उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार है जिसने विहिप द्वारा अयोध्या की 84 कोसी यात्रा को प्रतिबंधित कर दिया है और भाजपा को प्रदेश में नई ऊर्जा से भरने का अवसर उपलब्ध करा दिया है। कांग्रेस ने सपा और भाजपा को इस समय मुस्लिम और हिंदू मतों का अपने-अपने पक्ष में धु्रवीकरण करते देखकर इसे ऐसा राजनैतिक अखाड़ा माना है जिसमें दोनों ने ‘मैच फिक्सिंग’ कर लिया है। दोनों पार्टी 2014 को लक्ष्य कर ‘नूरा कुश्ती’ लड़ रही हैं।

प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सपाई हैं, इसलिए उनकी आस्था राममनोहर लोहिया के प्रति होनी स्वाभाविक है पर संभवत: उन्हें पता नही होगा कि राममनोहर लोहिया का समाजवाद मुख्यमंत्री के समाजवाद से सर्वथा विपरीत था। उनके समाजवाद में तुष्टिïकरण या पक्षपात नही था। वह पंथनिरपेक्ष थे और अखिलेश धर्मनिरपेक्ष हैं। लोहिया ने एक बार कहा था-’इतिहास के बड़े लोगों के बारे में चाहे वह बुद्घ हों, या अशोक, देश के चौथाई से अधिक लोग अनभिज्ञ हैं। दस में से एक को उनके काम के विषय में थोड़ी बहुत जानकारी होगी। देश के तीन सबसे बड़े पौराणिक नाम-राम, कृष्ण और शिव सबको मालूम है। उनके काम के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी सभी को होगी। वे हमारे रक्त और मांस में घुले हैं। उनके संवाद और उक्तियां उनके आचार और कर्म, भिन्न-2 मौकों पर किये उनके काम यह सब भारतीय लोगों की जानी पहचानी चीजें हैं। यह सचमुच एक भारतीय की आस्था और कसौटी है….हे भारत माता! हमें शिव का मस्तिष्क दो, कृष्ण का हृदय दो, राम का कर्म और वचन दो। हम में असीम मस्तिष्क रचो। मेरा बस चलता तो मैं हर हिंदू को सिखलाता कि रजिया, जायसी, शेरशाह, रहीम उनके पूर्वज हैं। साथ ही हर मुसलमान को सिखलाता  कि गजनी, गौरी और बाबर उनके पूर्वज नही, बल्कि हमलावर हैं।’यह कैसी बिडंबना है कि जिस लोहिया ने बाबर को विदेशी हमलावर माना, उसी लोहिया का चेला एक मुख्यमंत्री विदेशी हमलावर को प्रदेश के मुसलमानों का पुरखा बताकर अपना पुरखा मानने की जिद पर अड़ गया है और वह नही चाहता कि उसके कर्म और वचन में कहीं राम भी दिखाई दें।

नारदनीति में ऋषि नारद युधिष्ठर को उपदेश करते हुए कहते हैं-’हे राजन! क्या तुम दण्डयोग्य अपराधियों के प्रति यम के समान कठोर हो? क्या तुम प्रिय और अप्रिय जनों की परीक्षा करके उनके साथ उचित व्यवहार करते हो? क्या तुम वादी और प्रतिवादियों को किसी प्रकार के लोभ, मोह अथवा मान से (वोटों के लालच से) तो नही देखते हो? जब से अखिलेश उत्तर प्रदेश में आये हैं तब से प्रदेश में लगभग एक दर्जन दंगे भड़के हैं, क्या उन्होंने दंगों के दोषियों के विरूद्घ नारद का उपरोक्त उपदेश अपनाया है? बात भाजपा की अच्छाई की नही हो रही है। उसके नेता भी राजनीति से प्रेरित हैं। परंतु विहिप तो राजनीति नही कर रही थी। चौरासी कोसी यात्रा का धार्मिक आयोजन था, वह किन्हीं सशस्त्र आतंकियों का गिरोह नही था जो कहीं तोड़फोड़ करता या आग लगाता, और यदि ऐसा करता तो मुख्यमंत्री को उस पर कार्यवाही करने का अधिकार बनता, लेकिन नीयत केवल हिंदू विरोधी की थी इसलिए आजमखान के कहने से वह काम कर दिया जो नही करना चाहिए था।

महाभारत (अ. 145) में आया है कि प्रत्यक्ष देखकर विश्वसनीय पुरूषों से जानकारी लेकर अथवा युक्तियुक्त अनुमान करके शासक को सदा देश के शुभ अशुभ का हाल जानते रहना चाहिए। गुप्तचरों द्वारा और देश में हो रही हलचलों से शुभ और अशुभ स्थिति का आंकलन करके शासक को अशुभ शक्ति का तत्काल निवारण करना चाहिए और अपने लिए शुभ स्थिति लाने का प्रयत्न करना चाहिए। अब अखिलेश सरकार की कार्यशैली देखिए। महिला आईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल के विषय में विश्वसनीय पुरूषों से (एल.आई.यू. आदि से) जानकारी मिल रही थी कि वह निर्दोष हैं, परंतु फिर भी उन्हें निलंबित किया गया। अखिलेश की राजहठ सामने आयी और जनता ने इस राजहठ को अपने कैमरे में कैद कर लिया। अब विहिप के साथ टकराव लेकर अखिलेश सरकार फिर राजहठ का प्रदर्शन कर रही है। जनता फिर इसे कैद कर रही है। पहले दृश्य में ‘दुर्गा’ जनशक्ति के साथ थी तो इस बार ‘मर्यादा पुरूषोत्तम राम’ जनशक्ति के साथ हैं। 2014 के चुनाव में दुर्गा व श्री राम मतदाता की चेतना शक्ति के प्रतीक यदि बन गये तो अखिलेश सरकार के लिए मुंह दिखाने लायक जगह नही बचेगी। भाजपा की नेता सुषमा स्वराज ने कहा है कि समस्या दोनों पक्षों की बयानबाजी से पैदा हुई है। उनकी बात में सत्यांश है। यदि यह यात्रा शांति से संपन्न होने दी जाती तो अच्छा रहता तब इस यात्रा का राजनीतिकरण नही होता। परंतु विहिप की धार्मिक यात्रा को अखिलेश सरकार ने ‘हजयात्रा’ बनाना चाहा ताकि मुस्लिम वोटों का धु्रवीकरण कर उसका लाभ लिया जा सके।  इस प्रकार बयानबाजी से भी पूर्व अपने-2 पूर्वाग्रह और राजनीतिक स्वार्थ बीच में आ गये और प्रदेश का अच्छा माहौल बोझिल हो गया। मंदिर मस्जिद का फिर वही पुराना राग छेड़ दिया है जिसे इस देश की नपुंसक राजनीति पिछले 66 वर्ष से सुलझा नही पायी है।

सवा अरब की आबादी के इस विशाल देश में करोड़ों हाथ अभी रोजगार से हीन हैं, करोड़ों पेटों को रोटी के लाले हैं, करोड़ों की जनसंख्या को शिक्षा से वंचित रहना पड़ रहा है, करोड़ों को पीने का स्वच्छ जल नही मिल पा रहा है और करोड़ों को स्वास्थ्य सेवाएं समय से उपलब्ध नही हो पा  रही हैं। जबकि राजनीति लैपटॉप बांटकर समाज को अंधा बनाने में लगी है। राजनीति व्यापार नही बल्कि ठगों का बाजार हो गयी है।

‘राष्टï्रलक्ष्मी का आलोक पर्व-दीपावली निकट है और हम अयोध्या में देख रहे हैं कि घोर सन्नाटा पसरा पड़ा है। पक्षपात पूर्ण शासकीय नीतियों का परिणाम है ये घोर सन्नाटा। इस घोर सन्नाटे को दूर करने के लिए मुलायम सिंह यादव से कुछ संत मिले तो आजम खान को यह मिलना भी बुरा लगा। मानो सिवाय विवाद के और फंसाद के उन्हें और कुछ नही चाहिए। इसलिए मुलायम सिंह यादव से हुई मुलाकात से जो ‘क्षति’ पार्टी को हुई उसे यदुवंशी अखिलेश ने अपने पूर्वज कृष्ण की जयंती से ठीक पहले पूरी करने का प्रयास करते हुए चौरासी कोसी परिक्रमा को रोकने का निर्णय ले लिया।

मुफ्त की पीते थे मय और समझते थे कि हां,

रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।।

अपनी फाकामस्ती के एक दिन रंग लाने की प्रतीक्षा करने वाले और कर्ज की मय पीकर खुश होने वाले लोग अपनी फाकामस्ती के अभिशाप से क्या कभी निकल पाएंगे? समय शासन की नीतियों को पक्षपात पूर्ण बनाकर प्रस्तुत करने का नही है। ये पक्षपात पूर्ण नीतियां कहीं देश को अनीष्टï की ओर ले जा रही हैं। शासक की नीतियों में पारदर्शिता होनी चाहिए। अभी किश्तवाड़ में क्या हुआ और दिल्ली की सड़कों पर शबे-रात पर क्या हुआ? सबने देखा है, लेकिन सोचा ये जाता है कि ये उत्पाती और उन्मादी लोग एक दिन स्वयं ही शांत जो जाएंगे और देश में अमन चैन लौट आएगा। इस प्रकार की सोच से शांति एक मृगमरीचिका होती जा रही है। चौरासी कोसी परिक्रमा को रोककर देश में उपद्रव और उत्पात फेेलाने वाली शक्तियों को ही मजबूत किया गया है। उनके सपने अफरातफरी फेेलाने के होते हैं और उनके लिए अब अच्छा मौसम आ गया है। इस प्रदेश के एक युवा मुख्यमंत्री को हम फिर एक ‘हठीला नेता’ बनता देख रहे हैं। ऐसा नेता जिसका ना तो वास्तविक समाजवाद से कोई वास्ता है और ना ही पंथनिरपेक्षता से कोई वास्ता है।

प्रदेश सरकार की ओर से परिक्रमा को प्रतिबंधित करने के विषय में तर्क दिया गया है कि इसके पीछे राजनीति थी, और ऐसी राजनीति को सफल नही होने दिया जा सकता। बात सही है कि कहीं इस परिक्रमा के पीछे राजनीति थी लेकिन अब जब राजनीति को राजनीति से काटा जा  रहा है तो आधी राजनीति पूरी राजनीति हो गयी है। राजनीति की काट राजनीति में राजनीति नही होती है अपितु कूटनीति होती है। कूटनीतिक स्तर पर प्रदेश सरकार हार गयी है और राजनीति के बाजार में मतदाताओं के धैर्य को ललकार रही है। राम चेतना बनकर मतदाता में प्रवेश कर रहे हैं और मतदाता चेतनित होकर उठ रहा है। 2014 बताएगा कि ‘अंतिम यात्रा’ किसकी निकलेगी?

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