जैसे ही रजनीकांत ने राजनीति में आने की घोषणा की तो उड़ गई कई राजनीतिक दलों की नींद

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ललित गर्ग

तमिलनाडु का राजनीतिक इतिहास देखें तो राज्य की राजनीति में सिनेमा से आए नेताओं का ही दबदबा रहा है और राजनीतिक विरासत को देखते हुए रजनीकांत में व्यापक संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। रजनीकांत के राजनीति में आने की खबर से ही स्थापित दलों के नेताओं की नींद उड़ गयी है।

सुविख्यात फिल्मी कलाकार रजनीकांत ने हाल ही में अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने एवं 2021 में तमिलनाडू के विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा करके राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। उनकी इस राजनीतिक पारी की सबसे बड़ी विशेषता यह होगी कि उनकी पार्टी अध्यात्म की राजनीति करते हुए चौंकाने एवं चमत्कृत करने वाले परिणाम लायेगी। आध्यात्मिक राजनीति के उद्भव का नया इतिहास रचने को तत्पर होते हुए रजनीकांत को जनता के सहयोग का पूरा विश्वास है। राजनीति पर अध्यात्म के नियंत्रण की चर्चा अक्सर सुनी जाती रही है, लेकिन इसका प्रायोगिक स्वरूप एवं राजनीति में एक अभिनव क्रांति घटित होते हुए शीघ्र देखने को मिलेगी, यह एक सुकून भरा अहसास है।

सुपर स्टार रजनीकांत के राजनीति में आने की घोषणा ने जहां राजनीति के क्षेत्र में एक नयी सुबह का अहसास कराया वहीं राजनीति को एक नये दौर में ले जाने की संभावनाओं को भी उजागर किया है। पिछले 25 वर्षों से रजनीकांत के सक्रिय राजनीति में आने के कयास लगाये जाते रहे हैं, लेकिन अब रजनीकांत ने ‘अच्छा करो, अच्छा बोलो तो अच्छा ही होगा’ इस एक वाक्य से जाहिर कर दिया कि फिल्मी संवाद सिर्फ रूपहले बड़े पर्दे पर ही धमाल नहीं करते, बल्कि आम जनजीवन में भी वे नायकत्व को साकार होते हुए देखे जा सकते हैं। रजनीकांत की घोषणा राजनीति में एक नये अध्याय की शुरुआत कही जायेगी। तमिलनाडु भारत का ऐसा राज्य है, जहां की राजनीति में फिल्मी सितारों का हमेशा दबदबा रहता है। रजनीकांत की राजनीति में महत्वाकांक्षा के बारे में समय-समय पर उनके बयानों से पता लगता रहा है, पहली बार तब पता चला था जब 1996 में उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के दत्तक पुत्र वी.एन. सुधाकरन के विवाह समारोह में हुए अतिश्योक्तिपूर्ण बेहिसाब खर्च पर खुलकर कहा था कि सरकार में बहुत भ्रष्टाचार है और इस तरह की भ्रष्ट सरकार को सत्ता में नहीं होना चाहिए। राजनीति में भ्रष्टाचार एवं आर्थिक अपराधों का वे समय-समय पर विरोध करते रहे हैं।

तमिलनाडु की राजनीति में व्यापक बदलाव की छटपटाहट दिखाई दे रही है। द्रविड़ आंदोलन के महत्वपूर्ण स्तम्भ और पूर्व मुख्यमंत्री डीएमके प्रमुख एम. करुणानिधि और अन्नाद्रमुक प्रमुख जे. जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु की राजनीति एक ऐसे मुहाने पर आ खड़ी हुई जब राज्य में नए तरह की विचारधाराएं और नए तरह के संघर्ष जन्म ले रहे हैं। जहां तक द्रमुक अध्यक्ष एम.के. स्टालिन की क्षमता और ताकत का सवाल है तो 2016 के विधानसभा चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़े गए थे लेकिन उन्हें दूसरी बार हार का सामना करना पड़ा था। सरकार विरोधी लहर के बावजूद द्रमुख लगातार दूसरी बार पराजित हो गई। भारतीय जनता पार्टी दक्षिण भारत की राजनीति में किसी भी दल के लिए जमीन छोड़ना नहीं चाहती। भाजपा दक्षिण भारत में भी विस्तार चाहती है, क्या इस विस्तार के सारथि रजनीकांत या उनका राजनीतिक दल होगा? कर्नाटक में पहले ही भाजपा की सरकार है। न तो द्रमुक और न ही अन्नाद्रमुक की पहले जैसी स्थिति रही है। अब रजनीकांत की घोषणा ने द्रमुक और अन्नाद्रमुक के लिए नई चुनौती पैदा कर दी है। तमिल सिनेमा के बड़े चेहरे कमल हासन पहले ही राजनीति में पदार्पण कर चुके हैं। यद्यपि इन दोनों अभिनेताओं की राजनीतिक ताकत का परीक्षण होना शेष है लेकिन तमिलनाडु का राजनीतिक इतिहास देखें तो राज्य की राजनीति में सिनेमा से आए नेताओं का ही दबदबा रहा है और राजनीतिक विरासत को देखते हुए रजनीकांत में व्यापक संभावनाएं दिखाई दे रही हैं।

स्वयं का भी विकास और समाज का भी विकास, यही समष्टिवाद है और यही धर्म है और यही राजनीति भी होना चाहिए। लेकिन हमारी राजनीति का दुर्भाग्य रहा है कि वहां निजीवाद हावी होता चला गया। निजीवाद कभी धर्म नहीं रहा, राजनीति भी नहीं होना चाहिए। जीवन वही सार्थक है, जो समष्टिवाद से प्रेरित है। केवल अपना उपकार ही नहीं परोपकार भी करना है। अपने लिए नहीं दूसरों के लिए भी जीना है। यह हमारा दायित्व भी है और ऋण भी, जो हमें अपने समाज और अपनी मातृभूमि को चुकाना है और यही राजनीति की प्राथमिकता होनी चाहिए। संभवतः रजनीकांत राजनीति की इसी बड़ी जरूरत को पूरा कर एक नया इतिहास लिख दे।

रजनीकांत की राजनीति को लेकर एक बड़ा प्रश्न है कि तमिल अस्मिता के प्रति अति संवेदनशील इस राज्य में एक गैर तमिल सितारे को जनता किस रूप में लेती है। करुणानिधि और जयललिता जैसे दिग्गज के जाने के बाद राजनीतिक शून्य को रजनीकांत किस हद तक भर पाते हैं। सवाल यह भी है कि रजनीकांत की आध्यात्मिक राजनीति का भविष्य क्या है? कई राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों से सम्मानित 60 वर्षीय रजनीकांत का असली नाम शिवाजी राव गायकवाड़ है। अपनी खास संवाद अदायगी, चमत्कारी एक्टिंग स्टाइल और गजब के अभिनय ने उन्हें बुलंदी तक पहुंचा दिया। तमिलों ने उन्हें अपने सिर पर बैठाया। रजनीकांत ने तमिल युवती से शादी कर समय-समय पर तमिलनाडु के हितों के मुद्दे पर समर्थन देकर खुद को पूरी तरह तमिल जताने की पूरी कोशिश की। राष्ट्र की जगह व्यक्ति-पूजा को ही तमिल की राजनीति ने बढ़ाया दिया है। अब रजनीकांत अपनी राजनीति के अध्याय को क्या शक्ल देते हैं, यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना तय है कि राजनीति में कुछ नया, कुछ शुभ घटित होगा।

तमिलनाडु की राजनीति दशकों से अन्नाद्रमुक और द्रमुक के दो ध्रुवों में बंटी रही है। पर इसका यह अर्थ नहीं कि किसी तीसरे ध्रुव के लिए कोई संभावना नहीं थी। फिल्म अभिनेता विजयकांत ने तीसरी संभावना को उजागर किया था। रजनीकांत हमेशा विजयकांत से बड़े अभिनेता हैं और लोकप्रियता में तो उनका कोई सानी नहीं है। तमिलनाडु की राजनीति में सिनेमा के सितारों को मिली कामयाबी के इतिहास को देखते हुए रजनीकांत की नई भूमिका को लेकर लोगों में स्वाभाविक ही काफी उत्सुकता है। निश्चित ही राजनीति के परिप्रेक्ष्य में कुछ सकारात्मक घटित होगा।

रजनीकांत की ओर से अपनी पार्टी के नाम और नीतियों की घोषणा इसी माह के अंत तक करने की संभावना है। लेकिन उन्होंने समय की आवाज को सुना, देश के लिये कुछ करने का भाव उनमें जगा, उन्होंने सच को पाने की ठानी है, यह नये भारत को निर्मित करने की दिशा में एक शुभ संकेत है। तमिलनाडु में लम्बे दौर से द्रमुक के मूल सिद्धान्तों की राजनीति ही चली आ रही है, नास्तिकता की राजनीति। एम.जी. रामचन्द्रन हो या जयललिता-इन्होंने भले ही कुछ बदलाव के दृश्य उपस्थित किये हो। रजनीकांत द्वारा राजनीति में प्रवेश करने की घोषणा से द्रमुक के मूल सिद्धान्तों की जगह एक नयी सोच को आकार लेने का अवसर मिलेगा। इस राज्य की आने वाली राजनीति में यह किस प्रकार संभव होगा? यह तो अभी साफ-साफ कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन पहली नजर में रजनीकांत में यह योग्यता और क्षमता है कि उनकी लोकप्रियता पिछले अभिनेता से राजनेता बने ‘एम.जी.आर.’ व ‘जयललिता’ का रिकॉर्ड तोड़ सकती है क्योंकि उन्होंने अपनी अभिनय कला से तमिलनाडु के युवा वर्ग को बहुत ज्यादा प्रभावित किया है।

जयललिता के सपनों पर पानी
महानायक की छवि रखने वाले रजनीकांत के लिए राजनीति में आने की घोषणा को किसी फिल्मी ‘क्लाईमेक्स’ में नायक के आने के समान ही देखा जा रहा है। उनकी राजनीतिक सफलता पर अभी कोई निर्णायक घोषणा करना जल्दबाजी होगी, क्योंकि उनका राजनीतिक सफर निष्कंटक नहीं कहा जा सकता। उन्हें कड़ी टक्कर नहीं मिलेगी, यह मानना भी भूल हो सकती। क्योंकि उन्हें निश्चित रूप से एम. करुणानिधि की द्रमुक पार्टी कड़ी टक्कर दे सकती है। भले ही यह पार्टी फिलहाल परिवारवाद के घेरे में घिरी हुई है मगर इसकी मूल विचारधारा तमिलवासियों से दूर नहीं हो सकती जोकि सामाजिक अन्याय के खिलाफ लड़ाई की है। इतना निश्चित है कि अन्नाद्रमुक का अब कोई भविष्य नहीं है क्योंकि इसकी जड़ ही सूख चुकी है। इन प्रान्तीय राजनीति की चुनौतियों से संघर्ष के साथ-साथ रजनीकांत पर एक जिम्मेदारी है कि वे देश की राजनीति को भ्रष्टाचार एवं अपराधमुक्त करने की दिशा में कोई सार्थक पहल करते हुए राजनीति में अध्यात्म के अभ्युदय की नयी दिशाएं उद्घाटित करें।

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