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संसार के सभी वासियों को अपना मानना और एक ही पिता की संतान मानकर उनके प्रति आत्मीयता का बर्ताव करना भारत की प्राचीन नीति – संस्कृति रही है । अपनी इसी पवित्र नीति और संस्कृति भाव के कारण भारत ने संसार के लोगों के हृदय पर शासन किया है।
भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘सबका साथ -सबका विकास और सबका विश्वास’ – के जिस पवित्र संस्कृति – भाव को लेकर आगे बढ़े रहे हैं, वह अभी तक राष्ट्रीय संदर्भ में ही आकार लेता दिखाई देता था, परंतु अब जैसे-जैसे उनकी एक वैश्विक नेता की छवि बनती जा रही है वैसे – वैसे ही भारत का यह प्राचीन संस्कार अब नए आयामों को छूता हुआ वैश्विक संस्कार का स्वरूप लेता दिखाई दे रहा है।
     रोम की राजधानी इटली में आयोजित किए गए जी-20 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना से चल रही भारत की जंग को लेकर ‘एक धरती – एक स्वास्थ्य’ का मंत्र दिया। जब वह अपना भाषण इस विषय पर दे रहे थे तो सारा संसार भारत को बड़े ध्यान से सुन रहा था। उन्होंने अपने इस मंत्र में स्पष्ट किया कि कोरोना महामारी के विरुद्ध जारी युद्ध को सभी मिलकर लड़ेंगे तो निश्चित रूप से हम जीतेंगे। प्रधानमंत्री के इस प्रकार के आवाहन का अर्थ भारत के जीतने से नहीं, बल्कि मानवता के जीतने से था। जिसके अर्थ और संदर्भ को समझ कर उपस्थित लोगों ने बड़ा गदगद होकर प्रधानमंत्री मोदी को सुना ।
       श्री मोदी ने जी – 20 देश के नेताओं से वायदा किया है कि भारत अगले वर्ष के अंत तक कोविड-19 वैक्सीन की 5 अरब डोज बनाएगा। जिसके विषय में उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भारत इसे अपने लिए नहीं बल्कि सारे संसार के लोगों के लिए बनाएगा। भारत के प्रधानमंत्री के इस प्रकार के आवाहन और भाषण में हमारे देश के ऋषियों का चिंतन बोल रहा था। प्राचीन काल से ही भारत के ऋषियों ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का संदेश देकर सबके भले के लिए जीवन को खपाने का आवाहन करना आरंभ किया था।
      यह बहुत ही प्रसन्नता का विषय है कि भारत अपनी इसी नीति पर चलता रहा । ऐसा काम उसने उस समय भी किया जब अनेकों सिकंदर , हलाकू ,चंगेज खान, बाबर, अब्दाली और नादिरशाह मजहब की तलवारों को लेकर भारत को मिटाने के लिए चल दिए थे। अपनी इसी मानवतावादी सोच और दृष्टिकोण के कारण अंत में भारत जीता। भारत को मिटाने वालों के अते – पते नहीं हैं ,परंतु भारत अपनी रीति- नीति पर चलते हुए संसार के लिए एक बार फिर आशा की किरण बनकर उभरा है । यद्यपि भारत को मिटाने वाले विदेशी आक्रमणकारियों की मानस सन्तानें देश के लिए बहुत बड़ा संकट हैं। जिस की ओर से मुंह नहीं फेरा जा सकता ।
    आज भी जब मजहबी तलवारें एक दूसरे के खून की प्यासी होती दिखाई दे रही हैं तब भी भारत कोविड-19 जैसी महामारी के विरुद्ध अपनी परंपरागत मानवतावादी सोच के अनुसार युद्ध कर रहा है। संसार के संवेदनशील लोग भारत के इस प्रकार के नेतृत्व के प्रति बहुत ही आशा भरी नजरों से देख रहे हैं।
    प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रकार के वैश्विक मानस और चिंतन से उद्भूत भाषण को सुनकर उनके स्वर में स्वर मिलाने वाले देशों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने यह स्पष्ट किया है कि विश्व के निर्धन देशों तक टीके पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा और भारत इसमें अपनी संपूर्ण क्षमताओं का प्रदर्शन करेगा । वैसे भी यह बात बहुत ही अन्यायपरक है कि संसार के धनी देशों में जहां 70% लोगों का वेक्सीनेशन हो चुका है वहीं निर्धन देशों में यह आंकड़ा अभी 3% तक भी नहीं पहुंचा है । ऐसे में संसार के संवेदनशील लोगों और देशों के नेताओं का यह नैतिक दायित्व बनता है कि वह कोविड-19 से किसी भी देश के किसी भी व्यक्ति को इसलिए ना मरने दें कि वह किसी गरीब घर, देश या परिवेश में पैदा हुआ था ? ऐसे में सारे विश्व के धनी देशों को भारत की इस अपील पर विचार करना चाहिए कि कोविड-19 से लड़ने के लिए सक्षम नीति बनाने में सभी संपन्न, समृद्ध और धनी देश अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें।
   अब समय आ गया है जब ‘ग्लोबल विलेज’ की बात छोड़कर संसार के देशों को भारत के ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के आदर्श को अपनाना चाहिए और इस वैदिक आदर्श वाक्य के साथ-साथ :कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ के संदेश को भी यूएन का आदर्श वाक्य घोषित करना चाहिए।
      हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि कोरोना वेक्सीन को लेकर इस समय संसार भर में गंभीर असंतुलन दिखाई दे रहा है। दवा कंपनियां पेटेंट कानूनों का सहारा ले रही हैं । इसी प्रकार कहीं किसी प्रकार के प्रतिबंध आड़े आ रहे हैं तो कहीं किसी दूसरे प्रकार के प्रतिबंध आड़े आ रहे हैं। ऐसे में संसार के समृद्ध और विकसित देशों की यह बड़ी जिम्मेदारी बन जाती है कि वह निर्धन देशों को भी वैक्सीन उपलब्ध कराएं। यह तब और भी आवश्यक हो जाता है जब संसार भर के स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि वैक्सीन का उत्पादन नहीं बढ़ाया गया तो 2024 तक संसार इसी महामारी से जूझता रहेगा। प्रधानमंत्री श्री मोदी को भारत के ऋषियों के यज्ञ -विज्ञान का भी प्रचार प्रसार अपने स्तर पर तेजी से करना चाहिए । भारत के अनेकों विद्वानों को भारत के सांस्कृतिक दूत के रूप में विदेशों में भेज- भेज कर यज्ञ – विज्ञान का प्रचार – प्रसार और विस्तार कराया जाना समय की आवश्यकता है। क्योंकि यज्ञ – विज्ञान के माध्यम से भी हम ऐसी अनेकों बीमारियों से मुक्ति पा सकते हैं, जो मानव के लिए किसी भी समय बड़ी संख्या में मृत्यु का कारण बन सकती हैं। कोविड-19 निश्चित रूप से उन महामारियों में से एक महामारी है।
    इसके अतिरिक्त भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के स्वरूप को वैश्विक सांस्कृतिक समृद्ध परंपरा में परिवर्तित करने का अवसर भी हमारे प्रधानमंत्री को चूकना नहीं चाहिए। इस प्रकार के अभियान के अंतर्गत हमें संसार की मानसिकता में परिवर्तन करना होगा, अन्यथा चीन जैसे दानव देश संसार के लिए कभी भी ‘भस्मासुर’ हो सकते हैं। संसार में मानवतावाद का प्रचार प्रसार तेजी से हो और मानव मानव के काम आने को अपना सबसे बड़ा धर्म स्वीकार करे, इस संस्कार को वैश्विक संस्कार बनाने की आवश्यकता है । यह तभी संभव है जब भारत का सांस्कृतिक मानवतावादी राष्ट्रवाद वैश्विक राष्ट्रवाद के रूप में परिवर्तित होकर संपूर्ण संसार का मार्गदर्शन करने में सक्षम हो। हमें खुशी है कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री मोदी अपनी कार्यनीति, कार्यशैली और राजनीति के माध्यम से इसी प्रकार के संघर्ष को आगाज देते हुए दिखाई दे रहे हैं।
  प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इटली की राजधानी रोम में कैथोलिक चर्च के प्रमुख पोप फ्रांसिस से भी भेंट की है । उनकी इस भेंट को भी वैश्विक स्तर पर ‘ऐतिहासिक’ माना जा रहा है। पोप फ्रांसिस ने कोरोना काल में भारत की अन्य देशों की मानवीय आधार पर सहायता करने की पवित्र भावना की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने उन्हें भारत आने का निमंत्रण भी दिया है। जिसे पोप ने स्वीकार कर लिया है। दोनों नेताओं में जलवायु परिवर्तन का सामना करने और संसार से निर्धनता को मिटाने जैसे मुद्दों पर लगभग 1 घंटे तक बातचीत हुई।
  हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जब विश्व की बड़ी शख्सियतें किसी उभरते हुए नेतृत्व को आशा भरी दृष्टि से देखने लगें तो उनका ऐसा देखना न केवल उस नेता के लिए शुभ होता है, बल्कि उसके देश के लिए भी शुभ होता है। वैश्विक नेतृत्व जिस नेता को मान्यता प्रदान करने लगे उस देश का उदय होना निश्चित होता है। हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि यदि आज पश्चिमी जगत की अनेकों धार्मिक, सामाजिक मान्यताएं संसार का मार्गदर्शन कर रही हैं तो उसका एक ही कारण है कि वहां के नेतृत्व ने किसी समय विशेष पर संसार के लोगों का ध्यान आकृष्ट करने में सफलता प्राप्त की थी, अन्यथा क्या कारण है कि अमेरिका का डॉलर संसार के सभी देशों की मुद्राओं से कहीं अधिक महत्व रखता है ? यदि भारत भी अपनी वर्तमान वैश्विक नेतृत्व की सजगता भरी नीति पर चलता रहा तो भारत का रुपया भी एक दिन निश्चित ही डॉलर को पीट डालेगा । भारत को बहुत धैर्य के साथ आगे बढ़ते रहकर उस दिन की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
   अभी भरत को अपनी सफलता के आरम्भिक रुझानों को देखकर अपनी पीठ अपने आप थपथपाने की आवश्यकता नहीं है ।अभी हमें केवल रुझान मिलने आरंभ हुए हैं, अंतिम परिणाम आना शेष है । समझदार लोग तो अंतिम परिणाम के बाद भी परिणाम को अंतिम परिणति तक पहुंचाने के लिए भी सावधान रहते हैं । वे तथाकथित परिणामों को पाकर भी इतराते नहीं हैं। इसलिए कहीं पर भी प्रमाद करने की आवश्यकता नहीं है । ‘स्वाभिमान हटे नहीं और अभिमान पास फ़टके नहीं’ – इस नीति पर हमें चलते रहना है। तभी देर तक और दूर तक हम संसार को अपना मार्गदर्शन दे सकेंगे। जितना ऊपर उठते जाएं उतने ही अधिक विनम्र होते चले जाएं – ऐसा पवित्र भाव आपको सफलता से भी आगे ले जाने में सफल होता है।

   – डॉ राकेश कुमार आर्य
    संपादक  : उगता भारत

  
  

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