अर्थव्यवस्था को लोकल से ग्लोबल बनाने की हो रही है तैयारी

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देश के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी ने एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम, “अमेरिका-भारत स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप फ़ोरम के तीसरे लीडरशिप समिट”, को सम्बोधित करते हुए अभी हाल ही में कहा है कि 130 करोड़ भारतीय अब देश को आत्म निर्भर बनाने के मिशन पर निकल पड़े हैं। भारत के आत्म निर्भर बनने की परिभाषा में पूरे विश्व का कल्याण निहित है। भारत ने यह बार बार दोहराया भी है कि हमारा अंतिम उद्देश्य पूरे विश्व में बंधुत्व की भावना का संचार करना एवं समस्त प्राणियों के सुखी होने से है। इसीलिए भारत अब लोकल (स्थानीय) को ग्लोबल (वैश्विक) रूप देना चाहता है, ताकि इस धरा पर रहने वाले प्रत्येक प्राणी को सुखी एवं प्रसन्न रखा जा सके।

भारतीय अर्थव्यवस्था को लोकल से ग्लोबल बनाने के उद्देश्य से बहुत ही तेज़ी से कई क्षेत्रों में स्थिति सुधारने के लिए कई प्रकार के आर्थिक निर्णय लिए जा रहे हैं। सबसे पहिले भारत में कारपोरेट कर में भारी कमी की गई है। निवेश के प्रोत्साहन के लिए यह एक बहुत क्रांतिकारी क़दम है और इस फ़ैसले के बाद विश्व व्यापार जगत के सभी उद्योगपति भारत के इस फ़ैसले को एक एतिहासिक क़दम मान रहे हैं। इसके अलावा भी भारत सरकार द्वारा देश में व्यापार को आसान बनाने के लिए कई फ़ैसले लिए हैं, जैसे सैकड़ों की संख्या ऐसे क़ानूनों को समाप्त कर दिया गया है जो विकास के कार्यों में बाधा उत्पन्न कर रहे थे। एक विविध संघीय जनतंत्र होने के बावजूद बीते 6 वर्षों में पूरे भारत के लिए सीमलेस, समिल्लित एवं पारदर्शी व्यवस्थाएँ तैयार करने पर बल दिया गया है। जहाँ पहिले भारत में अप्रत्यक्ष कर ढाँचे का एक बहुत बड़ा जाल फैला हुआ था, वहीं अब जीएसटी के रूप में केवल एक ही अप्रत्यक्ष कर प्रणाली पूरे देश के व्यापार संस्कृति का एक हिस्सा बन चुकी है। इसी तरह ही दिवालियापन की समस्या से निपटने के लिए इन्सॉल्वेन्सी एंड बैंकरपटसी कोड लागू किया गया है, जिससे बैकों को चूककर्ता बकायादारों से निपटने में आसानी हो गई है। कर प्रणाली से जुड़े क़ानूनों और ईक्विटी निवेश पर कर को वैश्विक कर प्रणाली के बराबर लाने के लिए देश में ज़रूरी सुधार निरंतर हो रहे हैं। कर प्रणाली में सुधार के अलावा देश में दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय समावेशी योजना को भी बहुत कम समय में लागू कर लिया गया है। क़रीब 40 करोड़ लोगों को बीते 5-6 सालों में बैंकों से पहली बार जोड़ा गया है। आज भारत के क़रीब क़रीब हर नागरिक के पास यूनिक आईडी है, मोबाइल फ़ोन है, बैंक अकाउंट है, जिसके कारण लक्षयित सेवाओं को प्रदान करने में तेज़ी आई है। धनराशि का रिसाव बंद हुआ है और पारदर्शिता कई गुना बड़ी है। नए भारत में अविनियमन, डीरेग्युलेशन और व्यापार में परेशनियाँ ख़त्म करने की मुहिम चलाई गई है। साथ ही, विमानन, बीमा एवं मीडिया जैसे कई क्षेत्र, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए खोल दिए गए हैं।

इसी प्रकार, आर्थिक सुधारों के लागू करने के कारण ही देश वैश्विक रैंकिंग में आगे बढ़ता जा रहा है। ये रैंकिंग अपने आप नहीं सुधरती है। भारत ने बिलकुल ज़मीनी स्तर पर जाकर व्यवस्थाओं में सुधार किया है। नियमों को आसान बनाया है। उदाहरण के तौर पर यह बताया जा सकता है कि देश में पहिले बिजली कनेक्शन लेने के लिए उद्योगों को कई महीनों का समय लग जाता था। परंतु, अब कुछ दिनों के भीतर बिजली कनेक्शन मिलने लगा है। इसी तरह कम्पनी के रेजिस्ट्रेशन के लिए पहिले कई हफ़्तों का समय लग जाता था। परंतु, अब कुछ ही घंटो में कम्पनी का रेजिस्ट्रेशन हो जाता है। ब्लूम्बर्ग की एक रिपोर्ट में भी भारत में आ रहे बदलाव की तस्वीर पेश की गई है। ब्लूम्बर्ग के नेशन ब्राण्ड 2018 सर्वे में भारत को निवेश के लिहाज़ से पूरे एशिया में पहिला नम्बर दिया गया है। 10 में से 7 संकेतकों – राजनैतिक स्थिरता, मुद्रा स्थिरता, उच्च गुणवत्ता के उत्पाद, भ्रष्टाचार विरोधी माहौल, उत्पादों की कम लागत, सामरिक स्थिति और आईपीआर के प्रति आदर की भावना – इन सभी में भारत नम्बर एक रहा है। बाक़ी संकेतकों में भी भारत की स्थिति काफ़ी ऊपर रही है।

कोरोना वायरस महामारी में ग्लोबल सप्लाई चैन एक ऐसा महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें भारत आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। इसके लिए देश में आधारभूत सुविधाओं का विकास किया जा रहा है। तटवर्तीय इलाक़ों में सड़क मार्गों का निर्माण किया जा रहा है। पूरे देश को मल्टी मोडल कनेक्टीविटी इंफ़्रास्ट्रक्चर से जोड़ने की एक बहुत बड़ी योजना तैयार की गई है। इस योजना के अंतर्गत समुद्रीय बंदरगाहों को रेल मार्ग से जोड़ा जाएगा। रेल मार्ग को सड़क मार्ग से काफ़ी बड़ी हद्द तक जोड़ा जा चुका है। इससे देश में यातायात की सुविधा में और अधिक सुधार देखने को मिलेगा। मल्टी मोडल कनेक्टीविटी इंफ़्रास्ट्रक्चर सिस्टम यदि देश में उपलब्ध होगा तो देशी एवं विदेशी निवेशक इन क्षेत्रों में अपना निवेश करने को आकर्षित होंगे। देश के बंदरगाहों में वस्तुओं के आयात एवं निर्यात के लिए टर्न-अराउंड टाइम कम किए जाने के भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। अतः ग्लोबल सप्लाई चैन का विकास भी एक नई गतिविधि के तौर पर देखने को मिलेगा। भारतीय उद्योग संघ की सालाना बैठक को सम्बोधित करते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर श्री शक्ति कांत दास ने भी कहा है कि देश में बदलती परिस्थितियां भारतीय अर्थव्यवस्था के पक्ष में हैं एवं आने वाले समय में भारत को ग्लोबल वैल्यू/सप्लाई चैन का हिस्सा बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

चीन की सप्लाई चैन से टक्कर लेने के लिए उस स्तर के व्यापारिक संस्थानों को खड़ा करना भी ज़रूरी है। अन्यथा, चीन के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता करना सम्भव नहीं होगा। इसके लिए भारत सरकार ने हाल ही में कुछ उद्योगों में विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना की घोषणा की है। मोबाइल उत्पादन इकाईयों को इस तरह का पैकेज प्रदान किया गया है। इस घोषणा से उत्साहित होकर ऐपल एवं नोकिया जैसी कम्पनियाँ भारत में अपनी इकाईयाँ स्थापित करने जा रही हैं। इसी प्रकार फ़ार्मा उद्योग एवं अन्य कई उद्योगों को भी यह पैकेज दिए जाने पर विचार चल रहा है। केंद्र सरकार की यह नीति निश्चित रूप से सफल होगी एवं इससे चीन पर कई देशों की निर्भरता कम होगी। अब समय आ गया है कि भारत को भी अब अन्य देशों के साथ साझेदारियों को निभाना पड़ेगा। अन्य देशों के साथ मिलकर हमारे अपने सप्लाई चैन विकसित करने होंगे एवं हमें अपनी स्वयं की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को तैयार करना होगा ताकि वे वैश्विक स्तर पर चीन से कड़ी टक्कर ले सकें। आत्मनिर्भर भारत एवं उत्पाद आधारित प्रोत्साहन योजना इस सम्बंध में केंद्र सरकार के बहुत अच्छे एवं महत्वपूर्ण निर्णय कहे जा सकते हैं।

देश को कोयला खनन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने हाल ही में एक नई खनन नीति की घोषणा की है। ऐसा कहा जा रहा है कि यह नई खनन नीति खेल परिवर्तक साबित होगी। इस नीति के अंतर्गत कोयला खनन क्षेत्र में सरकार का एकाधिकार ख़त्म कर कोयला क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए भी खोल दिया जाएगा एवं इसे व्यावसायिक दृष्टि से सक्षम बनाया जाएगा, इसके चलते कोयले की क़ीमतों में कमी देखने को मिलेगी। इसके लिए 50 नए ब्लाक तुरंत ही उपलब्ध कराए जाएँगे एवं इन ब्लाक पर तुरंत ही काम प्रारम्भ किया जाएगा। साथ ही, सरकार कोयले से गैस बनाये जाने के कार्य को भी प्रोत्साहन राशि प्रदान कर प्रोत्साहित करेगी। कोयले को खदानों से उत्पादन स्थल तक पहुँचने के लिए भी विशेष परिवहन बुनियादी ढाँचा विकसित किया जाएगा, जिसके लिए केंद्र सरकार 50,000 करोड़ रुपए की राशि ख़र्च करेगी। भारत में अभी कोयले का उत्पादन 70 करोड़ से 80 करोड़ टन प्रतिवर्ष के बीच रहता है। देश में प्रतिवर्ष 15 करोड़ से 20 करोड़ टन कोयला का आयात किया जाता है। जबकि भारत सरकार का यह लक्ष्य रहा है कि देश में कोयले के उत्पादन को 100 करोड़ टन तक पहुँचाया जाय ताकि कोयले के आयात की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं पड़े। कोयला मंत्रालय में हुए एक मंथन के अनुसार, वर्ष 2023-24 तक कोयले के आयात को ख़त्म कर देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसका सीधा सा आश्य है कि देश को कोयला उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है।

भारत सरकार ने ऊर्जा के क्षेत्र के भविष्य को सुरक्षित, सस्ता और व्यावहारिक बनाने के उद्देश्य से कई नीतिगत निर्णय लिए हैं। हाल ही के समय में भारत सरकार ने ऊर्जा भंडारण निदान, स्वच्छ ईंधन और विपणन क्षेत्र को उदार बनाने की दिशा में ज्यादा ध्यान दिया है। “भारत 2020 ऊर्जा नीति समीक्षा रिपोर्ट” के अनुसार, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना और शहरी गैस वितरण नेटवर्क के जरिये रसोई घरों तक पाइप से सीधे गैस पहुंचाने जैसे कदमों से भारत में 28 करोड़ परिवार इसके दायरे में आ गये हैं। भारत ऊर्जा के क्षेत्र में बदलाव की दिशा में काफी मेहनत से काम कर रहा है। केंद्र सरकार ने बिजली और खाना पकाने के स्वच्छ ईंधन तक पहुंच सुनिश्चित करने को अपनी शीर्ष प्राथमिकता में रखा हुआ है और उसके इस दिशा में लगातार प्रयासों से इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति दिख भी रही है।

भारत में देश की कुल आबादी के केवल 3 अथवा 4 प्रतिशत लोग ही शेयर बाज़ार में अपना निवेश करते हैं चूँकि इसमें टैक्स सम्बंधी बहुत सारी जटिलताएँ हैं एवं कई पेचीदगियाँ तो इस प्रकार की हैं कि जिसे निवेशक समझ ही नहीं पाता है अतः वह शेयर बाज़ार से दूरी बनाए रखने में ही अपनी समझदारी समझता है। परंतु अब स्टाम्प ड्यूटी सम्बंधी नियमों को आसान बनाए जाने से एवं वन नेशन वन स्टाम्प ड्यूटी के सिद्धांत को लागू किए जाने के बाद से उम्मीद की जा रही है कि देश में शेयर बाज़ार एवं म्यूचूअल फ़ंड संस्कृति को विकसित करने में मदद मिलेगी।

इसी प्रकार, देश के कृषि क्षेत्र से निर्यात बढ़ाने के उद्देश्य से प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी ने कृषि क्षेत्र के लिए आधारिक संरचना विकसित करने के लिए एक लाख करोड़ रुपए के फ़ंड को अगले दो वर्षों के दौरान जारी करने का निर्णय लिया है। शीघ्र ख़राब होने वाले कृषि उत्पादों के लिए कोल्ड स्टोरेज की चैन देश के कोने कोने तक फैलाई जा रही है। केंद्र सरकार ने इसके लिए वित्त की व्यवस्था कर दी है एवं सबंधित विभागों को वित्त प्रदान भी कर दिया है। कृषि उत्पादों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक शीघ्रता से पहुँचाने के लिए कुछ विशेष रेल गाड़ियाँ भी चलायी जा रही हैं। एपीएमसी क़ानून में संशोधन कर दिया गया है ताकि किसान अपनी उपज को जहाँ चाहें वहाँ आसानी से बेच सकें। साथ ही, कॉंट्रैक्ट फ़ार्मिंग पद्धति को भी स्वीकृति दे दी गयी है ताकि भविष्य में किसान किस प्रकार की उपज लेना चाहता है इसका निर्णय वह आसानी से आज ही कर सके। एक ज़िला एक उत्पाद की नीति भी घोषित की गई है, जैसे किसानों को एक एक जिले में विशेष प्रोडक्ट की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। जिस प्रकार सिक्किम का नाम आते ही ओरगेनिक कृषि का नाम ध्यान आ जाता है एवं केरल का नाम आते ही मसालों का नाम ध्यान आता है। उसी प्रकार देश के हर जिले के नाम पर कोई न कोई विशेष उत्पाद जुड़ जाना चाहिए, ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं। देश में किसानों को भी अब समझना पड़ेगा कि कृषि क्षेत्र से निर्यात बढ़ाने के लिए ओरगेनिक खेती की ओर मुड़ना ज़रूरी है एवं कृषि उत्पाद की गुणवत्ता एवं उत्पादकता में भारी सुधार करने की आवश्यकता है। अंतरराष्ट्रीय मानदंडो के अनुरूप ही कृषि उत्पादन करना होगा।

हमारे देश में भी मज़दूरों एवं कर्मचारियों की विभिन्न समस्याओं के निदान करने एवं उन्हें और अधिक सुविधाएँ उपलब्ध कराए जाने के उद्देश्य से हाल ही में सम्पन्न लोकसभा के मॉनसून सत्र में श्रम कानून से जुड़े तीन अहम विधेयक पास हो गए हैं। जिनमें सामाजिक सुरक्षा बिल 2020, आजीविका सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता बिल 2020 और औद्योगिक संबंध संहिता बिल 2020 शामिल हैं। इससे पहले तक देश में 44 श्रम कानून थे जो कि अब चार लेबर कोड में शामिल किए जा चुके हैं। श्रम कानूनों को लेबर कोड में शामिल करने का काम 2014 में शुरू हो गया था। उक्त ऐतिहासिक श्रम कानून, कामगारों के साथ साथ कारोबारियों के लिए भी मददगार साबित होगा। उक्त श्रम क़ानून कंपनियों को छूट देगा कि वे अधिकतर लोगों को अनुबंध के आधार पर नौकरी दे सकें साथ ही इस अनुबंध को कितनी भी बार और कितने भी समय के लिए बढ़ाया जा सकेगा, इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई है। इस प्रावधान को भी अब हटा दिया गया है, जिसके अंतर्गत किसी भी मौजूदा कर्मचारी को अनुबंध श्रमिक में तब्दील करने पर रोक थी। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि उक्त श्रम क़ानूनों के देश में लागू होने के बाद देश के आर्थिक विकास में यह मील का पत्थर साबित होंगे। क्योंकि, इन क़ानूनों के लागू होने के बाद देश में अधिक से अधिक श्रम प्रधान उद्योगों की स्थापना की जा सकेगी, आधारिक संरचना के निर्माण को प्रोत्साहन मिलेगा एवं रोज़गार के अधिक से अधिक अवसरों का निर्माण हो सकेगा। बल्कि, श्रम प्रधान उद्योगों की स्थापना के बाद पूरे विश्व की औद्योगिक इकाइयों को भी भारत में आमंत्रित किया जा सकेगा कि वे भारत में आकर वस्तुओं का उत्पादन करें एवं इन वस्तुओं का भारत से निर्यात करें।

अब ऐसे क्षेत्रों को भी विकसित किए जाने की आवश्यकता है जिनमें भारतीय एवं विदेशी निवेशक मिलकर कार्य करें। जैसे कि सौर ऊर्जा के क्षेत्र में किया जा रहा है। सरकारी नीतियों का भी इसमें बहुत बड़ा योगदान रहता है। केंद्र सरकार ने ही सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस प्रकार की नीतियाँ बनाई हैं कि विदेशी निवेशक भी इस क्षेत्र में निवेश करने की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसी प्रकार फ़ार्मा उद्योग, ऑटोमोबाइल उद्योग, आईटी उद्योग, आदि को भी सरकारी नीतियों के कारण ही देश में सफलता की कहानी के तौर पर बताया जा सकता है। अन्य क्षेत्रों को भी वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए इसी प्रकार की नीतियाँ बनाई जा रही हैं। आज भारत में ही विनिर्माण इकाईयों को स्थापित करने की आवश्यकता है न कि चीन आदि देशों से उत्पादों का आयात कर हम केवल व्यापारी के तौर पर कार्य करें। हमारे देश का बहुत बड़ा बाज़ार ही हमारे लिए सबसे बड़ी पूँजी है। केंद्र सरकार बड़ी तेज़ी से देश में कई क्षेत्रों में आर्थिक सुधारों को लागू कर रही है ताकि देश के व्यवसाय को स्थानीय से वैश्विक स्तर तक पहुँचाया जा सके। ।

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