पुस्तक समीक्षा : ईशादि नौ उपनिषद काव्यानुवाद

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डॉ मृदुल कीर्ति भारत के आर्ष ग्रंथों की एक बेजोड़ और सशक्त व्याख्याकार हैं। उन्होंने नौ उपनिषदों की बहुत ही सुंदर सारगर्भित व्याख्या पद्यात्मक शैली में की है। ईशोपनिषद के विषय में हम पूर्व में ही लिख चुके हैं । इस बार केनोपनिषद पर उनके विचारों को सार संक्षेप में हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।
केनोपनिषद का ऋषि इस उपनिषद का आरम्भ करते हुए कहता है :-

ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः।
केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥१॥

किसकी इच्छा से प्रेरित होकर मन गिरता है ? किसके द्वारा नियुक्त होकर वह श्रेष्ठ प्रथम प्राण चलता है ? किसकी इच्छा से इस वाणी द्वारा बोलता है ? कौन देव चक्षु और श्रोत्र को नियुक्त करता है?

डॉ मृदुल कीर्ति इसका पद्यानुवाद करते हुए बहुत सुंदर शब्दों में अपनी बात को इस प्रकार प्रस्तुत करती हैं —

किससे है प्रेरित प्राण वाणी, ज्ञानेंद्रियाँ, कर्मेंद्रियाँ।
है कौन मन का नियुक्ति कर्ता, कौन संपादक यहाँ॥
अति प्रथम प्राण का कौन प्रेरक, कौन जिज्ञासा महे।
वाणी को वाणी दाता की, करे कौन मीमांसा अहे॥

विदुषी डॉ मृदुल कीर्ति की शब्द संग्रह शक्ति अप्रतिम है। शुद्ध साहित्यिक शब्दों में अपनी बातों को इतनी सरलता से प्रस्तुत करना सचमुच एक ग्रहिणी के लिए बड़ा कठिन है, किंतु डॉक्टर कीर्ति ने यह सब करके दिखाया है। उपनिषद के अगले मंत्र की व्याख्या भी देखने लायक है :-

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः ।
चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥२॥

जो मन का मन अति आदि कारण, प्राण का भी प्राण है।
वाक् इन्द्रियों का वाक् है, कर्ण इन्द्रियों का कर्ण है॥
चक्षु इन्द्रियों का चक्षु प्रभु, एक मात्र प्रेरक है वही।
ऋत ज्ञानी जीवन्मुक्त हो, पुनि जगत में आते नहीं॥

सचमुच वह परमपिता परमेश्वर श्रोत्र का भी श्रोत्र है । मन का भी मन है । वाणी का भी वाणी है । वही प्राण का भी प्राण है और चक्षु का भी चक्षु है । धीर पुरुष उसे जानकर, जीवन्मुक्त होकर, इस लोक से जाकर जन्म-मृत्यु से रहित हो जाते हैं। उस परमपिता परमेश्वर तक हमारे मन प्राण आदि की पहुंच नहीं हो सकती। तभी तो उपनिषद के ऋषि ने लिखा है कि :-

न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः ।
न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥३॥

इसका पद्यानुवाद करते हुए डॉ मृदुल कीर्ति स्पष्ट करती हैं कि :–

उस ब्रह्म तक मन प्राण वाणी, की पहुँच होती नहीं।
फिर ब्रह्म तत्त्व के ज्ञान की, विधि पायें हम कैसे कहीं॥
अथ पूर्वजों से प्राप्य ज्ञान का सार, ब्रह्म ही नित्य है।
चेतन व जड़ से भिन्न है, एकमेव ब्रह्म ही सत्य है॥

इस उपनिषद का दूसरा खंड भी बहुत महत्वपूर्ण है। जिसमें व्यक्ति के अहंकार को तोड़ते हुए ऋषि कहता है :-

यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् ।
यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमाँस्येमेव ते मन्ये विदितम् ॥१॥

डॉ मृदुल कीर्ति ने अपनी निराली लेखन शैली में इस का अनुवाद करते हुए स्पष्ट किया है कि :-

यदि तेरा यह विश्वास कि तू ब्रह्म से अति विज्ञ है।
मति भ्रम है किंचित विज्ञ, पर अधिकांश तू अनभिज्ञ है॥
मन, प्राण में, ब्रह्माण्ड में, नहीं ब्रह्म है ब्रह्मांश है।
तुमसे विदित ब्रह्मांश जो, वह तो अंश का भी अंश है॥

इस प्रतिबोध को जानने वाला ही वास्तव में जानता है । इससे ही अमृतत्व को प्राप्त होता है । उस आत्म से ही शक्ति प्राप्त होती है जबकि विद्या से अमृत की प्राप्ति होती है। ऐसी घोषणा करते हुए उपनिषद् के ऋषि ने लिखा है :-

प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते ।
आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥

डॉक्टर कीर्ति ने इसे भी अपने शब्दों में पिरोते हुए बहुत ही सुंदर भावमाला हमारे समक्ष उपस्थित की है –

यह ब्रह्म का लक्षित स्वरूप ही, वास्तविक ऋत ज्ञान है।
अमृत स्वरूपी ब्रह्म तो, महिमा महिम है महान है॥
जो ब्रह्म बोधक ज्ञान शक्ति, ब्रह्म से प्राप्तव्य है।
उस ज्ञान से ही ब्रह्म का ऋत ज्ञान जग ज्ञातव्य है॥

तृतीय खण्ड खंड में विजयाभिमानी देवों की अभिमान की स्थिति को देखते हुए उपनिषद् के ऋषि ने लिखा कि ब्रह्म ने ही देवताओं के लिए विजय प्राप्त की । ब्रह्म की उस विजय से देवताओं को अहंकार हो गया । वे समझने लगे कि यह हमारी ही विजय है । हमारी ही महिमा है ।

ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त ।
त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति ॥१॥

विजयाभिमानी देवों ने माना स्वयम को ब्रह्म ही।
अतिशय अहंकारी बने, होता विनाशक अहम् ही॥
केवल निमित्त थे देवता, यह ब्रह्म की ही विजय थी।
माध्यम थे केवल देवता, शक्ति प्रभु की अजय थी॥
इसी खंड में यक्ष का चिर परिचित संवाद भी उपस्थित हो जाता है। उस पर भी विदेशी लेखिका ने वेदानुकूल मत व्यक्त करते हुए बहुत ही सुंदर व्याख्या प्रत्येक मंत्र की की है।

चतुर्थ खण्ड का पद्यानुवाद भी देखने योग्य है। बांगी के लिए इसके भी दो चावल हम आपको दिखा देते हैं :-

सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये ।
महीयध्वमिति ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥

उस उमा रुपी ब्रह्म शक्ति ने इन्द्र को उत्तर दिया,
परब्रह्म ने ही स्वयं यक्ष का रूप था धारण किया।
सुर असुर युद्ध में विजय का अभिमान देवों ने किया,
इस मान मर्दन को ही ब्रह्म ने रूप यक्ष का था लिया॥

तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्देवान्यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते ।
ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्शुस्ते ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥

परब्रह्म का स्पर्श दर्शन इन्द्र अग्नि वायु ने,
कर प्रथम जाना ब्रह्म को, लगे ब्रह्म को पहचानने।
ये श्रेष्ठ अतिशय देवता, विश्वानि विश्व प्रणम्य है,
इनके ह्रदय में ब्रह्म तत्व का मर्म अनुभव गम्य है॥

यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते ।
स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥

उपनिषद रूपा ब्रह्मविद्या, आत्म तत्त्व जो जानते,
करें कर्म चक्र का निर्दलन, गंतव्य को पहचानते।
आवागमन के चक्र में, पुनरपि कभी बंधते नहीं,
अरिहंत, पाप व पुण्य के, दुर्विन्ध्य गिरि रचते नहीं॥

उपनिषद का एक-एक शब्द हमारे हृदय की गाँठ को खोलता चला जाता है। उसी शैली को हिंदी काव्य में अपनाकर विदुषी लेखिका ने भी हमारे हृदय की गांठों को खोलने में सफलता प्राप्त की है। जिसके लिए वह बधाई की पात्र हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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