लद्दाख और डोकलाम विवाद के बाद चीन ने भारत से लगी सीमा पर बदली अपनी रणनीति

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सलमान रावी

पिछले साल अक्टूबर माह में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी सेना से कहा कि वो कोई भी युद्ध लड़ने के लिए ख़ुद को तैयार रखें.

तीन महीनों के अंदर ही दूसरी बार उन्होंने अपनी सेना को फिर से युद्ध के लिए ख़ुद को तैयार रखने का आह्वान किया है.

इस आह्वान के साथ-साथ शी जिनपिंग ने साल की शुरुआत में ही राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून की समीक्षा करते हुए सेना से संबंधित अहम नीतिगत फ़ैसलों के लिए ‘चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी’ यानी सीपीसी के ‘सेंट्रल मिलिट्री कमीशन’ को पूरी तरह से अधिकृत कर दिया है.

पहले ये शक्तियां चीनी मंत्रिमंडल यानी ‘स्टेट काउंसिल ऑफ़ चाइना’ के ही पास थीं. नए आदेश के बाद अब सैन्य कार्यवाही या फ़ैसलों में मंत्रिमंडल का कोई दख़ल नहीं होगा. शी जिनपिंग ‘सेंट्रल मिलिट्री कमीशन’ के प्रमुख भी हैं.

लेकिन जिस घटनाक्रम को लेकर भारत में रक्षा विशेषज्ञ अपनी नज़र बनाए हुए हैं, वो है शी जिनपिंग द्वारा पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के पश्चिमी थियेटर कमान के प्रमुख को हटाया जाना.

अप्रत्याशित कार्रवाई

जानकारों को लगता है कि जिनपिंग के इस फ़ैसले से स्पष्ट और सबसे बड़ा संकेत यह है कि चीन, लद्दाख में अपनी सेना की अब तक की कार्यवाही से ख़ुश नहीं है.

जनरल ज्हाओ जोंगकुई को पश्चिमी कमान से हटाकर उनकी जगह जनरल ज्हेंग जूड़ोंग को इसका नेतृत्व सौंपा गया है.

इसके अलावा वेस्टर्न थियेटर कमांड में पीएलए और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन से जुड़े चार अन्य अधिकारी भी हैं जिन्हें शी जिनपिंग ने प्रोन्नति दे दी है.

भारत में मौजूद रक्षा विश्लेषकों को लगता है कि शी जिनपिंग की ये कार्रवाई अप्रत्याशित है क्योंकि चीन की सेना में इस तरह के निर्णय कोई आम बात नहीं है.

ज्हाओ के हटाये जाने को लेकर अटकलें ही लगाई जा रहीं हैं. ऐसा माना जा रहा है कि उनकी बढ़ती उम्र की वजह से उन्हें हटाया गया है.

चीन ने युद्ध की तैयारियों के लिए रक्षा नियमों में किया संशोधन

डोकलाम विवाद

लेकिन दूसरी तरफ़ ये भी सच है कि चीन की भारत से लगी 4500 किलोमीटर लंबी सीमा की जितनी जानकारी और अनुभव ज्हाओ के पास है वो पीएलए के किसी दूसरे जनरल के पास नहीं है.

ज्हाओ ही वो जनरल हैं जिनके नेतृत्व में चीन की सेना ने डोकलाम में भारत की सीमा में घुसपैठ करने की कोशिश की थी.

लेकिन जानकार मानते हैं कि जनरल ज्हाओ भारत के मामले में अनुभवी ज़रूर हैं, लेकिन जिस तरह भारत की सेना ने चीन की सेना के हर क़दम का सख्ती से जवाब दिया और चीन की सेना को ज़्यादा आगे बढ़ने से रोकने में कामयाब हुई, उससे स्पष्ट है कि चीन की ‘सेंट्रल सेंट्रल मिलिट्री’ इससे ख़ुश नहीं होगा.

चाहे वो पेंगोंग त्सो झीले के इलाक़े में घुसपैठ हो या गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर हमला हो.

भारतीय सेना ने चीन की कार्रवाई का सख्ती से जवाब भी दिया और ऐसा दावा है कि गलवान में कई चीनी सैनिक भी मारे गए थे.

सेंट्रल मिलिट्री कमीशन

जनरल ज्हेंग जूड़ोंग को लेकर बहुत ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है सिवाय इसके कि वो बीजिंग की सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार सेंट्रल थियेटर कमांड के उप-कमांडर रह चुके हैं.

वो चीन की 70 वीं जयंती के उपलक्ष्य में हुई सैन्य बलों की साझा परेड के उप-कमांडर भी थे जिसकी वजह से उनके सेंट्रल मिलिट्री कमीशन से ख़ूब वाहवाही भी मिली थी.

चीन की सेना के पाँच थियेटर कमांड हैं जिनमें से पश्चिमी थियेटर कमांड काफ़ी महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इसकी स्थापना राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा की गई और इसके अधीन बड़े ही संवेदनशील इलाक़े आते हैं जैसे सीचुवान, तिब्बत, निंग्शिया, कुइंगहाई, शिनजियांग, शानशी, यून्नान और चोंगकुइंग.

सामरिक मामलों के जानकार और लंदन स्थित किंग्स कॉलेज के प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत के अनुसार, “सिर्फ़ लद्दाख या गलवान में ही चीन को मुंह की नहीं खानी पड़ी है जबकि उसे दक्षिण एशिया के दूसरे दशों में भी कूटनीतिक रूप से असफलता का सामना ही करना पड़ा है.”

भारत की सेना की मुस्तैदी

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने नेपाल का उदहारण दिया जहाँ चीन ने अपना विशेष दूत भेजकर वहां पैदा हुए राजनीतिक संकट में मध्यस्थता करने की कोशिश की.

लेकिन यहाँ भी चीन को नाकामयाबी हासिल हुई क्योंकि न तो नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के ख़ेमे ने उसकी बात सुनी ना ही विरोधी ख़ेमे के माधव नेपाल, रूप कमल दहल, प्रचंड और बाबूराम भाट्टाराई ने ही.

जानकार मानते हैं कि सीमा पर जो चीन चाहता था, वो भारत की सेना की मुस्तैदी और रणनीति की वजह से करने में सफल नहीं हो पाया, इसलिए उसने अचानक इस तरह के क़दम उठाने शुरू कर दिए हैं.

सामरिक मामलों के जानकार कहते हैं कि पिहले साल के अक्टूबर माह से ही शी जिनपिंग पीएलए को युद्ध के लिए हर समय तैयार रहने के लिए बोलते आ रहे हैं.

‘ताक़तवर तानाशाह के रूप में’

ये इस बात के संकेत हैं कि जिनपिंग मान रहे हैं कि जिस भारत की सैन्य ताक़त को वो कम कर आंक रहे थे, उसी भारत की सेना ने पीएलए को ना सिर्फ़ रोकने में कामयाबी हासिल की है बल्कि कैलाश पहाड़ियों की श्रृंखला में भारत की सेना ने नए मोर्चे सँभालने में भी सफलता हासिल कर ली जिससे चीन के मंसूबों पर पानी फिर गया.

पंत कहते हैं, “शी जिनपिंग सारे अधिकार अपने पास रखने में कामयाब हो गए हैं. उन्होंने पहले सेंट्रल मिलिट्री कमीशन की बागडोर ख़ुद संभाल ली और फिर इस साल की पहली तरीख़ को पुराने क़ानून में संशोधन कर मंत्रिमंडल को सेना के लिए फ़ैसले लेने क अधिकार से वंचित कर दिया. अब वो पूरी तरह से ताक़तवर तानाशाह के रूप में स्थापित हो गए हैं जिनके अलावा किसी और के पास कोई अधिकार दिया ही नहीं गया है. ये कम्युनिस्ट विचार से भी अलग हटकर है. कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान के अनुसार एक समूह होता है जो नीतिगत फ़ैसले लेता है. अब ना चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और ना ही मंत्रिमंडल में किसी के पास कोई अधिकार बचा है. सब को शी जिनपिंग ने ख़ुद के अधीन कर लिया है.”

नीतिगत फ़ैसला

चीन के सूचोव विश्वविद्यालय में मिलिट्री क़ानून के विशेषज्ञ जेंग ज्हिपिंग के अनुसार क़ानून में किये गए बदलाव के बाद अब चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना की तैनाती आदि के मामलों में कोई भी नीतिगत फ़ैसला लेना चीन के मंत्रिमंडल के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गया है.
बीबीसी से साभार

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