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भारत का इतिहास अनेकों वीरांगनाओं के देशभक्ति पूर्ण कार्यों से भरा हुआ है। हमारी कई महान वीरांगनाओं ने अनेकों अवसरों पर युद्ध के मैदान में जाकर भी शत्रु के दांत खट्टे करने का ऐतिहासिक और वीरतापूर्ण कार्य कर इतिहास में अमर ख्याति प्राप्त की है। क्षत्राणी वीरांगनाओं ने अपने दूध की लाज रखने के लिए समय आने पर न केवल अपने जवान बेटों को ललकारा अपितु समय आने पर अपना बलिदान देने में भी देर नहीं की । वास्तव में ऐसी महान वीरांगनाओं के कारण ही आज हम स्वतंत्र देश के रूप में विश्व मानचित्र पर अपना स्थान बनाने में सफल हो पाए हैं । भारत की ऐसी ही महान वीरांगनाओं में एक रानी अब्बक्का का नाम सम्मिलित है। जिन्होंने क्रांतिकारी कार्यों के माध्यम से पुर्तगालियों के विरुद्ध अपना स्वतंत्रता संग्राम जारी रखा था।


रानी अब्बक्का का जन्म कर्नाटक के उल्लाल नामक नगर के चौटा राजघराने में हुआ था। चौटा वंश में मातृ वंश को प्रधानता दी जाती थी। जिसके अनुसार यह भी विधान था कि राज्यसिंहासन पुत्र को प्राप्त न होकर पुत्री को ही प्रदान किया जाता था। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए रानी अब्बक्का के मामा तिरुमलाराय ने उन्हें उल्लाल नगर की रानी घोषित किया। रानी अब्बक्का प्रारंभ से ही राजकाज में रुचि लेती रही थी । जिससे उन्हें एक अच्छा अनुभव राज्य कार्य के संचालन के संबंध में हो गया था । इतना ही नहीं उन्होंने युद्धविद्या का भी अच्छा प्रशिक्षण प्राप्त कर लिया था ।
रानी ने प्रारंभ से ही भारत के महान शासकों की उस परंपरा पर काम करना आरंभ किया। जिसके अनुसार प्रत्येक संप्रदाय ,वर्ग और पंथ के लोगों को बिना किसी भेदभाव के शासन में बैठे लोग न्याय प्रदान करते चले आए थे। यही कारण था कि रानी अब्बक्का ने भी सभी संप्रदायों के लोगों को समान अवसर प्रदान करते हुए न्याय देने का प्रशंसनीय कार्य किया। उनके शासन के उच्च पदों पर हिंदू-मुस्लिम आदि सभी संप्रदायों के लोगों को समान रूप से नियुक्तियां प्रदान की गई। रानी की न्यायप्रियता और प्रजावत्सलता के महान गुणों ने उन्हें जन-जन की प्यारी बना दिया था ।उनकी लोकप्रियता अपने चरम पर थी। लोग अपनी रानी के प्रत्येक आदेश को शिरोधार्य कर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते थे।
रानी की प्रशासनिक क्षमता भी बहुत ही उत्कृष्ट श्रेणी की थी ।उसने अपने राज्य में प्रजा के सुख के लिए राज्य को लोकहितकारी बनाने के हर संभव प्रयास किये। प्रजा के सुख दुख का ध्यान रखने के कारण ही रानी एक लोकप्रिय शासिका सिद्ध हुई।
रानी अपने समय में कितनी अधिक लोकप्रिय रही होंगी ? – इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके देहांत के सदियों पश्चात भी लोग उन्हें अभी तक अपने लोकगीतों के माध्यम से बहुत ही श्रद्धा के साथ स्मरण करते हैं । उनकी वीरता की कहानियों को लोग बड़े चाव से सुनते हैं और अपने गीतों के माध्यम से उनके प्रति अपना सम्मान भाव प्रकट करते हैं। ‘यक्षगान’ कर्नाटक की एक पारंपरिक नाट्य शैली है – जिसके माध्यम से लोग रानी अब्बक्का की वीरता की कहानी को अपने ढंग से प्रस्तुत करते हैं। ‘भूतकोला’ (एक स्थानीय पारंपरिक नृत्य शैली ) – में भी रानी अब्बक्का को अपनी प्रजा का ध्यान रखने वाली और न्यायप्रिय शासिका के रूप में प्रकट किया जाता है।
रानी ने अपने आप को भारत की प्राचीन युद्ध विद्या से इस प्रकार जोड़ लिया था कि वह अग्निबाण का प्रयोग करना भी जान गई थीं।कुछ इतिहासकारों का ऐसा भी मानना है कि भारत की ज्ञात परंपरा में अग्निबाण का प्रयोग करने वाली वह अंतिम शासिका थीं। अग्निबाण का प्रयोग करने के कारण रानी से उसके शत्रु भय खाते थे । जिससे रानी की निर्भीकता और निडरता की धाक सर्वत्र व्याप्त हो गई थी । यही कारण था कि लोग उन्हें अभया रानी के नाम से भी पुकारने लगे थे। उस समय जिन विदेशी शक्तियों ने भारत की स्वतंत्रता पर अपना शिकंजा कस लिया था उनमें से एक पुर्तगाली भी सम्मिलित थे। रानी के लिए उस समय स्पष्टतया पुर्तगाली ही सबसे बड़ी चुनौती बन चुके थे । यह पुर्तगाली शासक रानी की आंखों में खटकते थे। वह उन्हें बाहर निकाल कर राज्य करना चाहती थी। अतः रानी ने भारत की स्वाधीनता के लिए लड़ने का मन बनाया। वह विदेशी शत्रु शासकों के विरुद्ध युद्ध के मैदान में उतरकर उनका सामना करने की योजना पर काम करने लगी । विदेशी शासकों को भारत का रक्त चूसते देखकर रानी के हृदय में बहुत अधिक पीड़ा होती थी। उसी का परिणाम था कि वह पुर्तगाली शासकों के विरुद्ध युद्ध की योजना बनाने लगीं।


रानी अब्बक्का का विवाह मैंगलुरु की बंगा रियासत के राजा लक्षमप्पा अरसा के साथ हुआ था। स्वाभिमानी रानी अब्बक्का का अपने रूढ़िवादी पति के साथ अधिक देर तक संबंध स्थापित न रह सका । वह अपने पति से अलग होकर उल्लाल आ गईं। इससे उनके पति ने प्रतिशोध लेने के लिए रानी को नीचा दिखाने की योजना बनानी आरंभ की। उसे शीघ्र ही एक युक्ति सूझी कि क्यों न रानी के विरुद्ध पुर्तगालियों को सहायता दी जाए और उसने यही किया कि वह देशभक्त रानी के विरुद्ध पुर्तगालियों का सहायक हो गया । भारतवर्ष का यह बहुत बड़ा दुर्भाग्य रहा है कि यहां के अधिकांश योद्धाओं का साथ उनके अपनों ने ही सही समय पर नहीं दिया है। रानी के साथ भी यही हुआ कि जब उन्हें अपनों के सहारे की बहुत अधिक आवश्यकता थी तब उनका पति भी उनका विरोधी या शत्रु बनकर उनके विरोधियों के दल में खड़ा हुआ दिखाई दे रहा था। इसके उपरांत भी रानी ने साहस, समझदारी और वीरता का साथ नहीं छोड़ा । वह पूर्ण धैर्य और संयम के साथ अपनी योजना पर काम करती हुई आगे बढ़ती चली गई।
1525 ई0 में पुर्तगालियों ने दक्षिण कन्नड़ के तट पर धावा बोल दिया। उन्होंने मैंगलुरु के बंदरगाह को नष्ट कर दिया। इसके उपरांत भी पुर्तगाली उल्लाल पर कब्ज़ा नहीं कर पा रहे थे। रानी की देशभक्ति और वीरता के समक्ष पुर्तगालियों का साहस जवाब देने लगा। उन्हें कोई युक्ति नहीं सूझ रही थी जिसे अपनाकर वह रानी को अपने सामने झुका सकते । अब उनका एक ही प्रयास था कि जैसे भी हो रानी को इस शर्त पर सहमत कर लिया जाए कि वह उस गाड़ियों को कार देना स्वीकार कर ले। उधर स्वाभिमानी देशभक्त रानी थी कि जो उनकी किसी भी प्रकार की शर्त को मानने को तैयार नहीं थी। अंत में रानी ही अपनी हठ पर सफल रही और उसने पुर्तगालियों को परास्त करने में सफलता प्राप्त की।
यह घटना 1555 ईसवी की है।
1568 ई0 में पुर्तगालियों ने एक बार फिर उल्लाल पर आक्रमण कर रानी को अपने अधीन करने का प्रयास किया। रानी ने फिर पहले जैसी ही बहादुरी का परिचय देते हुए पुर्तगाली आक्रमणकारियों का बहुत ही वीरता के साथ सामना किया। रानी के अनेकों योद्धाओं ने मातृभूमि की सेवा करते – करते प्राणोत्सर्ग किया। यद्यपि पर्याप्त बलिदानों के उपरांत भी रानी इस बार अपनी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर पाई । ध्यान रहे कि इतिहास बलिदानों से बना करता है । बलिदान और बलिदानी इतिहास के गौरव होते हैं । इसलिए चाहे रानी पराजित हुई पर इतिहास की बाजी उसके हाथ में आई । निश्चित रूप से उसने भारत की वीरता और शौर्य के इतिहास में कई स्वर्णिम पृष्ठ जोड़ दिये । रानी को पराजित करने के पश्चात पुर्तगाली सेना रानी के दरबार में प्रवेश करने में भी सफल हो गई।
आपत्ति काल में किसी प्रकार की मर्यादा नहीं होती और अंधी देशभक्ति निश्चय ही योद्धाओं का सर्वनाश करने में सहायक होती है। अतः आपत्ति काल में अंधी देशभक्ति न दिखाते हुए अर्थात केवल मरने के लिए युद्ध न करने की बात ना करके उस समय पीछे हटने में भी कोई बुराई नहीं होती है और रानी ने इसी रणनीति पर काम किया ।वह पुर्तगाली आक्रमणकारियों के बारे में यह सूचना पाकर कि वह उसके महल में प्रवेश करने में सफल हो गए हैं, किसी प्रकार महल के पृष्ठभाग से निकल भागने में सफल हो गई। रानी महल से निकलकर एक मस्जिद में शरणार्थी के रूप में प्रवेश करने में सफल हुई । वहीं पर रानी ने कुछ अपने विश्वासपात्र साथियों को एकत्र किया और लगभग 200 सैनिकों की एक छोटी सी सेना बनाकर फिर पूर्ण वेग के साथ पुर्तगालियों पर धावा बोल दिया । रानी का यह आक्रमण इतना भयंकर था कि पुर्तगाली उसकी भयंकरता की कल्पना तक नहीं कर सकते थे । वह यह सोच चुके थे कि रानी अब सदा सदा के लिए महल छोड़कर चली गई है । उन्हें यह पता नहीं था कि रानी घायल सिंहनी की तरह उन पर जल्दी ही टूटने वाली है । अप्रत्याशित रूप से रानी ने जब पुर्तगालियों पर हमला बोला तो वह उस हमले का सही ढंग से प्रतिकार नहीं कर पाए और उनकी सेना का जनरल मारा गया। रानी ने युद्ध से भागते हुए अनेकों पुर्तगाली सैनिकों को बंदी बना लिया । जबकि कुछ पुर्तगाली सैनिक भागकर जान बचाने में भी सफल हो गए । रानी अब्बक्का की वीरता और देशभक्ति को देखकर पुर्तगालियों के सामने अब एक ही विकल्प था कि वह किले को छोड़कर भाग निकलें और उन्होंने ऐसा ही किया ।
पुर्तगाली भी रानी को हर हाल में पराजित करने की ठान चुके थे । वह जानते थे की रानी के पति सहित कई ‘जयचंद’ जिस प्रकार उनका पीछे से साथ दे रहे थे ,उनके बल पर वह एक दिन अवश्य ही रानी के विरुद्ध सफलता प्राप्त कर लेंगे। फलस्वरूप 1569 ई0 में जब पुर्तगालियों ने फिर रानी के किले मैंगलुरु पर आक्रमण किया तो उन्होंने न केवल इस किले को अपितु कर्नाटक के एक दूसरे नगर कुंदपुरा पर भी अपना अधिकार स्थापित कर लिया । रानी ने इस पराजय को मन मसोसकर स्वीकार तो कर लिया पर इसके पश्चात भी वह पुर्तगालियों के लिए एक चुनौती बनी रही और रानी निरंतर अपनी खोई हुई स्वतंत्रता को पाने के लिए प्रयासरत रही। उनके पति ने रानी को झुकाने के लिए पुर्तगालियों का साथ देने में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं छोड़ी । वह निरंतर रानी के स्वाभिमान के लिए एक खतरा बना रहा और पुर्तगालियों का साथ देकर रानी को उत्पीड़ित करने के हरसंभव प्रयास करता रहा। उसने पुर्तगालियों की सहायता की जिससे प्रोत्साहित होकर पुर्तगाली सेना उल्लाल पर फिर आक्रमण करने लगी। इसके उपरांत भी रानी ने साहस और धैर्य से काम लिया। वह इस नई चुनौती के सामने भी सीना तानकर खड़ी रही। इस नए तूफान का सामना करने के लिए रानी ने 1570 ई0 में पुर्तगालियों का विरोध कर रहे अहमदनगर के सुल्तान और कालीकट के राजा के साथ गठबंधन कर लिया। पुर्तगालियों का रानी के राज्य पर यह छठा आक्रमण था । इस बार का युद्ध रानी के जीवन का अंतिम युद्ध सिद्ध हुआ था ।
कालीकट के राजा के जनरल ने रानी की सहायता करने के लिए अपने आप को अपनी सेना सहित समर्पित कर दिया। उसने अब्बक्का की ओर से पुर्तगालियों के विरुद्ध जमकर संघर्ष किया। इस भयंकर और विनाशकारी युद्ध में जनरल ने मैंगलुरु में पुर्तगालियों का किला पूर्णतया नष्ट कर दिया। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि जब जनरल वहां से लौट रहा था तो वह पुर्तगालियों के हाथों मारा गया। ऐसे में रानी के लिए अब संघर्ष को और आगे चलाते रहना बड़ा कठिन होता जा रहा था। यह अलग बात है कि रानी ने अभी भी अपना साहस नहीं खोया था। वह यह प्रतिज्ञा कर चुकी थी कि
जीवन के अंतिम क्षणों तक वह विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध युद्ध करती रहेगी। उन्हें अपने प्राणों से भी अधिक अपनी मातृभूमि प्रिय थी। वह स्वतंत्रता की उपासिका थी और उसी के लिए संघर्ष करते रहकर जीवन होम करने के लिए प्रतिज्ञा कर चुकी थी। यद्यपि रानी को पुर्तगालियों ने गिरफ्तार करने में सफलता प्राप्त कर ली थी, परंतु रानी जेल के भीतर रहकर भी अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत रही। उन्होंने पुर्तगालियों के समक्ष झुकने से इनकार कर दिया। क्योंकि वह जानती थी कि उनको झुकने का अर्थ क्या होगा? यही वीरों की विशेषता होती है कि वह किसी एक लक्ष्य को लेकर जीवन जीते हैं और उस लक्ष्य को प्राप्त करने में यदि किसी भी कारण से वह असफल भी हो रहे हैं तो भी वह अपने प्राण त्याग सकते हैं परंतु अपने सम्मान का सौदा नहीं कर सकते।


यही कारण था कि रानी ने विदेशी पुर्तगालियों के विरुद्ध लड़ते-लड़ते ही जीवन की अंतिम सांस ली थी।
भारत सरकार ने इस महान और क्रांतिकारी रानी के महान कार्यों को नमन करते हुए 2009 में ‘रानी अब्बक्का’ नामक गश्ती पोत को भारतीय तटरक्षक बल में सम्मिलित किया तो राष्ट्रीय स्तर पर रानी का नाम पहली बार उभरकर सामने आया। यह बहुत ही दुख का विषय है कि रानी जैसी अनेकों क्रांतिकारी महिलाओं को देश के स्वर्णिम इतिहास में स्थान नहीं दिया गया । ये स्थानीय स्तर पर किन्हीं लोकगीतों का विषय बन कर रह गईं। इसका कारण केवल एक ही रहा कि भारत का इतिहास इन लोगों ने लिखा जो भारत के प्रति द्वेषपूर्ण भाव रखते थे और जिनकी दृष्टि में रानी और उन जैसे अनेकों क्रांतिकारी लोग अपराधी थे। यही कारण रहा कि इन अपराधियों को उपेक्षित किया गया । कृतघ्नता की हद उस समय हो गई जब स्वतंत्र भारत के इतिहासकारों ने भी इन अपराधियों को जेलों से ससम्मान मुक्त कर उनके सम्मान में 4 पंक्तियां लिखना भी उचित नहीं माना।
कुछ भी हो , इतिहासकार या कोई साहित्यकार चाहे अपना धर्म भूल जाए, पर यह एक प्रसन्नता का विषय है कि हमारे देश की जनता लोकगीतों के माध्यम से हमारे वीर वीरांगनाओं को जिस प्रकार श्रद्धांजलि देती रहती है, उससे वे अपनी अमर ख्याति की प्राप्त किए रहते हैं अर्थात जिस काम को इतिहासकार नहीं कर पाता उसे हमारे लोकगीत करके दिखा देते हैं। अतः अपने लोकगीतों को भी हमें बहुत अधिक महत्व देना चाहिए । रानी अब्बक्का चौटा की स्मृति में उनके नगर उल्लाल में आज भी उत्सव मनाया जाता है और इस ‘वीर रानी अब्बक्का उत्सव’ में प्रतिष्ठित महिलाओं को ‘वीर रानी अब्बक्का प्रशस्ति’ पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। भारत सरकार को इस प्रकार के उत्सवों को राष्ट्रीय स्तर पर मनाने की परंपरा का शुभारंभ करना चाहिए। जिससे रानी का सम्मान पूरे देश में हो सके और आने वाली पीढ़ियों को उनके आदर्श व त्यागमयी जीवन से प्रेरणा प्राप्त हो सके। निश्चय ही आज की पीढ़ी को रानी और उनके अन्य देश भक्त साथियों के जीवन से प्रेरणा प्राप्त करनी चाहिए । क्योंकि आज भी विदेशी शक्तियों का कुचक्र देश की संस्कृति और धर्म को नष्ट करने के लिए पहले से भी अधिक घातक स्तर पर चल रहा है। इसका सामना किसी ‘महान अकबर’ या किसी ‘दयालु औरंगजेब’ के बारे में पढ़कर नहीं किया जा सकता। उसका सामना करने के लिए रानी अब्बक्का जैसी वीरांगनाओं का इतिहास आज के युवा वर्ग को पढ़ाना समय की आवश्यकता है।

राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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