अश्लील संस्कृति के पोषक बनते जा रहे भारत के तथाकथित बुद्धिजीवी

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डॉ़ प्रमोद कुमार दुबे

भारतीय जनमानस और आयातित विचारों में बहुधा अन्तर्विरोध बना रहता है। जब भी अंग्रेजी जगत हमें निजी वैचारिक नेतृत्व देने पर उतारू होता है, उसकी बातंे गले नहीं उतरतीं। पिछले दिनों जब इंटरनेट पर नियंत्रण रखने का विषय उठा, सरकार ने अश्लील चित्रों पर भी रोक लगाई, बाद में वयस्कों के लिए ढील दी, और बच्चों पर रोक कायम रखी। सबको पता है, यह निर्णय देश् के भविष्य को ध्यान में रखकर लिया गया था, लेकिन, इस मुद्दे को अंग्रेजी की एक चर्चित पत्रकार सागरिका घोष ने अपनी नजरिये से उछाला। बताया कि अश्लील चित्रों की खपत के आंकड़े के अनुसार दुनिया में अमरीका और ब्रिटेन के बाद भारत तीसरे नम्बर पर है। इसी अंदाज में-‘मैं आई हूं यूपी बिहार लूटने’ गाते हुए भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को देख व्यक्तिगत खीझ निकाली। उनके आरोपों का कारवां यहीं नहीं रुका, बाजार और राज के मामलों की हदें पार कर उन्होंने वात्स्यायन की रचना और खजुराहो का जिक्र किया, हमेशा अश्लील चित्रों की खोज में रहने वाले चरित्र को उजागर किया और अपने जनतंत्र को ढोंगी बताया। इसके बाद भी क्या बच्चों को ‘पोर्न’ परोसने के बारे में दी गई उनकी दलीलें किसी काम की हैं? नहीं, कोई भी व्यवस्था देश के भविष्य को अंधेरे में धकेलने का काम नहीं कर सकती, यदि ऐसा काम करती है तो उसके होने का कोई औचित्य नहीं बचेगा।
जहां तक जनतंत्र का सवाल है, यह खुला मंच है, किसी एक की तानाशाही नहीं। इसमें पूरा समाज अभिव्यक्त होता है। यहां हर तरह के विचार आते हैं, लेकिन सर्वहित में लिया गया निर्णय ही सवार्ेपरि होता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि प्राकृतिक शक्ति समाज को भविष्य देती है और समाज का संचालन करती है। इसकी अभिव्यक्ति भी जनतंत्र में होगी। इसके लिए जनतंत्र को पाखण्डी व्यवस्था मानना उचित नहीं है। इसी ने बोलने की स्वतंत्रता दे रखी है और वे पत्रकार महोदया बोल रहीं हैं। फर्क यही है कि वह अंग्रेजी मिजाज से बोल रहीं हैं जिसमें भारत को विदेशी नजरिए से पिछड़ों की तरह देखने का मामला है, सिर्फ ‘पोर्न’ का मामला नहीं। उनके अनर्गल प्रलाप को हमारा देशी दिमाग कैसे ग्रहण करता है, यह जानकर उन्हें अपने वक्तव्य पर घोर निराशा होगी।
पहले हम उस पश्चिमी दुनिया की ओर चलते हैं जिसका असर अंग्रेजी माध्यम से आकर केवल उक्त पत्रकार महोदया के ही सिर पर सवार नहीं होता, बल्कि अंग्रेजी शिक्षा की चपेट में आए तमाम बुद्धिजीवियों के विचारों और आचरणों में उसका असर दिखाई दे जाता है। ‘काम’ संबंधी कोई विषय तो इन लोगों में तत्काल ‘वायरल’ हो जाता है। ऐसा क्यों? अंग्रेजी शिक्षा के मारे हुए भारतीयों के संदर्भ में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि काम विषयक प्रभाव जितना इनके मूल संस्कारों में नहीं होता, उससे अधिक इन्हें वह प्रभाव अंगे्रजी के बौद्धिक विटामिन ग्रहण करने से प्राप्त होता है। ये लोग उसी विटामिन के प्रभाव में कभी भारतीय संस्कृति और समाज को रूढि़ग्रस्त समझकर बोलने लगते हैं और कभी ‘काम’ परक अभिव्यक्तियां देख पसोपेश में पड़ जाते हैं कि वह सच है या यह? यह इनकी समझ की अपनी समस्या है, इसे आरोपित भारतीय संस्कृति पर करते हैं।
शिक्षा क्षेत्र के बुद्धिजीवियोंं की विशद चर्चा को छोड़ दें, पत्रकारीय संसार द्वारा भी ‘पोर्न’ परोसकर प्रसार बढ़ने के वाकये को भी बाद में देखें। इस प्रसंग में दिल्ली के एक न्यायालय के बुद्धिजीवी वरिष्ठ न्यायाधीश का लगभग दो दशक पुराना उदाहरण लें। उन्होंने अपने निर्णय में कहा था कि ‘खजुराहो नग्न है, कालिदास के साहित्य में नग्नता है, नग्न होना निजी अधिकार है, इससे किसी पेशे के विकृत होने का मामला नहीं बनता।’ मामला यह था कि एक युवती वकील ने ‘स्टारडस्ट’ नाम पत्रिका के कवर पर अपनी अंग प्रर्दशन करती हुई तस्वीर छपवाई थी और चर्चित हुई तो पेशे की मर्यादा को लेकर महिला वकीलों ने न्यायालय में गुहार लगाई थी। चूंकि खजुराहो और कालिदास का नाम लेकर धर्मिक-सांस्कृतिक विषय को नग्नता के समर्थन में घसीटा गया था, तब इस विषय पर विचार करना अनिवार्य हो गया था। इसी तर्ज पर इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील चित्रों पर बच्चों के लिए सरकार की ओर से रोक लगाए जाने पर अंगे्रजी की पत्रकार महोदया ने कामसूत्र और खजुराहो को हमले का हथियार बना लिया। ‘कामसूत्र’ और खजुराहो के विषय में कुछ चर्चा करने से पहले पश्चिम की दुनिया की काम विषयक ऐतिहसिक परिस्थिति जान लेनी चाहिए, जिसके कारण अंग्रेजी की दुनिया में काम संबंधी विषय को बंधन से मुक्ति की तरह लिया जाता है।
जब भी इस विषय का कोई प्रसंग आता है- शिक्षा के क्षेत्र में अथवा सार्वजनिक स्थानों पर ‘मॉडर्न टोन’ में मुक्त कामवादी धमाल मचाते हैं और जब उसके विरोध में भारतीय संस्कृति के पक्षधर उतर आते हैं तो कोहराम मच जाता है, जबकि फिल्म या पेंटिग आदि कला क्षेत्रों में यदि विकृतिकरण के उद्देश्य से जान-बूझकर कार्य नहीं किया गया, मामला स्वाभाविक है तो कोई ध्यान भी नहीं देता। अंग्रेजी से रचे-बने दिमाग के लोग इस सामाजिक चरित्र की वास्तविकता ठीक से नहीं जान पाते, उलटे इस भारतीय समाज को मिथ्याचारी कहकर निन्दा करते हैं।
‘काम’ संबंधी अंग्रेजी समझ की दशा यह है कि सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ तक यूरोप में काम के विषयों पर चर्चा वर्जित थी, धर्म और नैतिकता की ओर से काम पर अश्लीलता के आरोप लगाए जाते थे। ध्यान रहे कि भारत की तरह यूरोप में काम धर्म और अर्थ के साथ संस्कारित और स्थापित नहीं था, उसे निकृष्ट घोषित करके रखा गया था। अठारहवीं शताब्दी में यूरोपीय समाज में वर्जनाएं शिथिल हुईं और काम विषयक चर्चा होने लगी। जब वर्जनाएं कम हुईं तो जनसंख्या भी बढ़ी। तब वहां की सरकारें भी काम को आर्थिक और सामाजिक समस्या के रूप में देखने लगीं और आंकड़े रखने लगीं। विवाह की उम्र तय करने लगीं। इस प्रकार पहली बार यूरोप में ‘काम शक्ति’ सार्वजनिक चर्चा का विषय बनी। मिशेल पूफको ने अभी 1976 में ही ‘कामुकता का इतिहास’ लिखकर यूरोपीय समाज को व्यवस्थित रूप में ‘काम शक्ति’ का परिचय दिया और इस शक्ति की सामाजिक भूमिका से अवगत करवाया। शताब्दियों तक पश्चिमी समाज में ‘काम’ वर्जनाओं से ग्रस्त रहा, सहज रूप में नहीं, कोप और कुण्ठाग्रस्त होकर रहा, इसीलिए वहां फ्रायड जैसा ‘काम’ विश्लेषक पैदा हुआ। यह बात अंग्रेजी माध्यम के ज्ञानियों के दिमाग में रहती है, जिसके कारण वे लोग ‘काम’ की स्वाधीनता को लेकर कुछ ज्यादा ही भावुक हो उठते हैं। वे कामसूत्र और खजुराहो की नजीर पेश करने लगते हैं, ताकि ‘काम’ की स्वाधीनता पर आंच ना आने पाए।
उन्हें भारतीय परंपरा के वास्तविक ‘काम’ दर्शन का परिचय नहीं है। अंग्रेजी ने उन्हें जड़ से काटकर भ्रम में डाल रखा है। यह प्रसाद उन्हें संस्कृत के माध्यम से अवश्य मिला होता, हिन्दी का रीति कालीन साहित्य भी कुछ सहायक होता, लोक संस्कृति भी मददगार होती। किन्तु, अफसोस है कि जिस अंग्रेजी के पिजरे में उन्हें बन्दी बनाया गया और ‘काम’ दर्शन से उन्हें वंचित किया, उस अंग्रेजी के संस्थापकों ने संस्कृत को मरी हुई भाषा घोषित कर दिया और वे लोग भारतीय साहित्य, संस्कृति और समाज को छोड़ अपने ही घर में अनजान बना दिए गए। वे अब वेद की ‘काम’ संकल्पना कैसे समझेंगे।
यदि हम उन्हें काम शक्ति की संस्तुति में कहा गया मंत्र सुनाएं कि ‘कामो जज्ञे प्रथमो नैनं देवा आपु: पितरो न मत्यारे’- हे काम! आप देवों, पितरों और मनुष्यों सबसे पूर्व स्थित प्रथम यज्ञ हैं अर्थात सृष्टि के पूर्व स्थित हैं, सबसे बड़े हैं-‘काम ज्येष्ठा इह मादयवम्’ तो वे आश्चर्य ही करेंगे। धर्म, अर्थ और काम को त्रिवर्ग कहा जाता है। इन तीनों के शास्त्र भी हैं। पराधीनता के दौर में इन शास्त्रों की भारी दुर्दशा हुई है। उस ऐतिहासिक दुष्चक्र में बहुत सी निधियां खो गईं। कामशास्त्र के उल्लेख मिलते हैं और कामसूत्र भी उपलब्ध है। लेकिन मूल ग्रंथ विकृत हुआ है, मूल गं्रथ की तुलना में कितनी विकृति आई, बताना कठिन है। एक पैमाना अवश्य है, वह यह कि यदि त्रिवर्ग का निर्धारित उद्देश्य उन शास्त्रों से जहां कहीं पूरा नहीं होता है वहां शास्त्र की प्रामाणिकता पर सवाल उठेगा। काम ऐसी दैवीय शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित है जिससे सृष्टि उत्पन होती है, अर्थ शक्ति सृष्टि का पालन करती है और धर्म शक्ति उसका नियमन। यदि ये शास्त्र विकृत किए जाते हैं अथवा काल बाह्य हो जाते हैं तो त्रिवर्ग की सूक्ष्म मंत्र व्यवस्था उस सूत्र और शास्त्र की विकृतियों की पहचान कर सकती है। पर, यह विषय योग सिद्ध दृष्टाओं का है, सामान्य ज्ञानियों का नहीं।
‘काम’ शक्ति केवल देह की दुनिया तक सीमित नहीं, इसकी सर्वव्याप्त अदेही शक्ति-सत्ता उपास्य मानी जाती है। आधुनिकता की अंधेर नगरी में बहुत सी बातें नहीं की जातीं। पुराणों की कथा के माध्यम से उन सृष्टि रहस्यों के विषय में चर्चा अवश्य होती रहती है। यथा, शिव ने तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया। लेकिन, कामदेव का बलिदान सृष्टि के मंगल के लिए हुआ था उनके किसी व्यक्तिगत दोष के कारण नहीं। वृत्रासुर के अत्याचार से त्रस्त देवताओं की इच्छा पूर्ति के लिए ही वे शिव की समाधि तोड़ने गए थे जिससे शिव के साथ पार्वती का विवाह हो जाए, कार्तिकेय जन्म लें और वृत्रासुर का अन्त हो। कामदेव की पत्नी रति ने विलाप किया और तब कामदेव निर्दोष सिद्ध हुए। शिव ने कामदेव को जीवित तो कर दिया, लेकिन उन्हें अदेही ही रखा। सृष्टि की इस अमूल्य कथा में भारतीय ‘काम दर्शन’ छिपा हुआ है और इस दर्शन पर भारतीय कला, साहित्य और सारा सांस्कृतिक वैभव स्थापित है। भारतीय वांगमय और इसके साधकों को अपमानित करके कोई व्यक्ति या व्यवस्था इस कथा का रहस्य जानना चाहे तो यह उसकी मूर्खता है।
आज की पश्चिमी दुनिया को ओशो ने यौन कुण्ठ से मुक्ति के ज्ञान की एक पुडि़या-‘…समाधि की ओर’ देकर ‘कामशक्ति’ का अहसास भर कराया। काम, अर्थ और धर्म के बीच संबंध पर प्रकाश डालना शेष है। अर्थ को सवार्ेपरि मान दुनिया को निचोड़ने वाला यूरोप ‘कामशक्ति’ को ठीक से नहीं समझने और उसे अर्थ के हाथों अपमान करने के कारण आज ‘प्लास्टिक सेक्सुएल्टी’ की चपेट में आ चुका है।
खजुराहो मंदिर की दीवारों पर बनी ‘कामकला’ की मूर्तियों का बार-बार उल्लेख कर भारतीय संस्कारों पर हमला करने वाले लोग मंदिर के भीतर गर्भगृह में झांककर तो देख लेते कि वहां कौन बैठा है? महादेव त्रिनेत्रधारी का दर्शन कर लेते, जिसने काम को भस्म कर दिया। उनका दर्शन बिना योग्यता, तप निष्ठा के यंू ही नहीं होता, आवरण में दृष्टि लिपट कर रह गई तो सत्य के निकट जाने और उसे देखने की योग्यता कहां रही।
साभार- साप्ताहिक पाञ्चजन्य से

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