वेदों के प्रचार से अविद्या दूर होने सहित विद्या की प्राप्ति होती है

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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।
मनुष्य अल्पज्ञ प्राणी है। परमात्मा ने सब प्राणियों को स्वभाविक ज्ञान दिया है। मनुष्येतर प्राणियों को अपने माता, पिता या अन्य किसी आचार्य से पढ़ना व सीखना नहीं पड़ता। वह अपने स्वभाविक ज्ञान के सहारे अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं। इसके विपरीत मनुष्य के पास स्वाभाविक ज्ञान इस मात्रा में नहीं होता कि वह अपना पूरा जीवन उसके आधार पर सुखपूर्वक व्यतीत कर सकें। उसे अपने माता, पिता, आचार्य, विद्वानों तथा विद्वान पूर्वजों वा ऋषि मुनियों के सत्ज्ञान से युक्त ग्रन्थों का अध्ययन कर ही ज्ञान प्राप्त कर जीवन व्यतीत करना होता है। समाज में मनुष्य को जो ज्ञान प्राप्त होता है वह सत्य व असत्य से युक्त व मिश्रित होता है। सत्य व असत्य का पृथक पृथक ज्ञान साधारण मनुष्यों को नहीं होता। साधारण मनुष्य असत्य को भी सत्य मानकर उसका प्रयोग व व्यवहार करते हैं। विद्वान मनुष्य ही सत्य व असत्य के भेद को जानते हैं। ऋषि दयानन्द के समय में मूर्तिपूजा प्रचलित थी। मूर्तिपूजा में मूर्ति को ही ईश्वर का पर्याय मान लिया जाता है। सभी मूर्तिपूजक प्रायः इसको स्वीकार करते हैं। ऋषि दयानन्द बालक थे जब शिवरात्रि के दिन उन्होंने मन्दिर में रात्रि समय में शिव की मूर्तियों पर चूहों को अबाध रूप से क्रीडा करते व उछल कूद करते हुए देखा था। इस घटना से उन्हें मूर्ति के सर्वशक्तिमान शिव व ईश्वर होने में सन्देह हो गया था। अतः इस घटना की प्रेरणा से उन्होंने अपना जीवन ईश्वर के सच्चे स्वरूप की खोज में लगाया था।

ऋषि दयानन्द को अत्यन्त तप व अनुसंधानों के बाद मूर्ति के ईश्वर व शिव न होने तथा ईश्वर व कल्याण करने वाले शिव के सत्यस्वरूप का ज्ञान हुआ था। इसके साथ उनको यह भी ज्ञान हुआ था सभी मत मतान्तरों में अविद्या व अन्धविश्वास विद्यमान है। ऐसा कोई मत नहीं था जो पूर्ण सत्य मान्यताओं, सिद्धान्तों व परम्पराओं पर आधारित हो। इस कारण उन्होंने परमात्मा की आज्ञा व प्रेरणाओं को ग्रहण कर ईश्वर प्रदत्त सत्य ज्ञान वेदों व उसकी मान्यताओं तथा सिद्धान्तों के प्रचार व प्रसार का कार्य किया था। इसका कारण यह है सत्य को जानने व उसका आचरण करने तथा असत्य को भी जानने व उसका त्याग करने से ही मनुष्य जाति की उन्नति होती है। मनुष्य का जीवन व परलोक सुधरता था। मनुष्य के दुःख व दारिद्रय दूर होने के साथ मनुष्य सुखी व सन्तुष्ट होता है। संसार व उसके सभी मनुष्यों व इतर प्राणियों के हित व कल्याण के लिये ही ऋषि दयानन्द अविद्या व असत्य ज्ञान से रहित तथा सद्ज्ञान व विद्या से पूर्णतया युक्त वेदज्ञान के प्रचार व प्रसार में प्रवृत्त हुए थे। उनके प्रचार व प्रयत्नों से ही संसार को अविद्या व विद्या का यथार्थ भेद पता चला। ऋषि दयानन्द के अनुयायी आज भी वेदज्ञान के महत्व को जानते हैं और मत-मतान्तरों व उनके ग्रन्थों में जो अविद्या व अविद्यायुक्त मान्यतायें व परम्परायें हैं, उसका भी उन्हें ज्ञान है। इसी कारण से वह अविद्या का त्याग कर ज्ञानयुक्त ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र यज्ञ, पितृ यज्ञ, अतिथि यज्ञ तथा बलिवैश्वदेव यज्ञ करने सहित देश व समाज हित तथा परोपकार आदि के काम करते हैं। संसार के मत-मतान्तरों को आर्यसमाज का विरोध करते हुए भी देखा जाता है जिसका कारण उनके मतों की अविद्या व उनके आचार्य व अनुयायियों के उनसे जुड़े हित व अहित हुआ करते हैं।

वेदों के प्रचार से अविद्या दूर होती है यह बात पूर्णतया सत्य है। इसे अनेक उदाहरणों व प्रमाणों से भी सिद्ध किया जा सकता है। मनुष्य के सामने प्रश्न होता है कि संसार में ईश्वर है या नहीं यदि है तो उसका स्वरूप कैसा है? इस प्रश्न का उत्तर वेदों से मिलता है। वेद ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं और इस सृष्टि को ईश्वर से बना हुआ बताते हैं। अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि जिस ईश्वर ने इस सृष्टि और समस्त प्राणी जगत को बनाया है उसका स्वरूप कैसा है? इसका विस्तृत ज्ञान वेदों व वेद के ऋषियों के बनाये दर्शन एवं उपनिषद आदि ग्रन्थों में सुलभ होता है। वेदों से ईश्वर का जो सत्यस्वरूप प्राप्त होता है उसे ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज के दूसरे नियम के रूप में सूत्रबद्ध कर प्रस्तुत किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है।’ ऋषि दयानन्द ने बताया है कि ईश्वर एक चेतन सत्ता है जिसमें अनन्त गुण हैं। वह स्वभाव से दयालु व धार्मिक है। सभी जीव, मनुष्य व प्राणी ईश्वर की सन्तान के तुल्य हैं। वह सब जीवों का माता, पिता, आचार्य, राजा, न्यायाधीश, बन्धु, सखा व मित्र आदि के समान रक्षा, पालन व सहायक है। सभी मनुष्यों को उसकी ही शरण में जाकर उसकी स्तुति, प्रार्थना और उपासना करनी चाहिये। ईश्वर के स्थान पर कोई भी जीवित वा मृत आचार्य, महापुरुष, धर्मज्ञ व गुणसम्पन्न व्यक्ति उपासनीय व भक्ति करने योग्य नहीं है। संसार के सब मनुष्यों का उपासनीय एक ही सच्चिदानन्दगुणयुक्त परमेश्वर है। उसकी उपासना से ही मनुष्य को ज्ञान, बल, स्वास्थ्य, आरोग्य, रोगों व दुःखों से निवृत्ति, सुखों की प्राप्ति तथा लौकिक व पारलौकिक उन्नति की प्राप्ति होती है। इसी कारण हमारे अविद्या से मुक्त तथा विद्या से युक्त पूर्वज ऋषि, मुनि, योगी व विद्वान हुआ करते थे तथा वह सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामीस्वरूप वाले एक ईश्वर की ही स्तुति, प्रार्थना, उपासना व भक्ति वैदिक रीति से किया करते थे। आज भी संसार से दुःख व क्लेशों को दूर करने के लिये मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त मान्यताओं का त्याग कर सब मनुष्यों को एक ही सत्यस्वरूप परमेश्वर की उपासना करनी योग्य एवं उचित है। ऐसा करके ही सबकी उन्नति व दुःखों की निवृत्ति हो सकती है।

ऋषि दयानन्द ने जीवात्मा तथा सृष्टि का कारण जड़ पदार्थ प्रकृति के सत्यस्वरूप को भी वेद व दर्शन आदि के आधार पर अपने सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों में प्रस्तुत किया है जो ज्ञान व विज्ञान के नियमों व कसौटी पर सत्य सिद्ध होता है। ईश्वर जीव व प्रकृति का सत्य व यथार्थ ज्ञान होना ही विद्या कहलाती है। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर तथा जीवात्मा के गुण, कर्म और स्वभाव पर प्रकाश भी डाला है। परमात्मा और जीवात्मा के कुछ गुणों में समानता है। इसका उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा है कि ईश्वर व जीव दोनों चेतनस्वरूप हैं। दोनों का स्वभाव पवित्र, अविनाशी और धार्मिकता आदि है। परमेश्वर के सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, सब को नियम में रखना, सब जीवों को पाप पुण्यों के फल देना आदि धर्मयुक्त कर्म हैं। यह कर्म जीव में नहीं होते। ईश्वर से भिन्न जीव में सन्तानोत्पत्ति, सन्तानों का पालन, शिल्पविद्या आदि अच्छे बुरे कर्म हैं। ईश्वर में नित्य ज्ञान, आनन्द तथा अनन्त बल आदि गुण हैं। ईश्वर के गुणों से इतर जीवों में जो गुण हैं उन पर भी ऋषि दयानन्द ने प्रकाश डाला है। वह लिखते हैं कि जीवों में इच्छा वा पदार्थों की प्राप्ति की अभिलाषा, दुःख आदि की अनिच्छा, वैर, प्रयत्न वा पुरुषार्थ, बल, सुख व आनन्द, दुःख अर्थात् विलाप व अप्रसन्नता, ज्ञान वा विवेक तथा मनुष्य व इतर प्राणियों को कुछ चिन्हों आदि के द्वारा पहिचानना आदि अनेक गुण होते हैं।

जीवात्मा के अन्य गुणों में प्राण वायु को बाहर निकालना, प्राण को बाहर से भीतर को लेना, आंख को मींचना, आंख को खोलना, जीवन वा प्राण को धारण करना, मन से विचारणीय विषयों व प्रकरणों में सत्यासत्य का निश्चय करना, अहंकार करना, गति करना व चलना, सब इन्द्रियों को चलाना, भिन्न भिन्न क्षुधा, तृषा, हर्ष शोकादियुक्त होना आदि जीवात्मा के गुण परमात्मा से भिन्न हैं। जीवात्मा के यह गुण मनुष्यादि प्राणी योनियों में जन्म होने पर प्रकाशित होते हैं। ऋषि लिखते हैं कि जब तक आत्मा देह में होता है तभी तक ये गुण प्रकाशित रहते हैं और जब शरीर छोड़ चला जाता है तब ये गुण शरीर में नहीं रहते। जिस के होने से जो हों और न होने से न हों वे गुण उसी के होते हैं। जैसे दीप और सूर्यादि के न होने से प्रकाशादि का न होना और होने से होना है, वैसे ही जीव और परमात्मा का ज्ञान-विज्ञान गुण द्वारा होता है। ईश्वर और जीव के गुण, कर्म व स्वभाव की ही भांति ऋषि दयानन्द जी ने प्रकृति के गुणों, विकारों व सृष्टि उत्पत्ति, पालन व प्रलय आदि से संबंधित प्रश्नों के उत्तर भी विस्तार से अपने महत्वपूर्ण ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में दिये हैं। सभी पाठकों को सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ पढ़ना चाहिये। इससे उनकी सभी शंकाओं व भ्रान्तियों का समाधान हो जायेगा।

विद्या के अन्तर्गत आने वाले सभी विषयों पर ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश आदि अपने ग्रन्थों में प्रकाश डाला है। उपासना की सत्य व लाभकारी विधि भी हमें ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों से विदित होती है। ऋषि दयानन्द के ज्ञान का आधार ईश्वर प्रदत्त चार वेदों का ज्ञान था। उन्होंने ऋग्वेद आंशिक तथा यजुर्वेद सम्पूर्ण का संस्कृत व हिन्दी में भाष्य, मन्त्रों के पदार्थ व भावार्थ भी अपने वेदभाष्य में दिये हैं। उनके अनुयायी विद्वानों ने भी चारों वेदों के भाष्य किये हैं जिससे वेदों का अध्ययन कर मनुष्य की अविद्या पूर्णतः दूर हो जाती है। वेदों व वैदिक साहित्य के अध्ययन से जो लाभ मनुष्य को होता है वह किसी मत-मतान्तर व उसके ग्रन्थों के अध्ययन से नहीं होता। सभी मतों की मान्यताओं में मिश्रित अविद्या का ज्ञान भी ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में की गई अपनी समालोचना में प्रस्तुत किया है। इससे हम सभी मत-मतान्तरों की यथार्थ स्थिति को जान सकते हैं। हमें अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता। वेदों की सर्वोपरि विशेषता के कारण ही निष्पक्ष भाव से ऋषि दयानन्द ने ईश्वरप्रदत्त ज्ञान वेदों को अपनाया था। जो मनुष्य अपनी सांसारिक व पारलौकिक उन्नति करना चाहते हैं उन्हें धर्म मार्ग पर चलकर अर्थ, काम व मोक्ष को सिद्ध करना चाहिये। धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति के लिए वेदमार्ग पर चलना अपरिहार्य है। इसका अन्य उपाय नहीं है। कृत्रिम दया व सेवा के काम करने मात्र से हमारी व किसी की पारलौकिक उन्नति व मोक्ष आदि की प्राप्ति असम्भव है। अतः सभी को ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों तथा वेदों का अध्ययन कर अपने जीवन को विद्या से युक्त तथा अविद्या से मुक्त करना चाहिये। आर्यसमाज से जुड़ने पर अनेक वेदाचार्यों एवं वेद के विद्वानों से हमारा सम्पर्क हो जाता है और इससे हम अपने जीवन को सत्य व विवेक से युक्त कर सकते हैं और इष्ट फलों को प्राप्त कर सकते हैं। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः 09412985121

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