अन्याय के प्रति शोध के लिए हमें मजबूती से खड़ा होना होगा

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लक्ष्मीकांता चावला

दुर्गा पूजा के दिनों में बांग्लादेश में मंदिरों और दुर्गा पूजा के पंडालों पर मुस्लिम कट्टरवादियों ने हमले किए। इस्कॉन मंदिर नौआखली में भी भयानक तांडव किया। साथ ही अल्पसंख्यकों की दुकानों और घरों पर हमले किए गए। भारत ने बांग्लादेश की पाकिस्तान से मुक्ति के बाद उसे आजाद कर दिया। अगर चाहते तो बांग्लादेश को अपनी ही एक कॉलोनी बना सकते थे। हिंदुस्तान की यही संस्कृति है कि हम कभी किसी के देश में न आक्रमण करते हैं और न ही किसी की भूमि पर कब्जा करते हैं। ऐसा लगता है बांग्लादेशी कट्टरपंथी भूल गए कि भारत और भारतीयों के कारण ही वे पाकिस्तानी यातना से मुक्त हुए। इसी प्रकार पाकिस्तान में भी हिंदू मंदिरों, हमारे गुरुद्वारों, हमारे परिवारों पर शर्मनाक हमले किए गए। हमारी बेटियों को बेइज्जत किया, अपहरण किया, उनसे जबरी निकाह किया। वहां की सरकार सोई रही।

दरअसल, शिकायत अपने देशवासियों से भी है कि जैसा क्रोध-विरोध का ज्वारभाटा इस निंदनीय दुर्घटना के बाद देश में उठना चाहिए था, वह कहीं दिखाई नहीं दिया। रावण भी जलाकर यूं कहिए लकीर की फकीरी पूरी कर ली, पर रावण से भी ज्यादा बुरे काम जिस बांग्लादेश और पाकिस्तान में हो रहे हैं, अफगानिस्तान में हो चुके हैं, हो रहे हैं, उसके विरुद्ध कोई गुस्सा न सरकारी स्तर पर प्रकट हुआ और न जनता के।

जब मुहम्मद गौरी ने हमारे सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था तब भी वह तो कुछ हजार सैनिकों के साथ ही आया था, जबकि पूरे भारत में हमारे मंदिरों में असंख्य पुजारी थे। जिन शहरों से मुहम्मद गौरी हमारे मंदिरों से लूटा हुआ सोना-चांदी, संपदा, हाथी-घोड़ों पर लादकर ले गया, अगर रास्ते में भी उसके दस-बीस सैनिक हर गांव-शहर में मार दिए जाते तो देश की संपदा देश में बच जाती। इतिहास साक्षी है कि एक आवाज में एक होकर देश ने तब भी गौरी के अत्याचारों का मुकाबला नहीं किया। अंग्रेजों के समय भी हमारी अलग-अलग रियासतों के राजा आपस में लड़ते रहे, पर अंग्रेजों की गुलामी अधिकांश राजाओं ने स्वीकार कर ली। अब यहां प्रश्न बांग्लादेश, अफगानिस्तान, पाकिस्तान में हिंदू समाज और उनके सम्मान का है। हमारे मंदिरों, गुरुद्वारों का है। हमारी बेटियों का है। क्या आज की आवश्यकता यही है कि हम केवल अपना परलोक सुधारने के लिए माला हाथ में लेकर निष्क्रिय बैठे-बैठे नाम सिमरन करते रहें और यह प्रतीक्षा करते रहें कि भगवान श्रीकृष्ण जी के अपने वचन के अनुसार जब-जब धर्म की हानि होगी वे धर्म की रक्षा के लिए यहां आएंगे। आवश्यकता तो यह है कि एक हाथ में माला और दूसरे में भाला होना चाहिए। हमारे ग्रंथों में भी शस्त्र और शास्त्र, शर और श्ााप दोनों में योग्यता की बात कही है।

हमारा दुर्भाग्य यह भी है कि हमारे पूजा स्थानों विशेषकर मंदिरों में जिनको ठाकुर पूजा का काम सौंपा जाता है, वे बहुत बेचारे हैं। उन्हें पूरा वेतन भी नहीं मिलता। जिनसे हम आशीर्वाद लेते हैं उन्हें मंदिर समितियों के सदस्य या अधिकारी कभी भी डांट पिला सकते हैं, नौकरी से निकाल सकते हैं या अन्य किसी भी प्रकार से नीचा दिखा सकते हैं। देश के बड़े-बड़े मंदिरों में यह बुराई शायद कम होगी, पर अधिकतर मंदिरों में और पूजा स्थानों में ऐसा ही है। हो सकता है समाज के वरिष्ठ सदस्यों को यह याद होगा कि पहले हर मंदिर में कुछ युवा विद्यार्थी रहते थे। वे शिक्षा भी ग्रहण करते और मंदिरों तथा आसपास के क्षेत्रों की सामाजिक सुरक्षा का दायित्व भी निभाते थे। देश और समाज की आज यह आवश्यकता है कि हमारे मंदिरों के पुजारी शास्त्रों के साथ शस्त्रों में भी पारंगत हों और उन्हें पूरा वेतन दिया जाए।

हमारे कोई भी देवी-देवता बिना शस्त्र के नहीं। दुर्गा पूजा के दिनों में हम सिंहवाहिनी, दशभुजाधारिणी और महिषासुर संहारिनी देवी की पूजा करते हैं और फिर हमारी हिंदुस्तान की बेटियां बिना शस्त्र शिक्षा और बिना शस्त्र के क्यों? रक्तबीज का अंत करने वाली देवी की पूजा सर्वत्र होती है। चण्ड, मुण्ड संहारिनी देवी की पूजा होती है और राक्षसों का नाश करने के लिए स्वयं भगवान बार-बार अवतार लेकर हमें रास्ता दिखाते रहे हैं।

यह एकदम सत्य है कि अगर हम श्रीराम और श्रीकृष्ण जी के रास्ते पर नहीं चलेंगे, श्री गुुरु हरगोबिंद और गुरु गोबिंद सिंह जी का मार्ग नहीं अपनाएंगे, बंदा बहादुर की तरह अत्याचारियों के अत्याचार का समूल नाश करने की योग्यता देश के बच्चों, युवाओं में पैदा नहीं करेंगे तो कभी बांग्लादेश के कट्टरपंथी और कभी पाकिस्तानी हिंदू-सिख समाज पर अत्याचार करते रहेंगे। हम सरकार से यह सशक्त मांग कर सकते हैं कि आज भारत दुनिया का शक्तिशाली देश है, अपनी शक्ति का प्रयोग करके अपने प्रभाव से दुनिया का समर्थन लेकर उन कट्टरपंथियों के हाथों पर नियंत्रण करने के लिए बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान सरकार को मजबूर कर दे।

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