DSCN4385गतांक स आग….
अनुभवी लोग कहत हैं कि कृत्रिम साधनों क उपयोग स स्त्रियों को कंसर आदि रोग हो जात हैं। स्त्रियों क कोमल स कोमल मज्जातंतुओं पर इन कृत्रिम साधनों का बहुत खराब असर होता है, जिसस अनकों रोग उत्पन्न होत हैं। बहुत स प्रतिष्ठित डॉक्टरों का कहना है कि इन कृत्रिम साधनों क कारण बहुत सी स्त्रियां बंध्या हो गयी हैं। उनका जीवन शुष्क हो गया है और उनका संसार विष रूप हो गया है।
जज लिण्डस का मत
जज लिण्डस इन साधनों का पक्षपाती है। पर उस खबर नही है कि इसस कितना बड़ा सत्यानाश हुआ है। दखो अकल पैरिस मं ही 75 हजार तो रजिस्टर्ड और इसस अनक गुणा अनरजिस्टर्ड खानगी वश्याए हैं। फ्रांस क शहरों मं भी इस गंदगी का-जननन्द्रिय क रोगों का पार नही है। रोगों स पीडि़त हजारों स्त्रियां डॉक्टरों का घर ढूंढ़ती फिरती हैं। कितन ही वर्षों स फ्रांस मं जन्म की संख्या मरण की संख्या स कम हो गयी है। फ्रांसवासियों का नाम संसार मं नीति क विषय मं अत्यंत हीन हो गया है। फ्रांस की लड़कियां गुलामी क व्यापार मं चढ़ी बढ़ी हैं। गत एक सौ वर्ष मं फ्रांस की यह दशा हुई है, तो भी जज लिण्डस को अपन साधनों को नया आविष्कार कहत हुए शरम नही आती।
इन मूर्खों को कौन समझाव कि प्रजा मं जन्म-मरण की बढ़ी हुई संख्या को रोकन का उपाय कवल विषयभोग स निवृत्ति ही है? इन लोगों को क्यों नही सूझता कि पशुओं मं यही उपाय काम मं आ रहा है? इन लोगों को क्यों नही समझाई पड़ता कि इन कृत्रिम साधनों स स्त्रियां वश्या बनती हैं और पुरूष नपुंसक हो जात हैं? यह भ्रम है कि आरोग्य क लिए पुरूषों स संयम हो ही नही सकता। रोगरहित वीर्यवान पुरूषों मं विषयच्छा मंद हो जाती है, परंतु यदि उनमं पुरूषार्थ की कोई उच्च कामना प्रबलरूप धारण कर तो बहुत समय तक विषयच्छा मध्यम होती है। असल आवश्यकता तो उस महाध्यय की है जिसक लिए मनुष्य अपनी समस्त शक्ति व्यय करन का संकल्प कर। ऐस ध्यय अनक हैं। एक सामान्य ध्यय तो उत्तम संतान उत्पन्न करना ही है। आरोग्य बालक उत्पन्न करन उसक पालन पोषण करन और शिक्षा दकर उस योग्य नागरिक बनान मं लग जान स विषयच्छा लुप्त हो जाती है। दूसरा ध्यय कीर्ति का है। जैस कि मनुष्यों का कल्याण करना अथवा कोई और महान पराक्रम करक नाम पैदा करना आदि। संभव है नाम पैदा करन क साथ-साथ विषयभोग क लिए भी बहुत सा मौका मिल। परंतु कीर्ति की लालसा विषयच्छा को पूर्ण रीति स दबा सकती है।
आरोग्य क लिए विषयभोग आवश्यक है, इस भ्रम को दूर करना प्रत्यक डॉक्टर और अनुभवी सलाहकार का फर्ज है। मैं अपन अनुभव और अनक डॉक्टरों क समागम क परिणाम स कहता हूं कि बहुत वर्षों तक ब्रह्मचर्य धारण करन स कुछ भी नुकसान नही होता, बल्कि अपार लाभ होता है। अनक युवा पुरूषों मं जो उत्साह और तत्परता दखन मं आती है, वह विषयभोग स नही प्रत्युत संयम स ही है। प्रत्यक पुरूषार्थी मनुष्यों को जान अंजान इस सूत्र का पालन करना चाहिए कि विषय कामना तृप्त करन मं व्यय होन वाली शक्ति पुरूषार्थ सिद्घि मं लगाई जा सकती है और जितना ही शक्ति का संचय होगा उतनी ही बड़ी सिद्घि प्राप्त होगी। इस समग्र वर्णन स स्पष्ट हो रहा है कि किस प्रकार योरप मं कामुकता बढ़ी हुई है और किस प्रकार जनसंख्या की वृद्घि रोकन वाल कृत्रिम उपायों स अधिकाधिक दुखों की वृद्घि हुई है और किस प्रकार अब परिमित संतति को ब्रह्मचर्यपूर्वक उत्तम बनान का आयोजन हो रहा है। यह तो काम क्रीड़ा की दशा का वर्णन हुआ। अब दखना चाहिए कि उसकी सहायक विलासिता क विषय मं विद्वानों की क्या राय है।
विलासिता
अंग्रजी की सुप्रसिद्घ पत्रिका वलफयर मं मर बी. डी. बसु न विलासिता शीर्षक का एक विचारपूर्ण लख लिखा है। प्रोफसर रॉस की साक्षी स आप कहत हैं कि दूसर दशों क साथ समागम होन स लोगों का विदशी विलासिताओं स परिचय होता है और यह परिचय उनक हृदयों मं नई नई आकांक्षाएं उत्पन्न कर दता है। उपभोग्य वस्तुओं क परिणाम मं सहसा वृद्घि होन स और उनको प्राप्त करन क साधनों क अभाव स लोगों की धन प्राप्ति की लालसा प्रबल हो जाती है। यह लालसा उनक प्राचीन आदर्शों को नष्ट कर दती है और पदार्थों क प्राचीन मूल्यों मं उलट पुलट मचा दती है। विदशी संस्कृति की बहुत सी बातों को ग्रहण कर लन स ऊंची श्रणी क मनुष्यों का पतन हो जाता है। यूनानी नीतिशास्त्रज्ञों न एशिया की विलासिताओं का प्रचार दखकर दुख प्रकट किया था क्योंकि इस विलासिता न ही उनमं धन की इतनी प्रबल आकांक्षा उत्पन्न कर दी थी कि उन्होंन फारिस दश क राजा का वतन तक ल लिया था। दुर्भाग्यवशात इस समय भारत मं भी यही हो रहा है। विलासिता जाति क लिए आत्महत्या क समान है। क्योंकि इस विलासिता क साथ साथ लोगों मं बच्चों क जनन और परिपालन क प्रति भी अरूचि उत्पन्न हो जाती है। विलासिता ही फशन की जननी है।
काउंट गायकोमो ल्योपाडी न अपनी ‘फशन और मृत्यु का संवाद’ नामक पुस्तक मं इन दोनों को व्यंग्य पूर्वक एक दूसर की बहिन कहकर पुकारा है। वह मृत्यु क प्रति फशन स कहलवाता है कि बहिन हम तुम दोनों क जो भाव और कार्य हैं व सदा विश्व को नवीन करत हैं। पर तुमन तो सदा स ही मनुष्यों क शारीरिक संगठनों और उनक जीवनों क परिवर्तन मं अपन प्रयासों को लगा रक्खा है। किंतु मैं तो उनकी दाढ़ी कश, वस्त्र, सामान और मकान आदि क बदलत रहन मं ही अपनी चष्टाओं का प्रयोग करती हूं। यह सत्य है कि मैंन कभी कभी मनुष्यों क साथ कुछ चालाकियां की हैं पर व चालाकियां इतनी खराब नही हैं कि तुम्हार कार्यों स उनकी तुलना ही न की जा सक। मर कहन का सार यह है कि मैं सदा इस बात का प्रत्यन करती हूं कि अधिक आकांक्षा वाल मनुष्य जो मर प्रति प्रम रखत हैं, व उस प्रम क प्रतिफलस्वरूप नित्य सैकड़ों असुविधाएं और कभी कभी तो वदनाएं, विकलताएं और मृत्यु तक को सहन करत रहं। इसक प्रत्युत्तर मं मृत्यु कहती है कि धर्म की सौगंध अब मुझ विश्वास होन लगा है कि तुम वास्तव मं मरी बहिन हो। तुम्हारा कहना उतना ही सत्य है जितना मृत्यु अब तुम्हं इस बात की आवश्यकता नही है कि तुम अपन कुल पुरोहित का दिया हुआ जन्मपत्र इस बात को प्रमाणित करन क लिए पश करो कि तुम मरी बहिन को।
विलासिता और जिन कारखानों स विलासिता की सामग्री बनाकर धन एकत्रित किया जाता है, दोनों क लिए नौकरों की आवश्यकता होती है। आजकल नौकरों और कारखानों क कुलियों की जो हालत है, वह सभी जानत हैं। बड़ी बड़ी हड़तालं उसका प्रमाण हैं। यहां हम कारखानों क मजदूरों क विषय मं अधिक नही लिखना चाहत। हम तो यहां कवल खानगी नौकरों क लिए विषय मं दखत हैं कि उन क लिए कितना मानदान करना पड़ता है। इस संबंध का एक विज्ञापन स लकर हम यहां उधृत करत हैं। यह विज्ञापन जर्मनी नामक पत्र मं इस प्रकार प्रकाशित हुआ था कि एक कुटुम्ब क लिए जिसमं तीन बच्च हैं नौकरानी नही किंतु एक सहायका की आवश्यकता है। घर की रमणी स्वयं खूब काम करन वाली है। उसकी इच्छा कवल एक सहायका की है। वतन मिलगा पर यह कभी ख्याल न किया जाए कि वह तनख्वाह क लिए नौकरी करती है। काम क साथ ही खासा मनोरंजन रहगा। यदि उसकी इच्छा हो तो वह मार कुटुम्ब का अंग होकर रह। हम उसको अपना मातहत न समझंग। वह काम क अतिरिक्त समय मं स्वतंत्रतापूर्वक अन्यों क साथ मिलजुल सकती है। क्रमश:

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