर्व तथा प्रलय अवस्था में भी हमारा सम्बन्ध परमात्मा से बना रहता है व निश्चय ही बना रहेगा। ईश्वर के साथ इस सम्बन्ध से हमें सुख व आनन्द मिलता है। हमें मोक्ष आनन्द की प्राप्ति भी हो सकती है। मोक्ष में हम 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों तक दुःखों व भय से सर्वथा मुक्त तथा आनन्द से सर्वथा युक्त रहते हैं व रहेंगे। इस अवधि के बाद पुनः श्रेष्ठ कर्म करने पर हमें पुनः मोक्ष प्राप्त हो सकता है। ईश्वर के साथ यह सम्बन्ध अनादि, सनातन, शाश्वत एवं अनन्त काल तक रहने वाला है। अतः हमें ईश्वर को जानने का प्रयत्न करना चाहिये और उसकी कृपा को प्राप्त करने के लिए वेद में परमात्मा द्वारा बताये ईश्वर की उपासना, अग्निहोत्र देवयज्ञ सहित परोपकार आदि के कार्यों को करना चाहिये। ऐसा करने पर ही हमारे जीवन की सफलता है। इसके विपरीत जीवन जीने से हमारा भविष्य व परजन्म नरक के समान दुःखद अवस्था को प्राप्त हो सकते हैं। इस जन्म में ईश्वर को विस्मृत कर मनुष्य पाप कर्मों में प्रवृत्त हो सकता है जिसका परिणाम दुःख व नीच योनियों में जन्मों का मिलना होता है। यदि हम इस विषय में चिन्तन करेंगे और सत्य निष्कर्षों को प्राप्त होंगे तभी हम चिरकाल के लिए दुःखों से बच सकते हैं अन्यथा नहीं। बुद्धिमत्ता इसी बात में है कि हम वेद, वैदिक साहित्य एवं सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का अध्ययन करने के साथ योगाभ्यास सहित परोपकार आदि के कार्यों में प्रवृत्त हों और अपना तथा दूसरों का कल्याण करें।

यह सत्य एवं सिद्ध तथ्य है कि एकमात्र सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, अनादि, नित्य, अविनाशी, दयालु एवं कृपालु ईश्वर ही हमारा अनादि, नित्य वा चिरकालीन संखा व मित्र है। हमें उसकी संगति व उपासना कर अपने जीवन का कल्याण करना चाहिये। ऐसा करने पर हमारा इस जन्म सहित परजन्मों, भावी जन्म, मृत्यु व प्रलय आदि अवस्थाओं का समय भी दुःखों से मुक्त रहेगा वा रह सकता है। जब संसार के सभी लोग इन विचारों व सिद्धान्तों को अपनायेंगे तभी मनुष्य जाति का कल्याण होगा और यह संसार सुख का धाम बनेगा। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब जक वर्तमान के समान ही सबके जीवन में रोग, शोक और आवागमन की स्थिति बनी रहेगी। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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