राजधर्म के सम्यक निर्वाह का पुरस्कार मिल सकता है योगी आदित्यनाथ को ? सर्वे बता रहे हैं दोबारा लौट रहे हैं योगी आदित्यनाथ

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राजधर्म और राजनीति दोनों का गहरा संबंध है। राजनीति में रहकर राजधर्म का निर्वाह करना हर किसी के वश की बात नहीं है। जाति, संप्रदाय ,भाषा प्रांत आदि जैसे पूर्वाग्रह जब राजनीतिज्ञों को बहुत अधिक सीमा तक प्रभावित कर रहे हों, तब उनसे राजधर्म के सम्यक निर्वाह की अपेक्षा नहीं की जा सकती। वर्तमान भारत में तो राजनीति का पर्याय देश के राजनीतिज्ञों ने जाति, संप्रदाय, भाषा और प्रांत को बनाकर रख दिया है। उनके स्तर से ऊपर उठकर राजनीतिक लोग सारे देश के बारे में सोचते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं। सपा के अखिलेश यादव की बात करें तो वह हिंदू समाज को जातियों में बांटकर तार-तार कर देने की हर संभव कोशिश करते हुए दिखाई दे रहे हैं। उनकी मांग है कि जाति आधारित जनगणना करने की व्यवस्था देश में होनी चाहिए।
        कहने का अभिप्राय है कि जाति, पंथ व संप्रदाय के जिस महारोग को मिटाने का संकल्प संविधान ने लिया है या भारत के लोगों से करवाया है उसे फिर से हरा-भरा करने की कोशिश अखिलेश यादव कर रहे हैं। उनकी सारी राजनीति संप्रदाय और जाति के इर्द-गिर्द घूमती हुई रही है। अखिलेश यादव इस समय भी यादव और मुस्लिम वोटों के भरोसे अपने आपको सत्ता में आता हुआ देख रहे हैं । यही स्थिति बसपा की मायावती की है। वह भी जातिगत राजनीति करती रही हैं। इस समय उनकी हालत बहुत पतली है। उनका अपना मतदाता भी उनसे छिटक रहा है। वह वर्तमान परिदृश्य में बहुत ही दयनीय स्थिति में दिखाई दे रही हैं। यद्यपि कांग्रेस से अधिक अच्छी स्थिति उनकी बनी हुई है । उत्तर प्रदेश में कांग्रेस भी एक प्रमुख राजनीतिक दल है। परंतु वह भी इस समय दिशाहीन है। ”किंकर्तव्यविमूढ़’ की स्थिति में फंसी कांग्रेस चुनावी समर को जीतने की तो बात छोड़िए सम्मानजनक ढंग से इससे बाहर निकलने की भी युक्ति नहीं सोच पा रही है। इस प्रकार वर्तमान परिदृश्य में यह तो माना जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में मुख्य टक्कर सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी पार्टी सपा के बीच होनी निश्चित है।
   अब जबकि उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में बहुत कम समय रह गया है तो हर व्यक्ति यह सोच रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की कमान किसके हाथों में होगी ? इस संबंध में कई सर्वे सामने आ रहे हैं। एबीपी सी-वोटर के ताजा सर्वे से पता चला है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सरकार की फिर से वापसी हो सकती है। यद्यपि इस समय सपा भाजपा को प्रमुखता से टक्कर देती हुई भी दिखाई दे रही है। मैं कोई ज्योतिषी तो नहीं हूं और ना ही भविष्यवक्ता हूं, परंतु वर्तमान स्थिति के आधार पर यह अवश्य कहना चाहूंगा कि यदि आज चुनाव होते हैं तो भाजपा अपनी वर्तमान स्थिति में कुछ कम सीटें प्राप्त करके सत्ता में वापिस आ सकती है। जबकि सपा अपनी वर्तमान स्थिति में कुछ सुधार करेगी। बसपा की सीटें कम हो सकती हैं, जबकि कांग्रेस न्यूनाधिक पहले जैसी स्थिति में बनी रहेगी।
      मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली की पारदर्शिता और निष्पक्षता को लोगों का जन समर्थन मिलता हुआ दिखाई दे रहा है। अधिकांश लोग इस बात को लेकर आश्वस्त और संतुष्ट हैं कि योगी के शासनकाल में उन्हें सुरक्षा मिली है और कार्य करने की स्वतंत्रता भी पहले की सरकारों की अपेक्षा अधिक मिली है। मेरा मानना है कि विकास से भी अधिक लोग सुरक्षा और शांतिपूर्ण परिवेश को अधिक प्राथमिकता देते हैं। क्योंकि रोजगार भी सुरक्षा चाहता है। एक बार के लिए लोग पूर्वांचल एक्सप्रेसवे या और किसी इसी प्रकार की सरकारी योजना को भुला सकते हैं, परंतु वह शांति – व्यवस्था और सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
    सामाजिक सुरक्षा की बात करें तो अखिलेश यादव के शासन में जहां 100 से अधिक संप्रदायिक दंगे हुए थे वहां योगी सरकार में एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ। इस बात को मुस्लिम मतदाता भी स्वीकार कर रहे हैं। ऐसे में इस बार भाजपा को मुस्लिमों की वोट मिलने की भी बहुत अधिक संभावना है ।
इन्हीं सब संभावनाओं के चलते 16 दिसंबर के आंकड़ों के मुताबिक सर्वे में 47 प्रतिशत लोगों का मानना है कि आने वाले चुनावों में भाजपा की सरकार बनेगी। वहीं 31 प्रतिशत सपा सरकार की बात कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त बसपा और कांग्रेस चुनावी दौड़ में कहीं बहुत पीछे रहते हुए दिखाई दे रहे हैं कॉन्ग्रेस के लिए जिस समय प्रियंका गांधी आई थीं तो उस समय संगठन में कुछ जान पड़ती हुई दिखाई दी थी , परंतु कुछ समय में ही लोगों ने देख लिया है कि प्रियंका गांधी के भीतर भी कोई विशेष चमत्कार करने की क्षमता नहीं है।
     इसका एक कारण यह भी है कि कांग्रेस के राहुल गांधी के पदचिन्हों पर चलते हुए ही प्रियंका गांधी ने भी कोई ठोस चुनावी रणनीति तैयार नहीं की है ।अपने भाई की तरह वह भी चुनावी मौसम में बाहर निकलकर कुछ करती हुई दिखाई देती हैं। उनकी सोच भी राहुल गांधी की तरह चुनावी सभाओं के माध्यम से ही क्रांति कर देने की बनी हुई दिखाई देती है। उनका यह भी मानना है कि एक दिन दुखी होकर जनता अपने आप ही मोदी और योगी सरकार को सत्ता से बाहर कर देगी और तब उनका आराम से राजतिलक हो जाएगा ,जबकि अब ऐसा नहीं है।
    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बहुत सहजता और दूरदर्शिता से काम करते हुए उत्तर प्रदेश की ताज नगरी की चमक को फीका कर दिया है। उनका यह काम उनके समर्थकों को बहुत पसंद आ रहा है । लोगों की उनसे यह भी अपेक्षा है कि वह एक दिन ‘ताजमहल के सच’ को भी लोगों के सामने ला सकने का ऐतिहासिक कार्य कर सकते हैं । उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के साथ मिलकर अयोध्या को विश्व पटल पर स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। अब उत्तर प्रदेश को ताजनगरी के लिए नहीं बल्कि अयोध्या के राम मंदिर व मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि के साथ-साथ काशी की बाबा विश्वनाथ की नगरी के लिए भी जाना जाएगा।
    बहुत सहज ढंग से मुख्यमंत्री ने भारत की वास्तविक विरासत को विश्व मानचित्र पर स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। जिसको प्रदेश की जनता बड़े ध्यान से देख रही है । इसका लाभ निश्चय ही उन्हें चुनाव में मिलेगा । उपरोक्त सर्वे के पीछे के कारणों पर यदि विचार किया जाए तो हमारे इस मत की पुष्टि होती है।
  कॉन्ग्रेस और बसपा को इस समय प्रदेश के लोगों ने लगभग भुला दिया है। इसी का परिणाम है कि उपरोक्त सर्वे के अनुसार 8 फीसदी लोगों का कहना है कि सूबे में बसपा की सरकार बनेगी और 6 फीसदी लोग कांग्रेस की वापसी बता रहे हैं। बसपा की मायावती के पिछड़ने का एक कारण यह है कि वह केवल और केवल अपने हरिजन वोटों पर केंद्रित होकर रह गई हैं। उससे बाहर निकल कर सोचने और कुछ करने का उन्होंने समय नहीं निकाला है। जबकि कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व छिछोरी बातों में लगा हुआ दिखाई दे रहा है। प्रदेश के समग्र विकास के लिए कोई ठोस योजना प्रस्तुत करने और सरकार को घेरने की कुशल रणनीति का उसके पास अभाव है।
      उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि यूपी चुनाव में अखिलेश यादव की पार्टी सपा सत्ताधारी भाजपा को कड़ी टक्कर दे रही है। वहीं 12 दिसंबर के एबीपी सी-वोटर के सर्वे में पता चला था कि बीजेपी को 212-224 सीटें मिल सकती हैं। इसके अतिरिक्त एसपी को 151-163 सीटें, बीएसपी को 12-24 सीटें और कांग्रेस को 2-10 सीटें मिलने का अनुमान है। जबकि हमारा अनुमान है कि भाजपा ढाई सौ के लगभग सीट ले सकती है।
इतनी सीट लेकर भी यदि वह सत्ता में लौटती है तो यह भी उसकी और विशेष रूप से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की विशेष और शानदार उपलब्धि होगी। यहां हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उत्तर प्रदेश के लोग बड़ी संख्या में योगी आदित्यनाथ में प्रधानमंत्री मोदी का विकल्प खोज रहे हैं। यदि उपरोक्त चुनावों में प्रदेश की जनता इसी फैक्टर पर काम करती है तो उत्तर प्रदेश विधानसभा के आगामी चुनाव ‘मोदी के बाद कौन’ का भी उत्तर दे देंगे।
   16 दिसंबर को अखिलेश यादव ने अपने चाचा और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव से मुलाकात करके अपने गिले-शिकवे को दूर कर साथ चलने का निर्णय लिया है। वास्तव में यह दो पार्टियों का मिलन ना होकर एक परिवार का मिलन मात्र है। हमारा मानना है कि ‘परिवार’ के इस मिलन से भी अब कोई लाभ सपा को होने वाला नहीं है। क्योंकि परिवारवाद की राजनीति से प्रदेश की जनता दु:खी हो चुकी है। पूरे देश की राजनीति पर यदि निष्पक्ष चिंतन किया जाए तो ऐसे परिवार देश के लगभग प्रत्येक प्रांत में पनपे हैं, जिन्होंने हर प्रदेश की राजनीति को क्षत्रपों के रूप में हड़पने का कार्य किया है। अब इनके चंगुल से लोकतंत्र को बचाने के लिए व्यापक स्तर पर चिंतन – मंथन हो रहा है। जिससे देश का मतदाता भी अछूता नहीं है। प्रदेश के मतदाता इस समय राजधर्म निभाने वाले नेतृत्व को प्राथमिकता देंगे।
        मनुस्मृति के 7वें अध्याय में राजधर्म की चर्चा की गयी है। मनु ने अपनी राजधर्म संबंधी व्यवस्थाओं में यह स्पष्ट किया है कि राजा वही उत्तम होता है जो जनता के हित में निर्णय लेने वाला होता है, जिसकी दृष्टि में समरूपता और साम्यता होती है, जो सबका कल्याण चाहता है, जो कानून के पालन करने में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं करता। देश की युवा पीढ़ी अब बहुत कुछ समझदार हो चुकी है । वह पार्टी और व्यक्ति को देखकर नहीं बल्कि शासन में बैठे लोगों की कार्यशैली व्यवहार और नीतियों को देखकर वोट देना पसंद करती है। उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां की जनता जातिवाद, संप्रदायवाद, दंगे फसाद आदि से दु:खी और उत्पीड़ित चली आ रही थी। उपरोक्त सर्वे में यदि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस समय सबसे आगे चलते दिखाई दे रहे हैं तो स्पष्ट है कि प्रदेश की जनता उनके समदर्शी और पारदर्शी शासन से कहीं ना कहीं सहमत है।

    कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी राजधर्म के बारे में कहा गया है कि :-
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं प्रियं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं प्रियम्॥ (अर्थशास्त्र 1/19)

अर्थात्-प्रजा के सुख में राजा का सुख है, प्रजाके हित में उसका हित है। राजा का अपना प्रिय (स्वार्थ) कुछ नहीं है, प्रजा का प्रिय ही उसका प्रिय है।
तस्मात् स्वधर्म भूतानां राजा न व्यभिचारयेत्।स्वधर्म सन्दधानो हि, प्रेत्य चेह न नन्दति॥ (अर्थशास्त्र 1/3)

अर्थात्- राजा प्रजा को अपने धर्म से च्युत न होने दे। राजा भी अपने धर्म का आचरण करे। जो राजा अपने धर्म का इस भांति आचरण करता है, वह इस लोक और परलोक में सुखी रहता है।) एक राजा का धर्म युध भूमि में अपने दुश्मनों को मारना ही नहीं होता अपितु अपने प्रजा को बचाना भी होता है।
  सावरकर जी कहा करते थे कि राजनीति का हिंदूकरण होना चाहिए । संप्रदाय निरपेक्ष राजनीति ही हिंदू राजनीति है । जिसमें ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ – का गंभीर चिंतन समाविष्ट होता है वही राजनीति हिंदू राजनीति कहलाती है ।चाणक्य के उपरोक्त सूत्र को आधार बनाकर यदि राज्य कार्य चलाया जाएगा तो निश्चय ही जनता ऐसे मुख्यमंत्री का समर्थन करेगी । मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का समर्थन करने वाले लोगों का मानना है कि वह हिंदू राजनीति के इसी आदर्श के आधार पर शासन चला रहे हैं ,जिसके चलते प्रदेश की जनता उनका साथ देने का मन बना रही है।
  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ एक नकारात्मक बिंदु यह है कि उन्होंने अपने पार्टी के कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों और विधायकों तक को जनता के काम कराने के लिए अधिकारियों पर दबाव बनाने की स्वतंत्रता नहीं दी। जिससे उनकी पार्टी के कार्यकर्ता, पदाधिकारी और विधायक तक अपने आपको लोगों से बचाते व छुपाते से दिखाई दिए हैं ।अब वह किस मुंह से जाकर लोगों से वोट मांगें ? -यह उनके साथ एक समस्या है।
बस , यही समस्या आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा की कुछ सीटें कम करने में सहायक होगी। इसके उपरांत भी भाजपा इस समय सत्ता में लौटती हुई दिखाई दे रही है, जो कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पार्टी के लिए बहुत ही शुभ संकेत है।

  • डॉ राकेश कुमार आर्य

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