भारत की रक्षा क्षेत्र की आवश्यकता और तेजस की खरीद का बड़ा फैसला

भारत की रक्षा क्षेत्र की आवश्यकता

योगेश कुमार गोयल

मिग विमानों का उपयुक्त विकल्प तलाशने और घरेलू विमानन क्षमताओं की उन्नति के उद्देश्य से देश में 1981 में लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट कार्यक्रम शुरू किया गया था। उसी के बाद 1983 में तेजस विमानों की परियोजना की नींव रखी गई थी।

गत 13 जनवरी को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में 45696 करोड़ रुपये की लागत से 73 एलसीए तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमान और 10 एलसीए तेजस एमके-1 ट्रेनर विमान की खरीद को मंजूरी दी गई जबकि डिजाइन और बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए 1202 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए। दरअसल भारतीय वायुसेना में काफी लंबे समय से अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों तथा रक्षा साजो-सामान की कमी महसूस की जा रही थी, ऐसे में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) द्वारा वायुसेना के लिए स्वदेशी लड़ाकू विमान ‘तेजस’ की खरीद का यह 47 हजार करोड़ का सौदा वायुसेना को मजबूत बनाने के दृष्टिगत बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

तेजस एचएएल द्वारा भारत में ही विकसित किया गया हल्का और मल्टीरोल फाइटर जेट है, जिसे वायुसेना के साथ नौसेना की जरूरतें पूरी करने के हिसाब से तैयार किया जा रहा है। लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) 1ए तेजस फाइटर तैयार करने के लिए एचएएल द्वारा नासिक तथा बेंगलुरू में सेटअप तैयार कर लिया गया है ताकि तय समय सीमा के अंदर इन विमानों की डिलीवरी वायुसेना को मिल सके। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के मुताबिक यह सौदा भारतीय रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए गेम-चेंजर होगा और इससे देश में 50 हजार नए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।

भारत को चीन, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश से युद्ध करते हुए महसूस होने लगा था कि देश को दुश्मनों की चुनौती का मुकाबला करने के लिए स्वदेशी लड़ाकू विमानों की जरूरत है। मिग-21 लड़ाकू विमान की पुरानी होती तकनीक को देखते हुए मिग विमानों का उपयुक्त विकल्प तलाशने और घरेलू विमानन क्षमताओं की उन्नति के उद्देश्य से देश में 1981 में लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट कार्यक्रम शुरू किया गया था। उसी के बाद 1983 में तेजस विमानों की परियोजना की नींव रखी गई थी। इसके लिए एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) का गठन किया गया, जिसके लिए तकनीकी विशेषज्ञों का चयन होने में करीब एक वर्ष का समय लगा। तेजस का जो सैंपल तैयार किया गया, उसने अपनी पहली उड़ान जनवरी 2001 में भरी थी लेकिन सारी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद यह हल्का लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन में 2016 में ही शामिल किया जा सका था। ‘तेजस’ का यह आधिकारिक नाम 4 मई 2003 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा रखा गया था। तेजस संस्कृत भाषा का नाम है, जिसका अर्थ है ‘अत्यधिक ताकतवर ऊर्जा’। वर्ष 2015 में तेजस को वायुसेना में शामिल करने की घोषणा हुई थी, जिसके बाद जुलाई 2016 में वायुसेना को दो तेजस सौंप दिए गए थे। वायुसेना को करीब दो सौ तेजस विमानों की जरूरत है। पिछले वर्षों में वायुसेना एचएएल को 40 तेजस विमानों की खरीद का ऑर्डर दे चुकी है, जिनमें से आधे से ज्यादा वायुसेना को मिल चुके हैं और अब 83 तेजस विमानों का नया सौदा आने वाले समय में वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने में मददगार होगा।

रक्षा मंत्री के अनुसार एलसीए-तेजस आने वाले वर्षों में भारतीय वायुसेना के लड़ाकू बेड़े की रीढ़ बनने जा रहा है। दरअसल वायुसेना में अभी तेजस की कुल दो स्क्वाड्रन हैं और 83 तेजस मिलने के बाद इनकी संख्या 6 हो जाएगी, जिनकी तैनाती अनिवार्य रूप से फ्रंटलाइन पर होगी। तेजस में कई ऐसी नई प्रौद्योगिकियों को भी शामिल किया गया है, जिनमें से कई का भारत में इससे पहले कभी प्रयास भी नहीं किया गया। वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल आरकेएस भदौरिया का कहना है कि तेजस लड़ाकू विमान चीन-पाकिस्तान के संयुक्त उद्यम में बने लड़ाकू विमान जेएफ-17 से हाईटेक और बेहतर हैं और यह किसी भी हथियार की बराबरी करने में सक्षम हैं। गुणवत्ता, क्षमता और सूक्ष्मता में तेजस के सामने जेएफ-17 कहीं नहीं टिक सकता। उनका कहना है कि तेजस आतंकी ठिकानों पर बालाकोट स्ट्राइक से भी ज्यादा ताकत से हमला करने में सक्षम है। एक तेजस मार्क 1ए लड़ाकू विमान की कीमत करीब 550 करोड़ रुपये है, जो एचएएल द्वारा ही निर्मित सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से करीब 120 करोड़ रुपये ज्यादा है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि तेजस मार्क 1ए लड़ाकू विमान इसी श्रेणी के दूसरे हल्के लड़ाकू विमानों से महंगा इसलिए है क्योंकि इसे बहुत सारी नई तकनीक के उपकरणों से लैस किया गया है। इसमें इजराइल में विकसित रडार के अलावा स्वदेश में विकसित रडार भी हैं। इसके अलावा इसमें अमेरिका की जीई कम्पनी द्वारा निर्मित एफ-404 टर्बो फैन इंजन लगा है। यह बहुआयामी लड़ाकू विमान है, जो मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी बेहतर नतीजे देने में सक्षम है।

42 फीसदी कार्बन फाइबर और 43 फीसदी एल्यूमीनियम एलॉय व टाइटेनियम से बनाए गए तेजस में एंटीशिप मिसाइल, बम तथा रॉकेट लगाए जा सकते हैं और यह हवा से हवा में और हवा से जमीन पर मिसाइलें छोड़ सकता है। लंबी दूरी की मार करने वाली मिसाइलों से लैस तेजस अपने लक्ष्य को लॉक कर उस पर निशाना दागने की विलक्षण क्षमता रखता है। यह कम ऊंचाई पर उड़कर नजदीक से भी दुश्मन पर सटीक निशाना साध सकता है। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक यह 8-9 टन तक वजन उठाने में सक्षम है और ध्वनि की गति से डेढ़ गुना से भी ज्यादा तेज उड़ सकते है। इसे जैमर प्रोटेक्शन तकनीक से लैस किया गया है ताकि दुश्मन सीमा के करीब संचार बाधित नहीं हो सके। यह दूर से ही दुश्मन के विमानों पर निशाना साध सकता है और दुश्मन के रडार को भी चकमा देने की क्षमता रखता है। पूर्णतया देश में ही विकसित करने के बाद तेजस की ढेरों परीक्षण उड़ान होने के बावजूद अब तक एक बार भी कोई भी उड़ान विफल नहीं रही और न ही किसी तरह का कोई हादसा हुआ। तेजस से हवा से हवा में मार करने वाली बीवीआर मिसाइल का सफल परीक्षण किया जा चुका है। इसके अलावा यह विमानवाहक पोत से टेकऑफ और लैंडिंग का परीक्षण एक ही उड़ान में पास कर चुका है। डीआरडीओ द्वारा तेजस का रात के समय किया गया अरेस्टेड लैंडिंग का ट्रायल भी पूर्ण रूप से सफल रहा था। कुल मिलाकर भारत में निर्मित तेजस फाइटर जेट भारतीय वायुसेना की कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरे हैं। साढ़े चार जनरेशन का हल्का लड़ाकू विमान तेजस भारत का पहला ऐसा स्वदेशी लड़ाकू विमान है, जिसमें 50 फीसदी से ज्यादा कलपुर्जे भारत में ही निर्मित हैं।

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