आज के ‘औरंगजेब’ के लिए तैयार होती जेल और जनरेशन गैप

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आजकल जनरेशन गैप शब्द का अक्सर प्रयोग होते देखा जाता है। जब हम जनरेशन गैप जैसे शब्द का प्रयोग करते हैं तो कुछ ऐसा संकेत देते हैं कि जैसे नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से कुछ अधिक समझदार और होशियार है । यह स्वाभाविक है कि अगली पीढ़ी पिछली पीढ़ी से अधिक समझदार होने के कारण दोनों पीढ़ियों में एक बड़ा अंतर आ जाता है । जिसके कारण पिछली पीढ़ी को अगली पीढ़ी के समक्ष झुक जाना ही चाहिए। माना यह जाता है कि नई पीढी नई क्रांति और नई सोच लेकर आती है। जिसे पिछली पीढ़ी स्वीकार नहीं करती। इसी कारण दोनों पीढ़ियों में तकरार होती है। ऐसे में अच्छी बात यह होगी कि पिछली पीढी को नई पीढ़ी के क्रांतिकारी और अच्छे विचारों का स्वागत करना चाहिए। नए ज्ञान-विज्ञान के साथ उसके साथ कदम मिलाकर चलना चाहिए।
   वास्तव में जनरेशन गैप एक मतिभ्रम है। जिसे पश्चिम के तथाकथित विकासवादियों ने विकसित किया है या कहिए कि  स्थापित किया है। इन विकासवादियों का मानना है कि मानव अभी भी धीरे-धीरे विकास कर रहा है। उनकी दृष्टि में मानव अभी भी सीखने की अवस्था में है। यही कारण है कि अगली पीढ़ी पिछली पीढ़ी से अधिक समझदार होती जा रही है। विकासवादियों की इसी प्रकार की सोच के चलते आज की सारी सामाजिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त होकर रह गई है। अगली पीढ़ी पिछली पीढ़ी से अधिक समझदार होती जा रही है या समझदार होकर आती जा रही है – विकासवादियों के इस कुतर्क के कारण आने वाली पीढ़ी पिछली पीढ़ी के प्रति अहंकारी हो गई है। इस झूठे अहम के कारण नई पीढ़ी ने पिछली पीढ़ी के संस्कारों और अच्छे विचारों को लेने तक से इनकार कर दिया है। उसको यह झूठा भ्रम हो गया है कि वह अधिक समझदार है, इसलिए पिछली पीढ़ी के लोगों की बातों को मानना उसके लिए अनिवार्य नहीं है। इस छोटी सी बात ने सामाजिक ताने-बाने को अस्त-व्यस्त ही नहीं किया है अपितु पारिवारिक परिवेश को भी बोझिल बना दिया है। हर घर में बेटा पिता से कोई सलाह लेना नहीं चाहता। वह हर काम अपनी मर्जी से करना चाहता है और उसके उपरांत भी वह यह सोचता है कि उसने जो कुछ कर दिया है, वही ठीक है। उसमें किसी के परामर्श की कोई आवश्यकता ना तो थी और ना है। बेटा अपनी इस प्रकार की सोच को ‘जनरेशन गैप’ मानता है और पिता बेटा के इस आचरण से दु:खी होकर अपनी बोझिल जिंदगी को काट रहा है। इसीलिए जब किसी पिता से कोई यह पूछता है कि कैसे हो ? – तो वह यही कहता है कि बस काट रहे हैं समय। सचमुच हर पिता जैसे-तैसे जीवन को काटता है, जीता नहीं है।
    अब जीवन के एक व्यावहारिक पक्ष पर विचार करें। ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो हमसे बहुत पीछे छूटती जा रही हैं। जो लोग इस समय 50 – 60 वर्ष की अवस्था के हैं उन्हें यह भली प्रकार ज्ञात होगा कि किस प्रकार हमारे बड़े बुजुर्ग अपने बड़े बुजुर्गों का सम्मान किया करते थे ? उनकी बातों को सिर झुकाकर स्वीकार करते थे और उनके अनुसार आचरण करते थे । वह पीढी पिता के सामने पुत्र होकर जीना जानती थी । उस समय की नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी का सम्मान करते हुए उससे सीखते हुए आगे बढ़ती थी। जिसका परिणाम यह होता था कि पुरानी पीढ़ी उस समय नई पीढ़ी को बहुत कुछ परंपरागत व्यवहार से सिखा देती थी।  माता-पिता, बड़े -बुजुर्गों, समाज के लोगों और प्राणी मात्र के प्रति कब कैसा व्यवहार करना चाहिए? – इसी को हमारे बुजुर्ग सामाजिकता कहते थे। इस सामाजिकता से ही हमारे धर्म का निर्माण होता था। जिससे हम सब एक दूसरे के प्रति भ्रातृत्व-भाव से बंधकर जीने के अभ्यासी हो जाते थे।
यही कारण था कि उनके भीतर अच्छे संस्कार आते थे। आज की पीढ़ी ने पुरानी पीढ़ी से सामाजिक धर्म और कर्तव्य कर्म को लेने से पूर्णतया इनकार कर दिया है। ऐसी बातें सुनने को अब अक्सर मिलती हैं कि समाज क्या होता है?  सामाजिकता क्या होती है ?   मैं पैसे कमा लूं मेरे पास कार कोठी आदि हो जाएं तो समाज अपने आप मेरे गीत गाने लगेगा। इस प्रकार आज की नई पीढ़ी अहंकार के वशीभूत होकर कहती है कि समाज हमारी मुट्ठी में है। इस अहंकार भरी सोच ने जहां समाज की अवधारणा को भंग किया है, वहीं वसुधैव कुटुंबकम के पवित्र भाव को भी चोटिल करके रख दिया है। परिणाम स्वरूप हर व्यक्ति की व्यक्तिगत जीवन शैली बोझिल होकर रह गई है।
          विकासवादियों की मूर्खता के कारण आज की पीढ़ी पिता के सामने पुत्र होकर ना तो जीना चाहती है और ना ही जीना जानती है। वह पिता के प्रति तानाशाह की भांति आचरण करती है और उल्टे पिता को अपनी बातों को मनवाने के लिए बाध्य करती है। जिसके कारण हर पिता घर में एक ‘पेइंग गेस्ट’ की स्थिति में आ गया है। वह शाम को घर आता है। दो रोटी शाम को खाता है, 2 रोटी सुबह खाता है और फिर तैयार होकर ऑफिस चला जाता है। घर में रात्रि प्रवास का किराया देकर वह अपना जीवन काटता है। सच्चाई यह है कि हममें से अधिकांश पिता इस समय ‘औरंगजेब’ की कैद में हैं। अंतर केवल इतना है कि औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को सीधे जेल में डाल दिया था, जबकि हम खुली जेल में बंद होकर जीवन गुजार रहे हैं। अनेकों पिताओं की स्थिति इस समय ऐसी है कि वे मर भी नहीं सकते और जी भी नहीं सकते।
  ऐसी स्थिति आने के अनेकों कारण हैं। उन अनेकों कारणों में से एक कारण यह भी है कि हमने राम जैसे आज्ञाकारी पुत्र के संस्कारी जीवन को अपने स्कूलों के पाठ्यक्रम से बाहर निकाल दिया।औरंगजेब जैसे लोगों के दुष्ट व्यवहार को एक उदार और अच्छे विचारों वाले शासक के रूप में प्रस्तुत करना आरंभ कर दिया।
    यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि  जिस देश में प्रात:काल उठकर लोग ईश्वर भजन किया करते थे, ईश्वर के नाम के गीत गाया करते थे, यज्ञ हवन करते थे, प्रातः काल में लिए गए शुभ संकल्पों को सारे दिन पूर्ण करने का प्रयास करते थे- उस देश में उल्टी हवा चल गई। नई पीढ़ी पिछली पीढ़ी के इस विचार को मानने से इनकार करने लगी कि सुबह जल्दी उठना चाहिए, माता-पिता को चरण स्पर्श करना चाहिए, यज्ञ हवन करना चाहिए। ईश्वर का भजन करना चाहिए। इन अच्छे विचारों और संस्कारों के स्थान पर ‘गुड नाइट’ करके सोना और ‘गुड मॉर्निंग’ करके सोना व उठना आरंभ हो गया। पिछली पीढ़ी शोर मचाती रह गई कि हमारी अच्छी बातों को ले लो, सुन लो, लेकिन नई पीढ़ी ने कह दिया कि हमें आपके कोई विचार नहीं लेने। विकासवादियों की भारतीय जमात के लोगों ने नई पीढ़ी के पक्ष में आकर शोर मचाना आरंभ कर दिया कि रूढ़िवादी बातों को छोड़ो, नई पीढ़ी को उसके अनुसार जीने दो। उसे टोको मत, रोको मत, उसे वह जो चाहे सो करने दो। इस प्रकार नई पीढ़ी को पिछली पीढ़ी से जितना सीखना चाहिए था या जितना सीखना चाहिए उतना उसने सीखने से पूर्णतया मना कर दिया।
प्रत्येक बच्चे का जन्म हमें यह बताता है कि उसे क, ख, ग सीखने के लिए किसी गुरु की आवश्यकता है। उसे फिर  ज्ञान प्राप्त करना है और उसके लिए माता-पिता से लेकर गुरु ,आचार्य या समाज के बड़े बुजुर्ग लोग सब उसके सहायक हो सकते हैं । उनके प्रति अहंकारी होकर अपने आप को प्रस्तुत करने से बाज रखे।उन सहायकों से वह श्रद्धा के साथ ज्ञान और अनुभव प्राप्त करे।
     वर्तमान पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी के विरुद्ध विद्रोही बनाने का समर्थन तथाकथित बुद्धिजीवियों ने करना आरंभ किया। उनमें वामपंथी विचारधारा सबसे आगे रही। भारत को उजाड़ने में अनेकों लोग सामने आए । जिससे वर्तमान पीढ़ी उच्छृंखल बनती चली गई और उसने अपने अनेकों पिताओं को जेलों में डाल दिया है। मेजर अर्थात वयस्क होते ही किसी भी युवक या युवती को अपने परिवार से विद्रोह करने के लिए वर्तमान न्याय व्यवस्था और तथाकथित बुद्धिजीवी भी प्रेरित करते हैं। कोई भी लड़का किसी भी संबंध की लड़की से विवाह कर ले या कोई भी लड़की किसी भी लड़के के साथ भाग जाए तो यह बुद्धिजीवी और देश की न्याय व्यवस्था उसके बचाव में सामने आ जाती है। इस प्रकार आज की न्यायव्यवस्था और तथाकथित बुद्धिजीवी दोनों समाज और राष्ट्र की परंपराओं का अपने हाथों कत्ल कर रहे हैं। मैंने यह शब्द बहुत सोच समझकर प्रयोग किया है। जिनको यहां पर आपत्ति है मैं उनसे कहना चाहता हूं कि यदि वयस्क हो जाना कुछ भी निर्णय लेने के लिए पर्याप्त है तो चोरी, डकैती, हत्या, लूट और ऐसे ही दूसरे संगीन अपराध भी जब कोई व्यक्ति वयस्क होकर करता है तो उसे यह न्याय व्यवस्था और बुद्धिजीवी लोग अनुच्छेद या अनैतिक क्यों मानते हैं?
     यदि मेजर हो जाना ही सब कुछ है तो उसे  इन अपराधों को भी करने दिया जाए और यदि यह अपराध हैं तो फिर समाज की मान्य परंपराओं की शुद्धता और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए उनकी नैतिकता की कसौटी को भी कहीं ना कहीं नापकर, देखकर, सोच व समझकर पर रखना चाहिए।
    हमें ध्यान देना चाहिए कि अब नई प्रकार की जेलें बनाई जा रही हैं। जिनमें आज की यह बिगड़ी हुई पीढी अपना समय व्यतीत करेगी। यह आज के वृद्धाश्रम ही नई जेलें हैं। आज का पिता तो सड़कों पर, गली मोहल्लों में व्यथित सा , दुखी सा, अकेला सा घूम रहा है पर जो आज उसे इस प्रकार घुमा रहे हैं उनके लिए तो विधिवत जेलों का निर्माण किया जा रहा है । इन जेलों में भेजने के लिए आज की पीढ़ी जहां पुरानी पीढ़ी के प्रति लालायित और उतावली दिखाई देती है वहीं एक समय आएगा कि इनमें घुट- घुटकर मरने के लिए वही अभिशप्त होंगे। ये आज के ‘औरंगजेब’ आने वाले समय में इन्हीं जेलों में अपना समय व्यतीत करेंगे। इन वृद्ध आश्रमों का नाम वृद्ध आश्रम न रखकर ‘औरंगजेब का आश्रय स्थल’ रखा जाना मुझे अच्छा लगता है।
आपका क्या विचार है ?
जब यह सारी जेलें औरंगजेबों से भर जाएंगी, उस समय के लिए सोचो कि तब भारत का क्या होगा ?
  

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक  :  उगता भारत

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