संकीर्ण दायरों में न बांधे विलक्षण प्रतिभाओं को

आदमी जब तक कोई उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाता, जब तक भीड़ का हिस्सा बना रहता है तब वह चाहे कितना मेधावी, उपयोगी, परोपकारी, सेवाभावी और विलक्षण हो, उसकी ओर कोई झाँकने की कोशिश भी नहीं करता।

बेचारा इंसान अपनी व्यक्तिगत मेहनत, कड़े संघर्षों और जाने किन-किन समस्याओं और चुनौतियों से जूझता हुआ अपने आपको स्थापित करने का प्रयास करता है और तब कहीं जाकर कुछ उपलब्धियां अपने बूते हासिल कर पाता है।

आमतौर पर उसकी पूरी संघर्ष यात्रा में न कोई संरक्षण, प्रोत्साहन या मदद देता है, न उसके लिए काम ही आता है। और न ही उसकी परेशानियों को कम करने के लिए अपनी ओर से पहल करता है। यह वह स्थिति होती है जब आदमी को अकेले ही संघर्ष करने को विवश रहना पड़ता है। यह संघर्ष अपने आप से, अपने कहे जाने वाले लोगों से और जीवन की ढेरों चुनौतियों से होता रहता है।

इस संघर्ष यात्रा में कोई उसके साथ नहीं होता। लेकिन जैसे ही कोई प्रतिभाशाली बच्चा मेरिट में स्थान पा जाता है, कहीं कोई बड़ा पद, सम्मान, नौकरी और व्यवसाय पा जाता है, कोई विलक्षण कार्य कर दिखाता है, कोई उपलब्धि हासिल कर लेता है या फिर ऎसा मुकाम पा जाता है जहाँ वह बहुतों के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है। तब सारी की सारी भीड़ उसके पीछे लग जाती है स्वागत, सम्मान और अभिनंदन के लिए, जैसे कि इन स्वागत और सम्मान करने वालों के ही परिश्रम से कोई उपलब्धि सामने आ पायी हो।

जबकि हकीकत ये है कि इस भीड़ का कुछ भी सहयोग उपलब्धियां दिलाने  के लिए नहीं होता। तमाशबीनों की भीड़ अपने-अपने भावी स्वार्थों को देखकर भेड़ों की तरह पीछे जुट जाया करती है और फिर जयगान, प्रशस्तिगान तथा परिक्रमाओं में रमने का दौर शुरू हो जाता है।

जिस समय इंसान को संघर्षों के दौर में मदद, संरक्षण और प्रोत्साहन की जरूरत होती है, उस समय सारे लोग किनारे हो जाते हैं और तमाशबीन होकर देखते रहते हैं। विलक्षण विभूतियों और उपलब्धियां प्राप्त प्रतिभाओं का स्वागत, सम्मान और अभिनंदन होना चाहिए, इससे औरों को प्रेरणा मिलती है लेकिन उस स्वागत, सम्मान या अभिनंदन का क्या औचित्य है जो कुछ बन जाने के बाद दिया जाए।

होना यह चाहिए कि इंसान को उस समय मदद दी जानी चाहिए जब वह सफलता के शिखरों की ओर बढ़ने की यात्रा शुरू करता है। लेकिन इस समय न जाति-बिरादरी वाले सहयोग करते हैं, न अपने क्षेत्र के महान और लोकप्रिय कहे जाने वाले दैवदूत, आम आदमी के रहनुमा या विकास पुरुष कोई मदद करते हैं, और न ही उन लोगों में से कोई आगे आता है जो जाति, धर्म और क्षेत्र के उत्थान के नाम पर चन्दा वसूली से लेकर पब्लिसिटी पाने के लिए भूखों की तरह हमेशा लपकते रहते हैं।

और तो और आदमी अपने बूते जब कुछ बन जाता है तब जाति विशेष के लोग उसे अपना जाति गौरव, प्रेरणास्रोत और अपने वाला बताकर इतनी अधिक पब्लिसिटी करते हैं कि उस व्यक्तित्व का धु्रवीकरण ही हो जाता है जैसे कि वह क्षेत्रीय और वैश्विक पहचान या कद वाला न हो कर जाति विशेष या संकीर्ण दायरों में नज़रबंद ही होकर रह गया हो।

इंसानियत और वैश्विक चिंतन से कोसों दूर रहने वाले लोग जातिवाद के नाम पर बड़े से बड़े आदमियों का कद इतना छोटा कर दिया करते हैं कि यह सब देखकर शर्म भी आती है और तरस भी। यह देखा जाता है कि हर जाति में ऎसे-ऎसे लोगों का समूह बना होता है जो खुद न किसी की मदद करते हैं, न सदभावी होते हैं और न ही संरक्षक या मार्गदर्शक का धर्म निभा सकते हैं।

इन लोगों को हमेशा मंच और लंच चाहिए होता है। हर अवसर को अपने लिए भुनाने और समाज में अपने आपको बड़े के रूप में प्रतिष्ठित और गणपति के रूप में सर्वप्रथम पूज्य बनाए रखने के लिए ये सिद्ध होते हैं और ये ही लोग हैं जिनका जाति के उत्थान से कहीं अधिक अपने यश और प्रतिष्ठा को बनाए रखने का भूत सवार होता है।

ये लोग साल भर कोई न कोई अवसर तलाशते रहकर अपने लिए मंच और पब्लिसिटी का प्रबन्ध कर ही लिया करते हैं। इन्हें न जाति से मतलब है, न अपने क्षेत्र से। अपने अहंकार की पुष्टि और प्रतिष्ठा की तुष्टि के लिए ऎसे लोग पूरे समाज या समुदाय को गुमराह करते हुए मुख्य धारा में बने रहते हैं।

ऎसे लोग समाज, समुदाय या अपने क्षेत्र के लिए किसी सेवा कार्य में धेला भर भी देने तक की उदारता नहीं रखते, बल्कि जो लोग समाजसेवा के लिए उदारतापूर्वक काम करते हैं, उनकी निंदा करते हुए अपने आस-पास टुच्चे लोगों की ऎसी भीड़ हमेशा बनाए रखते हैं जो इनकी झूठन चाट-चाट कर इन्हीं की मानसिकता वाली होकर इनका जयगान करती रहती है।

आजकल काफी सारे लोग ऎसे हो गए हैं जिनका मस्तिष्क मुफत की झूठन और खुरचन चाट-चाट कर मलीन हो गया है और जीभ पैनी-धारदार। अपने आपको बड़ा कहलाने वाले हर इंसान के आस-पास ऎसे झूठन चाटने वालों की भीड़ हमेशा बनी रहने लगी है।

फिर आजकल तो वही सर्वाधिक प्रसिद्ध माना जाने लगा है जिनके पास बुद्धिहीन लठैत, झूठन चाटने वाले और जयगान करने वाले ऎसे लोगों का ज्यादा से ज्यादा जमावड़ा हो, जो न पढ़े-लिखे हैें, न काम-धंधा कर कमा खाने की कुव्वत है, और न ही लोगों के दिलों-दिमाग मेंं इन्हें लेकर किसी प्रकार की कोई श्रद्धा।

खूब सारे ऎसे हैं जो आपराधिक मानसिकता के हैं अथवा ठेकेदारी-दलाली और माफिया धंधों से जुड़े हुए। जिन्हें संरक्षण भी चाहिए और अपना वजूद भी। गांवा, कस्बे और शहर से लेकर महानगरों और राष्ट्रीय स्तर तक की कोई सी प्रतिभा हो, उसे जाति से न बांधे बल्कि वैश्विक और विशेषज्ञता की दृष्टि से महत्व दें।

किसी भी विलक्षण प्रतिभा को जाति के संकीर्ण दायरों में बांधकर देखना उसकी हत्या के बराबर है तथा यह मनोवृत्ति उसके विराट व्यक्तित्व को विखण्डित करती है क्योंकि जब किसी को किसी एक ध्रुव का मान लिया जाता है तब दूसरे ध्रुव से उसका स्वाभाविक संबंध नहीं माना जाता।

हर विलक्षण व्यक्तित्व को जात-पांत के दायरों से दूर रखकर मानवता के लिहाज से देखें। इसमें दोनाें पक्षों का भला है। वरना संकीर्ण दायरों में बंधा आदमी पिंजरे में कैद पक्षी की तरह चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाता और पंख होते हुए भी एक दिन ऎसा आ ही जाता है जबकि वह पंखों को फड़फड़ाना और उड़ना तक भूल जाता है।

दैवगुणी मानसिकता, मानुषी सृष्टि और वैश्विक चिंतन के धरातल पर सोचें और इन बातों को अमल में लाएं। आमतौर पर समझदार लोग जातिवादी मायाओं के घेरे में कभी नहीं फंसते, लेकिन जब एक ही प्रकार के लोगों से बार-बार घिरे रहते हैं तब बाहर की हवाओं से नाता टूट जाता है और ऎसे में संकीर्ण हवाएं मकड़ी के जालों की तरह आदमी को हर पल घिरा हुआ महसूस कराने लग ही जाती हैं।

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