जीवन को सकारात्मक दिशाएं देने के लिये चातुर्मास एक सशक्त माध्यम

images (35)

ललित गर्ग

वर्षा ऋतु के चार महीने व्रत, भक्ति एवं धर्माराधना के लिये निर्धारित है, जिसे ‘चातुर्मास’ कहा जाता है। भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में चातुर्मास का विशेष महत्व है। हमारे यहां मुख्य रूप से तीन ऋतुएँ होती हैं- ग्रीष्म, वर्षा और शरद। वर्ष के बारह महीनों को इनमें बॉंट दें, तो प्रत्येक ऋतु चार-चार महीने की हो जाती है। वर्षाकालीन ये चार माह की अवधि साधना-काल एवं आध्यात्मिक प्रशिक्षण का अवसर होता है। एक ही स्थान पर रहकर साधना की जाती है।
चातुर्मास में ज्ञानी मुनिजनों के मुख से शास्त्र-वाणी का श्रवण करने से भौतिकता के साथ-साथ आध्यात्मिक का भाव पुष्ट होता है। त्याग-प्रत्याख्यान में वृद्धि होती है। कर्म निर्जरा के लिए पराक्रम के प्रस्फोट की पे्ररणा मिलती है। गांव और घर-घर में तप आराधना का ज्वार-सा आ जाता है। जो न केवल जीवन की दिशाओं को ही नहीं बदलता बल्कि जीवन का ही सर्वांगीण रूपान्तरण भी कर देता है। चातुर्मास संस्कृति की एक अमूल्य धरोहर है। जरूरत है इस सांस्कृतिक परम्परा को अक्षुण्ण बनाने की। ऐसी परम्पराओं पर हमें गर्व और गौरव होना चाहिए कि जहां जीवन की हर सुबह सफलताओं की धूप बांटें और हर शाम चारित्र धर्म की आराधना के नये आयाम उद्घाटित करें। क्योंकि यही अहिंसा, शांति और सह-अस्तित्व की त्रिपथगा सत्यं, शिवं, सुंदरम् का निनाद करती हुई समाज की उर्वरा में ज्योति की फसलें उगाती है।
यो तो हर व्यक्ति को जीने के लिये तीन सौ पैंसठ दिन हर वर्ष मिलते है, लेकिन उनमें वर्षावास की यह अवधि हमें जागते मन से जीने को प्रेरित करती है। यह अवधि चरित्र निर्माण की चैकसी का आव्हान करती है ताकि कहीं कोई कदम गलत न उठ जाये। यह अवधि एक ऐसा मौसम और माहौल देती है जिसमें हम अपने मन को इतना मांज लेने को अग्रसर होते हैं कि समय का हर पल जागृति के साथ जीया जा सके। संतों के लिये यह अवधि ज्ञान-योग, ध्यान-योग और स्वाध्याय-योग में आत्मा में अवस्थित होने का दुर्लभ अवसर है। वे इसका पूरा-पूरा लाभ लेने के लिये तत्पर होते हैं। वे चातुर्मास प्रवास में अध्यात्म की ऊंचाइयों का स्पर्श करते हैं, वे आधि, व्याधि, उपाधि की चिकित्सा कर समाधि तक पहुंचने की साधना करते हैं। वे आत्म-कल्याण ही नहीं पर-कल्याण के लिये भी उत्सुक होते हैं। यही कारण है कि श्रावक समाज एवं धर्म में आस्थाशील व्यक्ति भी उनसे नई जीवन दृष्टि प्राप्त करता है। स्वस्थ जीवनशैली का निर्धारण करता है।
वास्तव में पुराने समय में वर्षाकाल पूरे समाज के लिए विश्राम काल बन जाता था किन्तु संन्यासियों, श्रावकों, भिक्षुओं आदि के संगठित संप्रदायों ने इसे साधना काल के रूप में विकसित किया। इसलिए वे निर्धारित नियमानुसार एक निश्चित तिथि को अपना वर्षावास या चातुर्मास शुरू करते थे और उसी तरह एक निश्चित तिथि को उसे समाप्त करते थे। चातुर्मास शुभारंभ पर सम्पूर्ण देश में जगह-जगह आध्यात्मिक कार्यक्रमों की गरिमापूर्ण प्रस्तुति देखने को मिलती है। इस दिन से तप की गंगा प्रवहमान हो जाती है।
जैन परम्परा में आषाढ़ी पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक का समय तथा वैदिक परम्परा में आषाढ़ से आसोज तक का समय चातुर्मास कहलाता है। धन-धान्य की अभिवृद्धि के कारण उपलब्धियों भरा यह समय स्वयं से स्वयं के साक्षात्कार, आत्म-वैभव को पाने एवं अध्यात्म की फसल उगाने की दृष्टि से भी सर्वोत्तम माना गया है। इसका एक कारण यह है कि निरंतर पदयात्रा करने वाले साधु-संत भी इस समय एक जगह स्थिर प्रवास करते हैं। उनकी प्रेरणा से धर्म जागरणा में वृद्धि होती है। जन-जन को सुखी, शांत और पवित्र जीवन की कला का प्रशिक्षण मिलता है। गृहस्थ को उनके सान्निध्य में आत्म उपासना का भी अपूर्व अवसर उपलब्ध होता है।
संतों के अध्यात्म एवं शुद्धता से अनुप्राणित आभामंडल समूचे वातावरण को शांति, ज्योति और आनंद के परमाणुओं से भर देता है। वे कर्म संस्कारांे के रूप में चेतना पर परत-दर-परत जमी राख को भी हवा देते हैं। इससे जीवन-रूपी सारे रास्ते उजालों से भर जाते हैं। लोक चेतना शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तनावों से मुक्त हो जाती है। उसे द्वंद्व दुविधाओं से त्राण मिलता है। भावनात्मक स्वास्थ्य उपलब्ध होता है।
संत धरती के कल्पवृक्ष होते हैं। संस्कृति के प्रतीक, परम्परा के संवाहक, जीवन कला के मर्मज्ञ और ज्ञान के रत्नदीप होते हैं। उनके सामीप्य में संस्कृति, परम्परा, इतिहास, धर्म और दर्शन का व्यवस्थित प्रशिक्षण लिया जा सकता है। उनका उपदेश किसी की ज्ञान चेतना को जगाता है तो किसी की विवेक चेतना को विकसित करता है। किसी को आत्महित में प्रवृत्त करता है तो किसी को चित्तगत संक्लेशों से निवृत्त करता है। ठीक इसी तरह श्रावक भी संवदेनाओं एवं करुणाशीलता के फैलाव के लिये जागरूक बनते हैं। यह इस अवधि और इसकी साधना का ही प्रभाव है कि श्रावक की संवेदनशीलता इतनी गहरी और पवित्र हो जाती है कि वह अपने सुख की खोज में किसी को सुख से वंचित नहीं करता। किसी के प्रति अन्याय, अनीति और अत्याचार नहीं होने देता। यहां तक की वह हरे-भरे वृक्षों को भी नहीं काटता और पर्यावरण को दूषित करने से भी वह बचता है।
चातुर्मास का महत्व शांति और सौहार्द की स्थापना के साथ-साथ भौतिक उपलब्धियों के लिये भी महत्वपूर्ण माना गया है। इतिहास में ऐसे अनेक प्रसंग हैं, जहां चातुर्मास या वर्षावास और उनमें संतों की गहन साधना से अनेक चमत्कार घटित हुए है। यह अवधि जिसमें कुछ व्यक्ति सामूहिक रूप से ध्यान, साधना, तपोयोग या मंत्र अनुष्ठान करना चाहें, उनके लिये उपहार की भंाति है। जिस क्षेत्र की स्थिति विषम हो। जनता विग्रह, अशांति, अराजकता या अत्याचारी शासक की क्रूरता की शिकार हो, उस समस्या के समाधान हेतु शांति और समता के प्रतीक साधु-साध्वियों का चातुर्मास वहां करवाया जाकर परिवर्तन को घटित होते हुए देखा गया है। क्योंकि संत वस्तुतः वही होता है जो औरों को शांति प्रदान करे। बाहर-भीतर के वातावरण को शंाति से भर दे। जो स्वयं शांत रस में सराबोर रहता है तथा औरों के लिए सदा शांति का अमृत छलकाता रहता है। एक तरह से अध्यात्म एवं पवित्र गुणों से किसी क्षेत्र और उसके लोगों को अभिस्नात करने के लिये चातुर्मास एक स्वर्णिम अवसर है।
वर्षावास जैन परम्परा में साधना का विशेष अवसर माना जाता है। इसलिए इस काल में वे आत्मा से परमात्मा की ओर, वासना से उपासना की ओर, अहं से अर्हम् की ओर, आसक्ति से अनासक्ति की ओर, भोग से योग की ओर, हिंसा से अहिंसा की ओर, बाहर से भीतर की ओर आने का प्रयास करते हैं। वह क्षेत्र सौभाग्यशाली माना जाता है, जहां साधु-साध्वियों का चातुर्मास होता है। उनके अध्यात्म प्रवचन ज्ञान के स्रोत तथा जीवन के मंत्र सूत्र बन जाते हैं। उनके सान्निध्य का अर्थ है- बाहरी के साथ-साथ आंतरिक बदलाव घटित होना।
आज की भौतिक सुखवादिता एवं सुविधावादी दृष्टिकोण ने जहां प्राकृतिक क्षेत्र में प्रदूषण फैलाया है उससे कहीं ज्यादा मन के गलत विचारों ने मानवीय संवेदना को प्रदूषित किया है। इन जटिल से जटिल होने हालातों को बदलने के लिये और जीवन को सकारात्मक दिशाएं देने के लिये चातुर्मास एक सशक्त माध्यम है। यह आत्म-निरीक्षण का अनुष्ठान है। यह महत्वाकांक्षाओं को थामता है। इन्द्रियों की आसक्ति को विवेक द्वारा समेटता है। मन की सतह पर जमी राग-द्वेष की दूषित परतों को उघाड़ता है। करणीय और अकरणीय का ज्ञान देता है तभी जीवन की दिशायें बदलती है।

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
hititbet giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
hititbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet
grandpashabet
hiltonbet giriş
hiltonbet giriş
katlabet giriş
katlabet giriş
meritking güncel giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
katlabet giriş
katlabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betasus giriş
betpark giriş
betasus
betasus
betasus giriş
betasus
meybet giriş
meybet giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
norabahis giriş