विकसित समाज बनाने का कोई सस्ता उपाय नहीं

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गुरबचन जगत

जनता यानी मतदाता की आवश्यकताएं-आकांक्षाएं और राजनेताओं की तरजीहें, इनके बीच व्याप्त बहुत बड़े फर्क पर इससे पहले भी काफी लिखा जा चुका है। नतीजतन लोगों के बीच असंतोष का स्तर बढ़ा है। जनता को चाहिए तो बस विकास, न्यायवादी और उत्तरदायी प्रशासनिक व्यवस्था, और यही देने में राजनीतिक दल सरकार बनाने के बाद ज्यादातर विफल रहे हैं। आखिर हम खुद को ऐसी शोचनीय अवस्था में क्यूं पा रहे हैं, जो एक ओर बीमारी, बेरोजगारी, भुखमरी, सीमा पर चढ़ आए वैरी पड़ोसी से त्रस्त है तो वहीं समाज संप्रदाय, जाति, बोली, क्षेत्रवाद के आधार पर आपस में बंटा है। इन्हीं से मुक्ति को संविधान निर्माताओं ने संविधान के जरिये हमें सशक्त करना चाहा।

लगता है, राजनीतिक दल और नेतृत्व के लिए एकमात्र एजेंडा राष्ट्रीय अथवा राज्यस्तरीय नीतियां बनाने की बजाय निजी उपलब्धि पाना है। राजनेता चीजों को आम आदमी और उसकी जरूरतों के नज़रिए से नहीं देखते। वक्त पड़ने पर, वे उन्हें दोहन करने लायक वोट बैंक की तरह लेते हैं। पांच राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों को ही लें। किसी भी कीमत पर ‘वोट जीतने’ की खातिर सत्तासीन और सत्ताविहीन दलों के बीच मुफ्त की सुविधाएं-छूट देने की घोषणा करने वाली दौड़ लगी है। कहीं बिजली दरें घटाई जा रही हैं, तो कोई तीर्थस्थलों की मुफ्त रेल यात्रा का वादा कर रहा है, पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में कमी लाई जा रही है, कहीं रोजमर्रा की वस्तुओं के भाव घटाए जा रहे हैं तो कुछ राज्यों ने तो भर्ती नियमों में बदलाव करके 60-70 फीसदी नौकरियां सिर्फ ‘सूबा पुत्रों’ को देना तय किया। क्या यही है राष्ट्र निर्माण? क्या यही है भारत बनाने का नजरिया? ये दल भारत को किस दृष्टि से देखते हैं?

भाजपा के विचार वाला भारत विशिष्ट है, जहां धर्म मूल मार्गदर्शक सिद्धांत है। कांग्रेस का अपना दृष्टिकोण मटमैला है और इसको साफ तौर से समझाने वाला कोई नहीं है। सूबाई दलों का नज़रिया बदलता रहता है, जो सत्ता में होने या उससे बाहर होने पर निर्भर होता है। कुछ उन नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर अपने क्षेत्रीय दल बना लिए थे। मसलन, टीएमसी, एनसीपी, वाईएसआर। दक्षिण भारत में खेल एकदम अलग किस्म का है और उसकी अपनी तरज़ीहें हैं। यदि धर्म, जाति, क्षेत्रवाद अधिकांश दलों का मूल आधार है तो फिर भारत रूपी विचार कहां है? ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, शरद पवार, एमके स्टालिन, केसीआर, नीतीश कुमार और लालू कद्दावर शख्सियतें हैं, लेकिन अपनी पार्टियां निजी पसंद-नापसंद के मुताबिक चलाते हैं। मुख्यधारा के राजनीतिक दल भी लगभग एक व्यक्ति या परिवार पर निर्भर होते जा रहे हैं। सामूहिक नेतृत्व, काबीना की संयुक्त जिम्मेवारी और निर्णय लेने वाली भूमिका अब नहीं रही। हमारे लोकतंत्र का मूल आधार है कि चुने गए सांसद और विधायकों की भूमिका न केवल अपना नेता चुनने में बल्कि काबीना, सरकार और राज्य-निकाय का गठन करने की भी है। एकल-ध्रुवीय राजनीति बनाने की बजाय राजकीय और निर्णय लेने की शक्ति का वितरण करना न केवल लोकतंत्र वरन‍् एक प्रभावशाली और दक्ष प्रशासन बनाने के लिए भी आवश्यक है। आज के नेता अपने ही दल में दूसरी पंक्ति के नेतृत्व या काबीना में अपना विकल्प बनने की हैसियत रखने वालों को साथ रखना पसंद नहीं करते। नेहरू के पास सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद और उनके जैसे अनेकानेक काबिल नेता थे। अटलजी के पास आडवाणी, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, जसवंत सिंह, सुषमा स्वराज इत्यादि चमकदार नेतागण थे, जो खुद प्रधानमंत्री बनने की काबिलियत रखते थे। इसी तरह पीवी नरसिम्हा राव के पास मनमोहन सिंह जैसा वित्त मंत्री थे, तो खुद मनमोहन सिंह के पास काबीना में चिदम्बरम एवं प्रणब मुखर्जी, योजना आयोग में मोंटेक आहलूवालिया और रिज़र्व बैंक में रघुराम राजन जैसे मेधावी साथी थे। ये काबीना के सहयोगी महत्वपूर्ण विषयों पर अपने मन की बात खुलकर रखते थे।

इसी तरह सूबों में तमिलनाडु में कामराज, बंगाल में डॉ. बीसी रॉय, महाराष्ट्र में यशवंत चव्हाण, पंजाब में प्रताप सिंह कैरों और दरबारा सिंह, हरियाणा में बंसीलाल और देवीलाल जैसे सशक्त मुख्यमंत्री हुआ करते थे। बहरहाल, मूल बिंदु यह है कि मौजूदा नेता और सत्ता पर काबिज लोग किसी योग्यता को बढ़ावा नहीं देते, बल्कि ऐसा करने से डरते हैं। इसीलिए कोई बड़ी और अच्छी तरह सोच-विचार कर बनाई गई और दीर्घकालीन नीतियों की पहल नदारद है। एक संतुलित काबीना की अनुपस्थिति से घटिया प्रशासन, आर्थिकी का कमजोर प्रदर्शन और न्याय मिलना दूभर होता जा रहा है। हमारी केंद्रीय और सूबाई सरकारें आग लगने पर कुआं खोदने वाली हैं, जो एक आपातकाल से दूसरे के बीच सोई रहती हैं। आखिरकार, क्या कोविड महामारी, मज़दूर पलायन, जीएसटी क्रियान्वयन, नोटबंदी इत्यादि से पैदा हुई तमाम समस्याओं के बाद हमने राज्यों से सलाह करके कोई दीर्घकालीन राष्ट्रीय योजना बनाई है? चाहे यह स्वास्थ्य क्षेत्र हो, शिक्षा या फिर प्राकृतिक आपदा अथवा आंतरिक सुरक्षा पर खतरे का विषय हो, तो जवाब है, कतई नहीं। हम निपटने के उपाय के लिए अगली आपदा का इंतजार करते हैं। यह कहा जाता है कि हेनरी फोर्ड ने अपनी कार बनाना उस वक्त ठान लिया था जब एक पत्रकार ने तंज कसते हुए था कि आप तरक्की कैसे कर पाएंगे जबकि आप न तो बहुत पढ़े-लिखे हैं, न ही उद्योग-धंधे का खासा अनुभव है। उनका संक्षिप्त उत्तर था ‘मैं दुनियाभर से बेहतरीन दिमागों को इकट्ठा करूंगा’, और यही उन्होंने किया, बाकी इतिहास है। हमारे मौजूदा सत्तासीन नेताओं में अधिकांश की कोशिश अपने इर्द-गिर्द खुद से कम राजनीतिक कद वाले रखने की होती है, वे लोग, जिनके पास न ज्यादा दिमाग हो, न ही उनमें नेतृत्व को चुनौती देने की कूवत हो। यही वजह है कि लोगों की नज़र केवल शीर्ष नेता पर लगी रहती है, न कि उसके इर्द-गिर्द इकट्ठा दोयम ‘बौनों’ पर। लेकिन एक व्यक्ति अपने तौर पर चूंकि पूरे देश के लिए न तो लघु, न ही दीर्घकालीन नीति बनाने में सक्षम होता है, इसलिए अच्छा प्रशासन और न्याय नहीं दे पाता।

करोड़ों लोग जो दारुण गरीबी में जी रहे हैं, वे चुनावों के वक्त कहे गए जुमलों से बाहर नहीं आने वाले। हमें उनको शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार देना होगा और यह सुनियोजित नीतियों और कर्तव्यनिष्ठ नेतृत्व से ही संभव है। केवल चुनाव के दौरान दी जाने वाली मुफ्त की चीजें देने से मदद नहीं मिलेगी, न ही वोट के बदले नोट, शराब, खाना देकर। साल भर कहीं न कहीं होने वाले चुनावों में चलने वाले इस चक्र को देखकर किसी को भी लगेगा कि चुनाव जीतना ही दलों का एकमात्र प्रयोजन है, उनके पास नीतियों-प्रशासन के लिए वक्त नहीं है। सत्ता के लिए चुनाव केवल माध्यम है और सत्ता केवल शक्ति पाने के लिए नहीं है–जबकि यह वह आस है जो मतदाता अपना जीवनस्तर सुधारने की खातिर उन्हें सौंपता है। चुनावों के दौरान, खोखले नारों से बचना चाहिए। लोकतंत्र के अन्य स्तंभ सुनिश्चित करें कि चुनावी प्रचार में मतदाता को भरमाने हेतु ध्यान भटकाऊ तत्व समूचा राजनीतिक संवाद अगवा न करने पाएं। चर्चा विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा जैसे मूलभूत मसलों पर केंद्रित रहे, इसके लिए मीडिया जिम्मेदार भूमिका निभाए, वहीं न्यायपालिका को सक्रिय होकर आपराधिक न्याय प्रणाली का पहरुआ बनने की जरूरत है और अपराधियों को राजनीति से परे रखें। चुनाव आयोग महज मतदान प्रक्रिया को अंजाम देने वाला तंत्र न बनकर, यह सुनिश्चित करे कि तमाम दलों को -चुनाव के दौरान चुनावी दंगल के अखाड़े में न्यायोचित मौका मिले।

आइए, भारतीय दलों के चुनावी प्रचार की तुलना विश्व के पुराने लोकतंत्रों से करें। यूके में कंज़र्वेटिव और लेबर पार्टी है तो अमेरिका में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन दल हैं, वे चुनाव पूर्व, विभिन्न विषयों-समस्याओं पर अपनी विचारधारा और नजरिया जनता के सामने एकदम सपष्ट रूप से रखते हैं। अमेरिका में ज्यादातर नागरिकों का इन दोनों में से किसी एक पार्टी की तरफ झुकाव साफ झलकता है और वे अपनी इस स्थिति को लेकर स्पष्ट होते हैं। पार्टियों का एजेंडा मुख्यतः लोगों की आर्थिक जरूरतें और समग्र विकास पर केंद्रित रहता है। पर्यावरण-बदलाव और प्रदूषण जैसे अन्य मुख्य विषयों का चुनावों पर असर का आकलन भी राजनीतिक दल लगातार करते हैं और स्थिति स्पष्ट करते हैं। हाल ही में राष्ट्रपति बाइडेन और डेमोक्रेट्स ने बुनियादी ढांचे के विकास हेतु अपनी योजना का खाका संसद एवं लोगों के सामने रखा था। महीनों बहस चली और अंततः द्विपक्षीय मतदान के जरिए यह पारित हुआ। इसमें पार्टी लीक से हटकर क्रॉस-वोटिंग भी हुई, जो कि पक्षपाती होकर मतदान करने की बजाय जीवंत लोकतंत्र का द्योतक है। दरअसल, क्रॉस-वोटिंग प्रस्तावित विषय की महत्ता पर हुई है, यह नहीं है कि सांसद टूट गए या पाला बदला। वास्तव में, वहां सामूहिक दलबदल कभी सुना तक नहीं। राजनीति में शुचिता बरतना बहुत जरूरी है। हालांकि, इस किस्म के लोकतंत्र में भी ट्रंप सरीखा कभी-कभार उभरकर आ जाता है, लेकिन उन जैसों और उसकी नीतियों से कैसे निपटना है, यह भी अमेरिकन लोग जानते हैं।

दूसरी ओर हम भारतीय हैं, जो दलों के चुनाव चिन्हों से वफादारी निभाने में ही फंसे हुए हैं। हमारे विभिन्न दलों के चुनावी चिन्ह बेशक अलहदा हों, परंतु वोट पाने को धर्म-जाति और चुनाव पूर्व लोकलुभावन घोषणाएं और मुफ्त का माल बांटने की होड़ उनमें एक जैसी है। हम समझें कि एक विकसित समाज बनने की दिशा में कोई शॉर्टकट नहीं है। मायने रखते हैं तो राष्ट्रीय नीतियां, एजेंडा और समर्पित नेता। एक नई पीढ़ी आ रही है और पुराने विचारों से मुक्त है। राष्ट्र इस युवाशक्ति, इनके जोश का समुचित इस्तेमाल करे और उन्हें फलने-फूलने का माहौल देना होगा। हम उन्हें विदेशों का रुख करते देखना गवारा नहीं कर सकते।

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