प्रतीक्षा में समय न गँवाएँ

जो होना था सो हो गया

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

 

ईश्वर ने हमें पहले के युगों के मुकाबले अब बहुत ही कम आयु दी है और उसका भी अधिकांश समय हम भविष्यवाणियों, कयासों और प्रतीक्षा से लेकर चर्चाओं और बहसों में गुजार दिया करते हैं जबकि इस समय का यदि हम सदुपयोग करना सीख जाएं तो यह दुनिया अपने आप स्वर्ग बन जाए। लेकिन ऎसा होता नहीं है।

हम अपनी विद्वत्ता, मेधा, प्रज्ञा और बौद्धिक बल को सर्वोच्च शिखरों पर रखे रखने के लिए तर्क-कुतर्क और बहसों का सहारा लेते हैं। हमें अपने मूल कामों से भी ज्यादा रास आता है उन विषयों पर निरर्थक चर्चा और बहस करना जो अपने आप, हमारे बिना किसी सोच-विचार के स्वतः प्रवाह के रूप में होने वाले हैं या जिनके लिए कत्र्तव्य कर्म पूर्ण हो चुका होता है लेकिन सिर्फ समय की प्रतीक्षा शेष होती है।

कई बार यह प्रतीक्षा मिनटों से लेकर घण्टों तक की होती है, कई बार यह अवधि महीनों तक की हो सकती है। आमतौर पर प्रतीक्षा का काल वह समय होता है जब हमारे चित्त की अवस्था उद्विग्न और अशांत होती है क्योंकि आजकल हम सभी का ध्यान कत्र्तव्य कर्म से कहीं ज्यादा फल प्राप्ति में है और फल भी हम ऎसा चाहते हैं जिसके लिए हमें किसी भी प्रकार की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़े।hindiblog

हममें से खूब सारे लोग ऎसे भी हैं जो यह चाहते हैं कि बिना मेहनत किए हुए ही हमें फल मिल जाए, चाहे उसके लिए कोई सा शोर्ट कट क्यों न अपनाना पड़े। इन सारी उधेड़बुन भरी स्थितियों के बीच शाश्वत सत्य और यथार्थ यही है कि हमारे पूरे जीवन का काफी कुछ समय किसी न किसी प्रकार की प्रतीक्षा में ही बीत जाता है।

यह ऎसा कालखण्ड होता है जिसका न हमारे जीवन के लिए कोई अर्थ होता है, न औरों के लिए, न समाज या देश के लिए। छोटी-मोटी अवधि को मिलाकर यह कालखण्ड बहुत बड़ा हो जाता है और इसे अपने जीवन का शून्य काल कहा जा सकता है जो अपनी पूर्ण आयु में से यों ही बीत जाता है।

प्रतीक्षा छोटी हो या बड़ी, हम थोड़ी गंभीरता से सोचें, जीवन में संयम, धैर्य और गांभीर्य लाएं और प्रकृति एवं परिवेश के नैसर्गिक प्रवाह को समझने की कोशिश करें तो हम पाएंगे कि जो समय हम प्रतीक्षा काल में निरर्थक बोलने-सुनने और घूमने-फिरने में करते हैं उसका सदुपयोग कर हम अपने जीवन को सँवार सकते हैं, साथ ही समाज, अपने क्षेत्र और देश के लिए भी उपयोगी बना सकते हैं।

प्रतीक्षा दो प्रकार की होती है। एक में कर्म करने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है जबकि दूसरे में कर्म हो चुका होता है लेकिन परिणाम आने में देरी होती है और सिर्फ फल प्राप्ति के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। दोनों ही प्रकार की प्रतीक्षा में जमीन आसमान का अंतर होता है।

जो कर्म होने हैं, भावी हैं, उनके लिए चित्त में उद्विग्नता और भविष्य को लेकर आशंकाओं का होना स्वाभाविक है और यह प्रत्येक व्यक्ति में न्यूनाधिक रूप से अस्तित्व में होती है लेकिन हम अपने जो कर्म पूरे कर चुके हैं और सिर्फ परिणामों की प्रतीक्षा है उनके लिए उद्विग्नता, चिंता और आशंकाओं का होना पूरी तरह बेमानी हैं।

कर्म पूर्णता के बाद प्रतीक्षा करने की बजाय हमें प्रतीक्षा को छोड़ कर अपनी ऊर्जाओं, श्रम और समय को व्यक्तिगत, सामुदायिक और परिवेशीय चिंतन और रचनात्मक कार्यों में लगाना चाहिए ताकि अपने लिए, घर-परिवार और समाज, अपने क्षेत्र तथा देश के लिए कुछ करने का वक्त निकाल सकें।

इस समय को हम धैर्य और शांति के साथ गुजारना सीख जाएं तो हम समाज और देश को बहुत कुछ दे सकते हैं। जो होना था सो हो गया, अब परिणामों की प्रतीक्षा में बहसों और चर्चाओं का कोई औचित्य नहीं है। जो कुछ होना है वह हमारे हाथों हो चुका है, अब उसके परिणाम की चिंता में वक्त को जाया न करेें क्योंकि अब उन विषयों पर सोच-विचार, बहस और चिंताओं का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि अब उनमें किसी भी प्रकार का कोई बदलाव आना संभव नहीं है।

ऎसे में प्रतीक्षा काल के महत्त्व को जानें और इस पूरे समय का सदुपयोग करना सीखें। हम सभी लोग अगर इस सच को स्वीकार कर लें और रचनात्मक कर्म को जीवन का अहम हिस्सा बना लें तो अपना हर प्रतीक्षा काल यादगार और ऎतिहासिक आयाम स्थापित कर सकता है।

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