व्यक्तित्व के निर्माण में परिस्थितियों और परिवेश की भूमिका

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दिनेश चमोला ‘शैलेश’

जीवन के विकास तथा व्यक्तित्व के निर्माण में परिवेश एवं सामाजिक स्थितियों की महती भूमिका होती है। जिस परिवेश में मनुष्य बचपन से जीवनयापन करता चलता है, संस्कारों से, उस उर्वरा भूमि से ही वह जहां कुछ न कुछ सीखता है, वहीं सक्षम होने पर कुछ न कुछ नैसर्गिक रूप से उसे गुणात्मक रूप में लौटाता भी रहता है।

यह दुर्लभ जीवन, जहां क्षण-क्षण सहेज कर इसे नाना प्रकार के गुणात्मक पुष्पों से अलंकृत कर सजाता-संवारता रहता है, उसके समानांतर ही द्वेष का दैत्य इसके महत्व व वैभव को भंजित करने की घात लगाए बैठा रहता है। संगति अथवा कुसंगति का प्रभाव, मानवीय चरित्र के विकास व ह्रास की दिशा व दशा को सुधारने अथवा बिगाड़ने में पूर्ण रूप से सहायक होता है।

संगति की किसी भी मनुष्य के जीवन-विकास अथवा जीवन-लक्ष्य निर्धारण में अपूर्व भूमिका होती है। जिस तरह की संगति में हम रहते हैं, वैसी ही गुणात्मकता अथवा निकृष्टता नैसर्गिक रूप से हमारे चरित्र को आच्छादित कर देती है और धीरे-धीरे हम उसके समकक्ष अथवा उसी शृंखला में अग्रिम स्थिति में आने या लक्ष्य पाने को उत्प्रेरित अथवा बाध्य हो जाते हैं।

एक अवगुण, सौ गुणों के महत्व को भी धूल-धूसरित करने में देर नहीं लगाता। कलियुग में गुणात्मकता, पुण्य, सत्य व आदर्श का प्रसार जितनी धीमी गति से होता है, उसकी अपेक्षा असत्य, पाप, अवगुण व नकारात्मकता का प्रभुत्व, प्रभाव व प्रसार तीव्रतर गति से होता है। सत्य को सत्य सिद्ध करने के लिए एकमात्र सत्य ही होता है, जबकि एक असत्य, सत्य को असत्य सिद्ध करने के लिए सैकड़ों सत्यों की सप्रमाण रचना कर देता है।

यह बात दीगर है कि अंततः सत्यमेव जयते यानी सत्य ही विजयी होता है। लेकिन यह अवश्य है कि अवगुण की संगति करने पर महिमा गुण की घटती है। संसार में अपात्र, अयोग्य व दुर्जन का संग करने से किसको हानि नहीं हुई है?

कुसंगति के प्रभाव से जहां गुणात्मकता कलुषित होती है, वहीं असत्य व अवगुणों को सीना फुलाकर अन्यान्य मार्गों में आगे बढ़ने के अवसर मिल जाते हैं। इससे सत्य जहां कु-परिभाषित होकर झूठ के कठघरे में खड़े हो जाने के लिए बाध्य हो जाता है, वहीं असत्य एवं अवगुण को गरिमा, महत्व एवं उपादेयता की हांडी हाथ लग जाती है। जिस अनुपात में सज्जन के सत्संग से दुर्जन की गुणात्मकता का ग्राफ ऊपर की ओर बढ़ता है, उसी अनुपात में दुर्जन की संगति से सज्जन का चरित्र, व्यक्तित्व एवं गुणवत्ता क्रमशः कलंकित होती चली जाती है। कुसंगति, उस जोक की तरह है जो उनकी गुणात्मकता के लहू को सोख कर ही दम लेती है।

ईश्वर, जीव के चरित्र, कर्म, चिंतन व संस्कारों के हिसाब से ही उसकी कोटि का निर्धारण करते हैं। यद्यपि हंस व कौअा दोनों जीव ही हैं किंतु विगत कर्मों की सकारात्मकता व नकारात्मकता ही उनके व्यक्तित्व को चारित्रिक दृष्टि से अलग-अलग रूप में परिभाषित करती है। दुर्जन व्यक्ति के चित्त का परिष्करण संभव नहीं है। किंतु सज्जन व्यक्ति सदैव चित्त व चिंतन की शुद्धि में विश्वास कर स्वयं को परिमार्जित व परिशुद्ध करता रहता है। कबीरदास कहते हैं :-

दाग जो लागा नील का, सौ मन साबुन धोय।

कोटि जतन पर बोधिये, काग हंस न होय॥

पापी, पाप करने के लिए अभिशप्त है; दुष्ट, दुष्टता के लिए और कृतघ्न, कृतघ्नता के लिए। इसलिए किसी की प्रकृति और प्रवृत्ति को, बिना उसकी जिज्ञासा, इच्छा व मनोवृत्ति के बदल पाना नितांत कठिन है। जीवन की दुर्लभता व समय की उपादेयता का लाभ उठाते हुए कुसंगति के दंश से सदैव बचना चाहिए क्योंकि नीच व्यक्ति का नीच कर्म से बाज आना संभव नहीं होता। कुसंगति के दुष्प्रभाव से किसका विनाश नहीं होता? नीचता ग्रहण करने से बौद्धिक चातुर्य समाप्त हो जाता है। गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं :-

को न कुसंगति पाय नसाई।

रहै न नीच मते चतुराई॥

संस्कारों की दृढ़ता, व्यक्तित्व को अधिक निर्भय बनाती है। जितना जिसके सद‍्चिंतन एवं सत्कर्म में दम होगा, उतना ही उसका प्रभुत्व अपने पास-परिवेश पर अधिक होगा। फिर कुसंगति का दैत्य उसका बाल-बांका भी नहीं कर सकेगा। यही तो कवि रहीम भी कहते हैं :-

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।

चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग॥

इसीलिए, सज्जन व्यक्ति को दुर्जन की कुसंगति त्याग कर अपने सद‍्चिंतन एवं सत्कर्म के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर होना चाहिए।

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