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किसी भी संस्था या संस्थान को गरिमामय बनाने के लिए उसका दिव्य और भव्य होना बहुत आवश्यक माना गया है। जब तक कोई संस्था ,संस्थान या व्यक्तित्व दिव्य और भव्य नहीं होगा तब तक उसकी गरिमा में चार चांद नहीं लग सकते । यही कारण है कि मनु महाराज सहित हमारे जितने भी राजनीति शास्त्री प्राचीन काल में हुए हैं, उन सबने राजा की पोशाक और उसके निवास स्थानों के दिव्य और भव्य होने की आवश्यकता पर बहुत अधिक बल दिया है।


भारत की वर्तमान मोदी सरकार ने देश की संसद के नए भवन का शिलान्यास बीते 10 दिसंबर को किया है। स्वयं प्रधानमंत्री श्री मोदी द्वारा इस नए भवन का शिलान्यास किया गया है। इसकी दिव्यता और भव्यता पर सरकार ने विशेष ध्यान दिया है।
नया संसद भवन हमारी वर्तमान संसद के निकट ही बनाया जा रहा है । वर्तमान संसद भवन को अंग्रेजों ने अपनी औपनिवेशिक आवश्यकताओं के अनुरूप 1921 में बनाना आरम्भ किया था और 1927 की 18 जनवरी को इसे देश के लिए समर्पित किया था ।उस समय यह संसद भवन उपनिवेशवादी व्यवस्था का प्रतीक था।
आर्थिक संसाधनों की कमी के चलते स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात इस भवन के दोबारा निर्माण की आवश्यकता को उचित नहीं माना गया, अन्यथा उचित तो यही होता कि उपनिवेशवादी व्यवस्था के प्रतीक इस संसद भवन को गिराकर या इसका किसी और प्रकार से सदुपयोग करते हुए नया संसद भवन स्वाधीन भारत अपने लिए बनाता। वैसे कांग्रेसी सरकारों को अंग्रेजो के द्वारा बनाई गई किसी भी इमारत में कोई उपनिवेशवादी सोच या दृष्टिकोण दिखाई नहीं देता था। अब जो नया संसद भवन बनाया जा रहा है वह तिकोना होगा जबकि वर्तमान संसद भवन वृत्ताकार है ।
देश में जिस प्रकार जनसंख्या बढ़ती जा रही है, उसी के अनुरूप समस्याएं भी बढ़ी हैं। अब से 40 वर्ष पूर्व जिलाधिकारी के कार्यालय जितने छोटे आकार में हुआ करते थे , वह भी अब उतने आकार के नहीं रहे । समय की आवश्यकता के अनुरूप उनमें भी वृद्धि की गई है यद्यपि 40 वर्ष पूर्व देश में जितने जिले थे,उन जिलों के भी लगभग दोगुने जिले अब हो चुके हैं । इसके उपरांत भी जिलाधिकारियों के कार्यालयों को विस्तार दिया गया है । स्पष्ट है कि जब जिलाधिकारियों के कार्यालयों का विस्तार या वृद्धि समय की आवश्यकता को समझते हुए की गई है तो देश के संसद भवन का विस्तार भी किया जाना समय की आवश्यकता बन चुकी थी । वर्तमान संसद इस बदली हुई परिस्थिति के लिए छोटी पड़ती जा रही थी ।
हमारी वर्तमान संसद अत्याधुनिक सुविधाओं से लेस नहीं मानी जा सकती। इसके उपरांत भी कांग्रेस जैसी पार्टियां नए संसद भवन के शिलान्यास को लेकर यह कहकर आलोचना कर रही हैं कि जब देश पहले ही आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है तब देश का पैसा नए संसद भवन पर खर्च करना मोदी सरकार की मूर्खता है। अब इन कांग्रेसियों से कौन पूछे कि देश तो एशियाड और ओलंपियाड के समय भी आर्थिक विषमताओं से जूझ रहा था, जिस समय हजारों हजारों करोड रुपए कांग्रेसी सरकारों ने खेलों पर व्यर्थ में ही बहा दिया था । इतना ही नहीं, उन खेलों में इतने लंबे चौड़े घोटाले हुए थे कि वर्तमान मोदी सरकार जितने पैसे में एक संसद भवन बनाने जा रही है उस जैसे संसद भवन अनेकों बन सकते थे। घोटालों में नष्ट किए गए उस पैसे को क्या कांग्रेस ने अपने बाप का पैसा समझ लिया था ? – निश्चित रूप से वह धन भी जनता का ही था, जिसे देश के बदन से चिपकी हुई कांग्रेस नाम की जोंक चूस रही थी। वर्तमान में कांग्रेस की यह प्रवृत्ति बन चुकी है कि जिस काम को वह स्वयं करे वह तो जनहित में माना जाए और जिसे केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार करे वह जनविरोधी है।
हमारा मानना है कि कांग्रेस की सरकारों के द्वारा यदि एशियाड और ओलंपियाड का आयोजन किया गया तो वह भी देश के सम्मान के लिए उस समय आवश्यक था, उसी प्रकार देश की वर्तमान आवश्यकता और परिस्थितियों के दृष्टिगत नए संसद भवन का निर्माण किया जाना भी समय की आवश्यकता है।
लोकसभा सचिवालय के अनुसार नया संसद भवन अक्तूबर 2022 तक बनकर तैयार हो जाएगा। ध्यान रहे कि 2022 वह वर्ष है जब हमारे देश को स्वाधीन हुए 75 वर्ष पूर्ण हो रहे होंगे अर्थात स्वाधीनता की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर देश नए संसद भवन से अपनी सरकार को चलते हुए देखेगा।

हमारी वर्तमान लोकसभा में 543 सदस्य होते हैं । संसदीय क्षेत्रों के नए परिसीमन के अनुसार इनकी संख्या भविष्य में बढ़ना निश्चित है और जिस प्रकार देश की जनसंख्या में वृद्धि होती जा रही है उसके दृष्टिगत भविष्य में इनके निरंतर बढ़ते रहने की संभावना है । इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए नए संसद भवन में 888 लोकसभा सदस्यों के बैठने की व्यवस्था की गई है। यह भी स्पष्ट किया गया है कि नई संसद भवन में लोकसभा भूतल पर ही रखी जाएगी।
यदि संसद के उच्च सदन अर्थात राज्यसभा की बात करें तो उसमें वर्तमान में 245 सदस्य होते हैं , जबकि नए संसद भवन में इन सदस्यों की संभावित संख्या भी 384 रखी गई है । यदि भविष्य में किसी भी अवसर पर संसद का संयुक्त अधिवेशन आहूत किया जाता है तो ऐसी व्यवस्था भी की गई है कि 1272 सदस्य उस स्थिति में एक साथ बैठ सकेंगे।
हमारे सांसद वर्तमान में लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं । जिनके लिए यह आवश्यक है कि संसद के भीतर ही उनका अपना निजी कक्ष हो । जिसमें वह अपने क्षेत्र के लोगों से मेल मुलाकात कर सकें या संसद में चल रही किसी बहस में सम्मिलित होने के लिए या अपने किसी क्षेत्रीय समस्या को उठाने के लिए वहां बैठकर अपनी तैयारी कर सकें। इस बात को दृष्टिगत रखते हुए नए संसद भवन में यह व्यवस्था की गई है कि सभी सांसदों को डिजिटल सुविधाएं प्रदान की जाएं और उन्हें अपना अलग से कार्यालय भी प्रदान किया जाए।
नए संसद भवन में एक भव्य संविधान कक्ष या कांस्टीट्यूशनल हॉल भी होगा। जिसमें भारत की लोकतांत्रिक विरासत को पूर्ण भव्यता के साथ प्रकट करने की व्यवस्था की जाएगी। जिससे किसी भी आगंतुक को भारत की लोकतांत्रिक विरासत से परिचित कराया जाए सकेगा। इस भवन या कक्ष में भारत के संविधान की मूल प्रति को भी सम्मानपूर्वक स्थान दिया जाएगा। इस भवन के साथ सांसदों के बैठने के लिए एक बड़ा हॉल, उनके पढ़ने के लिए अच्छे पुस्तकालय , समितियों के लिए कई कमरे, भोजन कक्ष और बहुत सारी पार्किंग की व्यवस्था भी नए भवन में की जाएगी।
इस पूरे प्रोजेक्ट का निर्माण क्षेत्र 64,500 वर्ग मीटर होगा। यह वर्त्तमान संसद भवन से 17,000 वर्ग मीटर अधिक होगा। जहां तक वर्तमान संसद भवन के उपयोग की बात है तो इस भवन को भी यथावत रखा जाएगा। क्योंकि यह भवन भी हमारे बीते 75 वर्षों के इतिहास का एक जीता जागता साक्षी होगा। निश्चित रूप से आने वाले समय में यह संसद भवन भी इतिहास के जिज्ञासु विद्यार्थियों को भारत के समकालीन इतिहास के बारे में बहुत कुछ स्पष्ट करता रहेगा। इसलिए इसकी उपयोगिता को बनाए रखने के लिए यह निर्णय लिया गया है कि इसमें संसदीय आयोजन कराए जाते रहेंगे। हमारा वर्तमान संसद भवन 566 वर्ग मीटर में बना हुआ है, जिसके निर्माण पर 1921 में 83 लाख रुपये व्यय किए गए थे। इस संसद भवन का उद्घाटन उस समय भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन ने 18 जनवरी 1927 को किया था। उस समय इस संसद भवन का डिज़ाइन एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने बनाया था। यही कारण है कि आज भी संसद भवन के इर्द-गिर्द के क्षेत्र को लुटियंस जोन कहा जाता है। यद्यपि यहां पर यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि लुटियंस और उसके साथियों ने भारत की वर्तमान संसद का नक्शा कहीं अपने देश या अपने मस्तिष्क से तैयार नहीं किया था अपितु इसका नक्शा भी उन्होंने बटेश्वर स्थित गुर्जर प्रतिहार शासकों के मंदिरों को देखकर ही तैयार किया था।
अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में बनने जा रहे इस नए संसद भवन पर 971 करोड़ रूपया खर्च होगा। नये संसद भवन के निर्माण का ठेका टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को दिया गया है। उसने सितंबर 2020 में 861.90 करोड़ रुपये की बोली लगाकर ये ठेका प्राप्त किया था। नई संसद भवन के बारे में यह भी पता चला है कि नया संसद भवन सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इस प्रोजेक्ट का खाका गुजरात स्थित एक आर्किटेक्चर फ़र्म एचसीपी डिज़ाइन्स ने तैयार किया है। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत एक कॉमन केंद्रीय सचिवालय बनाया जाएगा। वहाँ मंत्रालयों के कार्यालय होंगे। राजधानी के इस क्षेत्र को और भी अधिक दिव्य ,भव्य और गरिमामय बनाने के दृष्टिकोण से राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक तीन किलोमीटर लंबे राजपथ को भी नया रूप दिया जाएगा। ऐसी संभावना भी है कि प्रधानमंत्री कार्यालय और उनके आवास को साउथ ब्लॉक के पास ले जाया जा सकता है।


वहीं उपराष्ट्रपति के आवास को नॉर्थ ब्लॉक के पास ले जाया जा सकता है। प्रोजेक्ट के तहत उपराष्ट्रपति का वर्त्तमान आवास उन भवनों में आता है जिन्हें गिराया जाना है। नई व्यवस्था के अंतर्गत नॉर्थ और साउथ ब्लॉक को संग्रहालयों में बदल दिए जाने की योजना है। प्रोजेक्ट के तहत केंद्रीय सचिवावय बनाने के लिए उद्योग भवन, कृषि भवन और शास्त्री भवन की इमारतों को तोड़ा जा सकता है।
अब से पूर्व दिल्ली ने अपने निर्माण के कई दौर देखे हैं। कई सम्राटों, सुल्तानों या बादशाहों ने इसे समय-समय पर अपने ढंग से सजाया और संवारा है। दिल्ली के लंबे इतिहास ने कई राजवंशों को उठते और पतन में जाते हुए देखा है । अपने इसी प्रकार के अनुभवों की श्रंखला में एक और कड़ी जोड़ते हुए अब दिल्ली अपने लिए फिर एक नया संसद भवन देखने जा रही है ।
हमें आशा करनी चाहिए कि नया संसद भवन पूर्व के सभी राजभवनों से कहीं अधिक दिव्य, भव्य और गरिमामय इतिहास को लिखने वाला होगा। हमें यह भी अपेक्षा करनी चाहिए कि मोदी सरकार इस नए संसद भवन में ऐसा कानून भी बनाएगी जो ताजमहल के सच्चे स्वरूप को स्थापित कराएगा और कुतुबमीनार या ऐसे सभी भवनों या ऐतिहासिक स्थलों के हिंदू स्वरूप को प्रकट करने का मार्ग प्रशस्त करेगा जिनसे हिंदू इतिहास पर पड़ी धूल को साफ करने में हमें सहायता मिलेगी । नए संसद भवन से ही हमें यह भी अपेक्षा है कि महाभारत कालीन इंद्रप्रस्थ से लेकर वर्तमान तक के दिल्ली के सारे इतिहास को दिल्ली के पुराने किले में चित्रों और भवनों के माध्यम से प्रकट करने की दिशा में भी सरकार कोई स्पष्ट कानून बना सकेगी। देखते हैं कि नया संसद भवन हमारी अपेक्षाओं पर कितना खरा उतर सकता है?

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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