मेरी अरथी को कोई कंधा भी न दे

प्रो. राजेन्द्र जिज्ञासु

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लाला लाजपतराय  के बलिदान के पश्चात पंजाब कांग्रेस के पास कोई ऐसा नेता नही था जो उनका स्थान ले सके। पंजाब कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं का एक शिष्ट मंडल देवता स्वरूप भाई परमानंद जी के पास गया और उनसे विनम्र प्रार्थना की कि आप कांग्रेस में सम्मिलित होकर पंजाब कांग्रेस की बागडोर संभालें।

भाई जी ने यह विनती ठुकरा दी। आपका कहना था कि मैं कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति को देशघाती मानता हूं अत: कांग्रेस से जुडऩे का प्रश्न ही पैदा नही होता।

उन लोगों ने पुन: आग्रह किया कि आपने देशहित में जो कष्ट सहे हैं उस कारण से इस समय पंजाब में आप जैसा कोई दूसरा नेता नही है। आपने देखा, लाला जी के शव के साथ कितनी भीड़ थी? यही सम्मान आपको मिलेगा।

इस पर भाई जी ने कहा, यदि मेरी अरथी को कंधा देने के लिए चार व्यक्ति भी न मिलें तब भी मैं अपने सिद्घांतों को नही छोड़ सकता। देश जाति से द्रोह करना मेरे बस की बात नही है। मेरा कोई भी साथ न दे फिर भी मैं देश के लिए ही जिऊंगा। मैं देशहित में ही मरूंगा। भाई जी जैसे सिद्घांतनिष्ठ महापुरूषों के लिए ही किसी विचारक ने कभी लिखा था सत्य उन्हें नाम, प्रसिद्घि व प्रतिष्ठा से भी कहीं अधिक प्यारा था।

अंधेरों को चीरने वाले स्वामी श्रद्घानंद

कर्नाटक में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्तकर्ता डा. कारंत जी ने अपनी आत्मकथा में स्वामी श्रद्घानंद जी महाराज के बारे में अपना एक महत्वपूर्ण संस्मरण दियाा है। आपकी कन्नड़ भाषा में लिखित आत्मकथा का नाम है ‘हुटयू मनस्सिन हन्त, मुखगलू’ अर्थात पागल मन की दशों दिशायें। आपने अपनी इस आत्मकथा में भारतीय इतिहास के पुनर्जजागरन्ण युग की एक रोचक व प्रेरक घटना दी है। आपने वेश्यावृत्ति व बाल विधवाओं की समस्या पर प्रकाश डालते हुए यह घटना लिखी है। डा. कारंत के मन में समाज सुधार के लिए बड़ा उत्साह रहा है। बाल विधवाओं व परिस्थितियों से दबकर वेश्या बन जाने वाली स्त्रियों की दुर्दशा देखकर आपका युवक हृदय तड़प उठा।3

आप चाहते थे कि इन अभागी स्त्रियों का पुनर्विवाह होना चाहिए। इन स्त्रियों का उत्पीडऩ समाज के माथे पर एक कलंग मानकर इस कलंग के टीके को मिटाना चाहते थे। आप इसे मानवता के विरूद्घ एक अपराध मानते थे। उन्हीं दिनों गांधी जी ने भारतीय राजनीति की बागडोर  संभाली थी। आपने इस विषय में गांधीजी का मार्गदर्शन चाहा। आपने पत्र लिखकर पूछा, ये अभागी देवियां क्या करें? गांधीजी ने कृपा करके उत्तर देते हुए लिखा कि ऐसी देवियां आजीवन ब्रह्मचर्य का जीवन बितायें। यह उत्तर पाकर डा. कांरत का कोमल मन आहत हुआ। आपको ऐसा लगा कि गांधीजी को मानवीय स्वभाव का पता ही नही। महात्मा जी सबको अपने जैसा ही मानते हैं।

कुछ दिन के पश्चात डा. कांरत ने शूरता की शान स्वामी श्री श्रद्घानंद जी को भी एक ऐसा ही पत्र लिखा। स्वामी जी तब रूग्ण थे। यह दिसंबर सन 1926 की घटना है। स्वामी जी ने प्रसिद्घ पत्रकार साहित्यकार व गुरूकुल कांगड़ी के स्नातक पं. इंद्रजी से पत्रोत्तर लिखवाया। आपने स्पष्ट शब्दों में यह व्यवस्था व परामर्श दिया कि इन बहिनों का पुनर्विवाह करवाना ही उचित है। यही शास्त्रोक्त है और यही वेदसम्मत है।

श्री कारंत के अनुसार इसके पंद्रह दिन पश्चात ही महान संन्यासी श्रद्घानंद का बलिदान हो गया। यहन् पत्र दिसंबर 1926 के प्रथम सप्ताह में लिखा गया था। स्वामी जी दक्षिण भारत में वेद प्रचार व समाज सुधार आंदोलन को आगे बढ़ाने की योजनाएं बना रहे थे।

यह धन लौटा दो

धर्मप्रेमी जनता पं. गंगाप्रसाद जी उपाध्याय से नई नई पुस्तकों के लेखन व प्रकाशन की मांग करती रहती थी। एक बार एक पुस्तक के लेखक वव प्रकशसन की उनसे विनती की गई। आपने एक लेख देकर अपने प्रेमियों को सूचित किया कि कुछ व्यक्ति एक एक सौा अथवा कुछ अधिक राशि दे दें तो पुस्तक प्रेस में छपने दी जावे। भक्तों ने नियत समय में प्रकाशनार्थ राशि उन्हें पहुंचा दी।एक भाई ने दो सहस्र रूपये या 1इससे भी कुछ अधिक का चैक इस काम के लिए उन्हें भेजा। श्री राधे मोहन जी ने डाक देखकर चैक की सूचना दी तो उपाध्याय जी ने कहा, यह चैक लौटा दो और पत्र लिख दो कि जितना धन चाहिए था वह प्राप्त हो गया है। उस भाई ने पुन: चैक भेजते हुए लिखा कि इसे किसी भी पुस्तक के प्रकाशन के लिए खर्च कर दें। यह आप ही के मिशन के लिए है। पूजय पंडित जी ने फिर लौटाते हुए लिखा, फिर आवश्यकता पड़ेगी तो फिर सूचना दे देंगे। अभी मुझे किसी कार्य के लिए धन का सहयोग नही चाहिए।

उस भक्त को विवस होकर उपाध्याय जी का कहा मानना पड़ा।

सार्वजनिक जीवन में परोपकार के कार्यों में दान की, सहयोग की अपील करनी ही पड़ती है परंतु ऐसे व्यक्ति तो विरले ही मिलेंगे जो आवश्यकता से अधिका धन को आग्रहपूर्वक लौटा देते हैं। हमने कई नामधारी त्यागी साधुओं व बोगस आचार्यों को सदा धन मांगते ही देखा है। श्री पं. गंगा प्रसाद जी उपाध्याय अर्थ शुचिता के लिए एक उदाहरण थे। इससे भी बड़ों के बडप्पन की पहचान होती है।

 

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