क्या पुतिन का लोकतंत्र दुनिया के लिए एक संकट बन कर आया है?

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प्रणव प्रियदर्शी

बार-बार निर्वाचित हो रहे अति लोकप्रिय रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन के राज में कोई ऐसा भी व्यक्ति है जो उनके लिए खतरा बन सकता है, इसका अंदाजा दुनिया को पिछले हफ्ते तब हुआ जब रूस के एक विपक्षी नेता अलेक्सी नवाल्नी पांच महीने विदेश में बिताने के बाद स्वदेश लौटे और उन्हें एयरपोर्ट पर ही गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि रूसी शासन यह बताने की हर संभव कोशिश कर रहा है कि यह कोई खास बात नहीं है और नवाल्नी जैसों की कोई अहमियत नहीं है। नवाल्नी वही शख्स हैं जिन्हें पांच महीने पहले साइबेरिया में जहर देकर मारने की कोशिश की गई थी। कोमा की स्थिति में वह जर्मनी ले जाए गए जहां बड़ी मुश्किल से उनकी जान बचाई जा सकी। पर जान बच गई, और यह संभावना दिखाई देने लगी कि नवाल्नी वापस लौटकर अपनी सत्ताविरोधी राजनीतिक मुहिम को आगे बढ़ा सकते हैं तो रूसी अधिकारियों ने चेतावनी जारी की कि अगर वह रूस लौटे तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

डरता नहीं हूं
बावजूद इसके, नवाल्नी यह कहते हुए रूस लौटे कि पूतिन से या उनके अधिकारियों से वह नहीं डरते। उन्होंने अपने समर्थकों से भी अपील की कि वे बिना डरे उनसे मिलने आएं। रविवार को जिस फ्लाइट से वह लौट रहे थे, आखिरी पलों में उसकी लैंडिंग की जगह बदल दी गई। एयरपोर्ट से बाहर आने से पहले ही उन्हें हिरासत में ले लिया गया। फिर भी उनके समर्थकों को काबू में करने के लिए एयरपोर्ट पर रायट पुलिस तैनात करनी पड़ी। ध्यान रहे, नवाल्नी को जहर देने के मामले में भी आरोप यही है कि रूसी सरकार के एजेंटों ने यह काम किया है। सरकार इस आरोप को गलत बताती है। कुछ इस अंदाज में कि नवाल्नी भला इतने महत्वपूर्ण कैसे हो सकते हैं कि सरकार उन्हें मरवाने की कोशिश करे।
खुद पूतिन ने दिसंबर महीने में इस बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा था, ‘उन्हें चाहता कौन है?’ पर नवाल्नी और कुछ हों या न हों, एक रूसी नागरिक तो हैं। उनकी हत्या की कोशिश की गई है। इस लिहाज से सरकार की इतनी जिम्मदारी तो बनती ही है कि इस मामले की निष्पक्ष और प्रामाणिक जांच करवा कर दोषियों को उपयुक्त सजा दिलाए और जब तक ऐसा हो नहीं जाता, तब तक इसको लेकर अपनी पूरी प्रतिबद्धता जताए। मगर रूस की पूतिन सरकार की दिलचस्पी हत्या के आरोप की जांच से ज्यादा विक्टिम को गिरफ्तार करने में है। सबसे बड़ी बात यह कि रूस, खासकर पूतिन के रूस को करीब से देख रहे लोगों को इसमें कुछ भी अस्वाभाविक या असहज नहीं लग रहा।
पिछले करीब दो दशकों से पूतिन ने रूस में जिस तरह के लोकतंत्र की नींव रखी है, उसे पूतिन मॉडल ऑफ डेमोक्रेसी के रूप में पहचाना जाने लगा है। यह लोकतंत्र का ऐसा मॉडल है जिसमें चुनाव, संविधान, सिविल सोसाइटी, मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी- यानी लोकतंत्र के लिए आवश्यक माने जाने वाले सभी तत्व होते हैं, पर नाम मात्र के लिए। चुनाव समय पर होते हैं, पर उनके नतीजे इस कदर सुनिश्चित होते हैं कि उन्हें लेकर सत्ताधीश के चेहरे पर कभी शिकन तक नहीं आती। संविधान भी होता है, पर शासक अपनी इच्छा और जरूरत के मुताबिक उसमें संशोधन करवाता चलता है। सिविल सोसाइटी भी इस लोकतंत्र में फलती-फूलती है, शर्त सिर्फ यह होती है कि वह सत्ता के लिए असुविधाजनक न साबित हो। इसका जो हिस्सा सरकार की सुविधाओं का ख्याल नहीं रखता, उसे नष्ट होना पड़ता है। मीडिया के साथ भी यह छोटी सी शर्त लगी होती है कि वह स्वतंत्र दिखे, अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल करे, पर सत्ता द्वारा खींची गई अदृश्य लकीरों का पूरा ध्यान रखे, उन्हें पार करने की कोशिश न करे।
1999 में पहली बार सत्ता में आने के बाद पूतिन ने पूरे जतन से अपने सपनों के इस लोकतंत्र की नींव रखी और ईंट-ईंट जोड़ते हुए इसकी ऐसी शानदार इमारत खड़ी की कि दुनिया के अधिकतर सत्ताधीश उन्हें अपना आदर्श मानने लगे। चाहे हंगरी के विक्टर ओरबान हों या तुर्की के अर्दोगान, या तानाशाह बनने की चाहत रखने वाले दुनिया के बाकी तमाम नेता, वे खुलकर यह बात कहें या न कहें, पर सभी रूस के इसी पूतिन मार्का लोकतंत्र की कॉपी करने का प्रयास करते हैं। अमेरिका के डॉनल्ड ट्रंप आखिरी दम तक यही कोशिश करते हुए वाइट हाउस से निकले या निकाले गए। यह देखना दिलचस्प है कि आल्ट राइट, पोस्ट ट्रुथ, ट्रॉल आर्मी और फेक न्यूज जैसी तमाम प्रवृत्तियां, जिनका उभार दुनिया ने 21वीं सदी के दूसरे दशक के उत्तरार्ध में नोटिस किया, पूतिन के पीछे बीज रूप में कम से कम एक दशक पहले से चमक रही थीं। उनके राजनीतिक विरोधियों की संदिग्ध मौत का सिलसिला 2002-03 से ही शुरू हो जाता है।

सबक इस पूरे मामले का यही है कि चाहे जितनी कोशिश कर लें, चैन की सांस तो पूतिन जैसे शासक भी नहीं ले पाते। भोजपुरी की एक कहावत इन मामलों में चरितार्थ होती दिखती है कि खदेड़े वाला भी हांफेला। यानी हांफता तो खदेड़ने वाला भी है। लोकतंत्र के नाम पर जारी इस अलोकतांत्रिक, अन्यायपूर्ण प्रक्रिया को वास्तविक चुनौती लोकतांत्रिक तत्वों से ही मिलती है। अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप को हराकर राष्ट्रपति पद की शपथ लेने वाले जो बाइडन ने अपने पहले ही भाषण से खुद को ट्रंप का विलोम साबित करने का प्रयास किया। वजह यही है कि वह जानते हैं, ट्रंप को हरा देने के बाद भी ट्रंपवाद उनका पीछा नहीं छोड़ने वाला। पूतिन भले ही इतिहास के इस दुविधापूर्ण दौर के प्रतिनिधि हों, पर इस सचाई से वह भी वाकिफ हैं कि नवाल्नी की निर्भीकता उनके भय आधारित शासन के लिए खतरनाक है। एक राजनीतिक प्रवृत्ति के रूप में यह इतनी संक्रामक है कि एक बार फैल गई तो कोई वैक्सीन काम नहीं आने वाली।

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