भारत में लोकतंत्र और दागी राजनीति

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 ललित गर्ग

एडीआर की इस ताजा अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार जिन पांच राज्य में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनमें उत्तर प्रदेश की जिन 58 विधानसभा सीटों पर मत डाले जाएंगे, वहां से कुल 623 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

आजादी का अमृत महोत्सव मनाते हुए भारतीय राजनीतिक की शुचिता, चारित्रिक उज्ज्वलता और स्वच्छता पर लगातार खतरा मंडराना गंभीर चिन्ता का विषय है। स्वतंत्र भारत के पचहतर वर्षों में भी हमारे राजनेता अपने आचरण, चरित्र, नैतिकता और काबिलीयत को एक स्तर तक भी नहीं उठा सके। हमारी आबादी पचहतर वर्षों में करीब चार गुना हो गई पर हम देश में 500 सुयोग्य और साफ छवि के राजनेता आगे नहीं ला सके, यह देश के लिये दुर्भाग्यपूर्ण होने के साथ-साथ विडम्बनापूर्ण भी है। कभी सार्वजनिक जीवन में बेदाग लोगों की वकालत की जाती थी, लेकिन अब यह आम धारणा है कि राजनेता और अपराधी एक-दूसरे के पर्याय हो चले हैं। ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ ने हाल ही में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है, जिसके तथ्य भारतीय राजनीति के दागी होने की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जो चौंकानेवाले एवं चिन्तनीय भी है।

एडीआर की इस ताजा अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार जिन पांच राज्य में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनमें उत्तर प्रदेश की जिन 58 विधानसभा सीटों पर मत डाले जाएंगे, वहां से कुल 623 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इसमें से 615 उम्मीदवारों के बारे में एडीआर को जो सूचनाएं मिली हैं, उनसे छनकर आते हुए तथ्यों के अनुसार 156 प्रत्याशी, यानी करीब 25 फीसदी उम्मीदवार दागी, भ्रष्टाचारी एवं अपराधी हैं। 121 पर तो गंभीर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं, जिनमें दोषसिद्ध होने पर पांच साल या इससे भी अधिक की सजा वाले गैर-जमानती जुर्म शामिल हैं। जैसे, हत्या-अपहरण-बलात्कार आदि।
हर बार सभी राजनीति दल अपराधी तत्वों को टिकट न देने पर सैद्धान्तिक रूप में सहमति जताते हैं, पर टिकट देने के समय उनकी सारी दलीलें एवं आदर्श की बातें काफूर हो जाती है। ऐसा ही इन पांच राज्यों के उम्मीदवारों के चयन में देखने को मिला है। एक-दूसरे के पैरों के नीचे से फट्टा खींचने का अभिनय तो सब करते हैं पर खींचता कोई भी नहीं। कोई भी जन-अदालत में जाने एवं जीत को सुनिश्चित करने के लिये जायज-नाजायज सभी तरीकें प्रयोग में लेने से नहीं हिचकता। रणनीति में सभी अपने को चाणक्य बताने का प्रयास करते हैं पर चन्द्रगुप्त किसी के पास नहीं है, आस-पास दिखाई नहीं देता। घोटालों और भ्रष्टाचार के लिए हल्ला उनके लिए राजनैतिक मुद्दा होता है, कोई नैतिक आग्रह नहीं। कारण अपने गिरेबार में तो सभी झांकते हैं।
एडीआर की ही रिपोर्ट बताती है कि विधानसभाओं में ही नहीं, बल्कि मौजूदा लोकसभा के लिए 2019 में जीतने वाले 539 सांसदों में से 233, यानी 43 प्रतिशत सदस्यों ने खुद पर आपराधिक मामले होने की जानकारी दी है, जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में 542 विजेताओं में से 185 दागी चुनकर आए थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा 30 प्रतिशत 543 सांसदों में से 162 था। यानी, 2009 से 2019 तक आपराधिक छवि वाले सदस्यों की लोकसभा में मौजूदगी 44 फीसदी बढ़ गई थी। इसी तरह, गंभीर आपराधिक मामलों में मुकदमों का सामना करने वाले सांसदों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है, जो चिन्तनीय है। ऐसा प्रतीत होता है कि हम जमीन से आजाद हुए है, जमीर तो आज भी कहीं, किसी के पास गिरवी रखा हुआ है। 
लोकतंत्र की कुर्सी का सम्मान करना हर नागरिक का आत्मधर्म और राष्ट्रधर्म है। क्योंकि इस कुर्सी पर व्यक्ति नहीं, चरित्र बैठता है। लेकिन हमारे लोकतंत्र की त्रासदी ही कही जायेगी कि इस पर स्वार्थता, महत्वाकांक्षा, बेईमानी, भ्रष्टाचारिता, अपराध आकर बैठती रही है। लोकतंत्र की टूटती सांसों को जीत की उम्मीदें देना जरूरी है और इसके लिये साफ-सुथरी छवि के राजनेताओं को आगे लाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। यह सत्य है कि नेता और नायक किसी कारखाने में पैदा करने की चीज नहीं हैं, इन्हें समाज में ही खोजना होता है। काबिलीयत और चरित्र वाले लोग बहुत हैं पर परिवारवाद, जातिवाद, भ्रष्टाचार, बाहुबल व कालाधन उन्हें आगे नहीं आने देता।
आजादी के अमृत महोत्सव मनाते हुए राजनीति के शुद्धिकरण को लेकर देश के भीतर बहस हो रही है परन्तु कभी भी राजनीतिक दलों ने इस दिशा में गंभीर पहल नहीं की। पहल की होती तो संसद और विभिन्न विधानसभाओं में दागी, अपराधी सांसदों और विधायकों की तादाद बढ़ती नहीं। यह अच्छी बात है कि देश में चुनाव सुधार की दिशा में सोचने का रुझान बढ़ रहा है। चुनाव आयोग एवं सर्वोच्च न्यायालय इसमें पहल करते हुए दिखाई देते हैं, चुनाव एवं राजनीतिक शुद्धिकरण की यह स्वागतयोग्य पहल उस समय हो रही है जब चुनाव आयोग द्वारा पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर व गोवा का चुनावी कार्यक्रम घोषित हो गया है।

विडम्बनापूर्ण स्थिति तो यह है कि चुनाव-दर-चुनाव आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों की जीत का ग्राफ ऊपर चढ़ रहा है, इसलिए राजनीतिक दल भी मानो अब यह मानने लगे हैं कि दागी छवि जीत की गारंटी है। वैसे भी, चुनावों में हर हाल में जीत हासिल करना ही राजनीतिक पार्टियों का मकसद होता है। इसके लिए वे हर वह जायज-नाजायज तरीका अपनाने को तैयार रहते हैं, जिनसे उनकी मौजदूगी सदन में हो। कुछ जन-प्रतिनिधि यह तर्क देते हैं कि राजनीति से प्रेरित मुकदमे उनके ऊपर जबरन लादे गए हैं। यह कुछ हद तक सही भी है। मगर चुनाव आयोग और अदालत, दोनों का यह मानना रहा है कि जिन उम्मीदवारों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, उनको तो चुनाव लड़ने से रोका जाना चाहिए।
समय की दीर्घा जुल्मों को नये पंख देती है। यही कारण है कि राजनीति का अपराधीकरण और इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार लोकतंत्र को भीतर ही भीतर खोखला करता जा रहा है। एक आम आदमी यदि चाहे कि वह चुनाव लड़कर संसद अथवा विधानसभा में पहुंचकर देश की ईमानदारी से सेवा करे तो यह आज की तारीख में संभव ही नहीं है। सम्पूर्ण तालाब में जहर घुला है, यही कारण है कि कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है, जिसके टिकट पर कोई दागी चुनाव नहीं लड़ रहा हो। यह अपने आप में आश्चर्य का विषय है कि किसी भी राजनीतिक दल का कोई नेता अपने भाषणों में इस पर विचार तक जाहिर करना मुनासिब नहीं समझता। 
सर्वोच्च अदालत ने दागियों को विधायिका से बाहर रखने के तकाजे से समय-समय पहल की है उसका लाभ इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में तो होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। एक समय था जब ऐसे किसी नियम-कानून की जरूरत महसूस नहीं की जाती थी, क्योंकि तब देश-सेवा और समाज-सेवा की भावना वाले लोग ही राजनीति में आते थे। पर अब हालत यह है कि हर चुनाव के साथ विधायिका में ऐसे लोगों की तादाद और बढ़ी हुई दिखती है जिन पर आपराधिक मामले चल रहे हों। हमारे लोकतंत्र के लिए इससे अधिक शोचनीय बात और क्या हो सकती है!

गांधीजी ने एक मुट्टी नमक उठाया था, तब उसका वजन कुछ तोले ही नहीं था। उसने राष्ट्र के नमक को जगा दिया था। सुभाष ने जब दिल्ली चलो का घोष किया तो लाखों-करोड़ों पांवों में शक्ति का संचालन हो गया। नेहरू ने जब सतलज के किनारे सम्पूर्ण आजादी की मांग की तो सारी नदियों के किनारों पर इस घोष की प्रतिध्वनि सुनाई दी थी। पटेल ने जब रियासतों के एकीकरण के दृढ़ संकल्प की हुंकार भरी तो राजाओं के वे हाथ जो तलवार पकड़े रहते थे, हस्ताक्षरों के लिए कलम पर आ गये। आज वह तेज व आचरण नेतृत्व में लुप्त हो गया। आचरणहीनता कांच की तरह टूटती नहीं, उसे लोहे की तरह गलाना पड़ता है। विकास की उपलब्धियों से हम ताकतवर बन सकते हैं, महान् नहीं। महान् उस दिन बनेंगे जिस दिन हमारी नैतिकता एवं चरित्र की शिलाएं गलना बन्द हो जायेगी और उसी दिन लोकतंत्र को शुद्ध सांसें मिलेंगी। 
सभी दल राजनीति नहीं, स्वार्थ नीति चला रहे हैं और इसके लिये अपराधों को पनपने का अवसर दे रहे हैं। इन दागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन की बात लम्बे समय से सुनाई दे रही है, लेकिन इसके गठन का साहस किसी ने नहीं किया। ऐसे आरोपों का सामना कर रहे जनप्रतिनिधियों के खिलाफ एवं लोकतंत्र के सर्वकल्याणकारी विकास लिये भारतीय मतदाता संगठन एवं उसके संस्थापक अध्यक्ष डॉ. रिखबचन्द जैन लम्बे समय से प्रयास कर रहे हैं। आरोपी-दोषी जनप्रतिनिधियों के लंबित मामलों में सुनवाई तेजी से हो, यह अपेक्षित है। इसी से लोकतंत्र का नया सूरज उदित हो सकेगा।

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