महाराणा कुंभा और चित्तौड़गढ़

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डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’

महाराणा कुंभा को कला प्रेमी और विद्यागुरु शासक कई अर्थों में कहा जा सकता है। वास्तु, शिल्प, संगीत, नाटक, नृत्य, चित्र जैसी अनेक भागों वाली कृतियां और कला मूलक रचनात्मक प्रवृत्तियां कुंभा की अद्भुत देन और देश की दिव्य निधि है।
भूलोकमल्ल सोमेश्वर और परमार कुलावतंस भोज की तरह कुंभा ने भी स्वयं को प्रदर्शित, प्रवर्तित और प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। हालांकि जीवन में लडाइयां बहुत करनी पड़ी और जिस मांडू के सुल्तान ख़लजी से कोई पंद्रह बड़े मुकाबले किए, उसको हर बार उकसाने वाला कुंभा का भाई ही रहा जो एक तरह से मांडू के परचम तले उत्तराधिकार की लड़ाई लड़ रहा था। कुंभा इस शीत और प्रत्यक्ष युद्ध से आहत भी कम न हुआ मगर मेवाड़ में कला की प्रगति को मंद न होने दिया : न चारु और न ही कारु कला की धार मंद हुई।
कुंभा को सर्वाधिक लगाव अपनी जन्मभूमि चित्तौड़ से था। यह लगाव कई कारणों से था और इस लगाव को कुंभलगढ़ की प्रशस्ति में बहुत प्रशंसा के साथ लिखा गया है। यही वर्णन एकलिंग माहात्म्य में भी दोहराया गया है। मां सौभाग्यदेवी ने गजानन की तीन जन्मों की आराधना के फलस्वरूप तनयत्रिशक्ति के फल रूप में कुंभा को पाया : मोकल जैसा गुणवान पिता, चित्तौड़ सरीखी कूटमयी भूमि और विघ्ननाशक विनायक की तपस्या। यही स्वीकारोक्ति कीर्तिस्तंभ की प्रशस्ति में भी हैं जिसमें वह नवीन विश्वामित्र की उपाधि से अलंकृत किये गए हैं। ( मेरी : राजस्थान की ऐतिहासिक प्रशस्तियां और ताम्रपत्र, पृष्ठ 166)
यहीं कुंभा का जन्म संवत् 1474 में मार्गशीर्ष कृष्णा 5 को हुआ। संयोगवश कुंभलगढ़ प्रशस्ति की पहली शिला पर सं. 1517 वर्षे शाके 1382 प्रवर्तमाने माग्र्गशीर्ष वदि 5 सोमे प्रशस्ति पंक्ति के साथ राज्ञं सुजात योगं का स्मरण किया गया है। कुंभा ने चित्तौड़ के हर छोर को अलंकृत पाषाण से जटित करने का जो संकल्प किया, वह उम्रभर निरंतर रहा। कारीगरों कहावत सी रही : ‘कमठाणो कुंभा रौÓ। कहीं रोजगार न मिले तो कुंभा के चित्तौड़ में मिल जाएगा, यह काम ‘अमर टांकीÓ कहलाया। चित्तौड़ में कुंभा की कई कौतुकी निर्मितियां हैं और आज तक देश विदेश की हजारों आंखों के लिए चित्रकूट को विचित्रकूट बनाए हुए है। कला के संरक्षण ही नहीं संवर्धन का पाठ कुंभा के कृतित्व से सहज ही सीखा जा सकता है। वह अपने जीवनकाल में ही अनेक कौतुकों से मंडित कर दिया गया क्योंकि तेवर वाली तलवार के वार और कल्पनातीत लिखने वाली कलम के कुतूहल और विनम्र बारह राजाओं के मंडल से आदरणीय रहे। जब तक कुंभलगढ़ की दीवार की चौड़ाई व ऊंचाई रहेगी, मूर्तिमय कीर्तिस्तंभ का कुतूहल बना रहेगा और नवभरतावतारीय संगीतराज की महत्ता व रसमय गीत गोविंद की रसिक प्रियता रहेगी, चित्तौड़ के कुंभा की कीर्तिकथा गेय रहेगी…।

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