……जी पुराण तो अवैदिक ग्रंथों में आते हैं

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– एकमहानुभाव की टिप्पणी।
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उक्त प्रकार के कथनों में एक सुसंगत बदलाव लाने की आवश्यकता है। ये मत भूलो कि पुराणों में भी गणित सन्दर्भित विषय सम्यक होने से ग्राह्य हैं। पुराणों में भी जो वेद के मार्गदर्शन और विषय से मेल खाती बातें हैं वह सब स्वीकार हैं। जो वेद विरुद्ध है वह सर्वत्र त्याज्य है चाहे वह चारों ब्राह्मण, छहों दर्शन और चारों उपवेद ही क्यों न हों ( देखें सत्यार्थ प्रकाश तृतीय समुल्लास )। यह महर्षि जी का भी सिद्धान्त है। महर्षि जी ने स्वयं ऋग्वेद भाष्य भूमिका में *एकं दश शतम् चैन……. तथा वृन्द: खर्वो निखर्वश्च….. शंख: पद्मं च सागर: …….*  ये जो दो श्लोक दिए हैं वे ब्रह्माण्ड पुराण से दिए हैं न कि सूर्य सिद्धान्त या अन्य किसी ग्रन्थ के। ये बात अपने प्रसिद्द लेख *सृष्टि संवत्* में स्वामी *विद्यानन्द सरस्वती जी* ने स्पष्ट की है। इस लेख की बात को अनुभव करने के बाद ही मैंने सङ्कल्प पाठ में कल्प का नाम  *श्री श्वेत वाराह कल्पे* जोड़ना उचित समझा है।

कल्प ब्रह्मा का एक दिन होता है अर्थात *कल्प की ब्राह्मदिन संज्ञा होती है*, ये बात महर्षि जी को भी मान्य है। सातों वारअवैदिक हैं। राशियों के मेष वृषभादि नाम अवैदिक हैं। अधिकतम त्यौहार पूरी तौर से पौराणिक हैं। क्या हम, अवैदिक होने से वारों, लग्नादि राशियों को छोड़ने का प्रस्ताव कर सकेंगे? वेद में राशियों के लिए स्पष्ट स्थानापन्न शब्द *प्रधि* आया है। इस से स्पष्ट है कि राशियों या दैनिक लग्नों के नाम वास्तव में मधु माधवादि  नाम से होने चाहिए लेकिन औरों  की तो बात ही छोड़िये क्या आर्य समाज के लोग ही ऐसा स्वीकार करेंगे? ये सब कालक्रम के विकास हैं। मानव की प्रगतियाँ हैं।
 
सप्ताह में वारों के नाम हैं। पक्षों के नाम हैं। मासों के नाम हैं। ब्राह्मदिन सन्दर्भ से चौदह मनुवों के नाम हैं।अगर दिन मान्य है तो मास, वर्ष और ब्रह्मा की शत वर्षीय आयु भी मान्य होनी चाहिए। तीस दिवसीय मास के सन्दर्भ से ही कल्प संख्या भी ३० ही होती है ( देखें वर्तमान संवत् का वैदिक पञ्चाङ्ग  पृष्ठ १४)। उनके नाम अगर पुराणों ने दिए हैं तो उनको लेने में क्यों बुराई है। सच तो ये है कि बहुत विचार करने पर मैंने *इस सब में भारतीय कालगणना पद्धति की अति विशिष्ट  विशदता देखी है।*      
                                  *योग पुरुष बाबा राम देव जी* में मैंने एक खास बात ये देखी है कि ढोंग पाखण्डों पर कटाक्ष रखते हुए भी वे कभी पौराणिक  समाज को समग्रता के साथ जोड़कर किसी ढोंग पाखण्ड को सम्बन्धित करते हुए  कोई  बात नहीं करते और उसका  एक अप्रतिम परिणाम ये देखने में आया है कि कुछ नकारात्मक छिद्रान्वेषियों को छोड़कर उनके चाहने वाले जैसे आर्य समाज में हैं ठीक उसी तरह से पौराणिकों में भी हैं। आज जितने पौराणिक साधू सन्त उनके साथ हैं वह अपने आप में  एक देखने लायक बात है।
   
श्री विष्णु पुराण २/८/७० *’मासः पक्षद्वयेनोक्तो द्वौ मासौ चार्कजावृतुः, ऋतू त्रयं चाप्ययनं द्वे अयने वर्ष संज्ञिते।’* यहाँ ‘च अर्क+ज+ऋतुः’ पर ख़ास ध्यान देने की आवश्यकता है। दो सौर मास की एक ऋतु और तीन ऋतु का एक अयन तथा दो अयन ही (मिलाकर) १ वर्ष कहे जाते हैं । अथर्ववेद के सप्तम काण्ड सूक्त ८१ और मन्त्र संख्या 1 में  *पूर्वापरं चरतौ माययैतौ शिशू क्रीडंन्तौ परियातोsर्णवम्। विश्वान्यो भुवना विचष्ट ऋतूंरन्यो विदधज्जायसे नवः।।* यहाँ ऋतुओं को धारण करते हुए चद्र्मा को नया नया होना कहा गया है। क्या श्री विष्णु का कथन  पौराणिक कह देने से त्याज्य हो जाएगा?

*शरद वसन्तयोर्मध्ये विषुवं तू विभाव्यते। तुलामेषगते भानौ समरात्रिदिनं  तत्।  (अध्याय 8, अंश 2 )* – मैंने अपने विभिन्न लेखनों में अनेकशः पौराणिक उद्धरण रखे हैं। अब  इस कथन में ही देखिये। व्यास कह रहे हैं कि शरद और वसन्त  ऋतु के मध्य में विषुव होता है और उस दिन सूर्य मेष या तुला राशि में प्रविष्ट होता है। *विश्वेतेष्वथ भुक्तेषु ततो वैश्ववतीं गतिम्। प्रयाति सविता कुर्वन्नहोरात्रं ततः समम्।।*  उस दिन या तो मेष संक्रान्ति या फिर तुलाराशि की संक्रान्ति  का दिन होगा और उस दिन दिन और रात्रि का मान बराबर होगा। आप ध्यान दीजिये कितनी सरल और सरस संस्कृत में ये बात कही गयी है। श्री विष्णु पुराण के इसी अंश के *अगले श्लोकों में सौर और चान्द्र चैत्र, वैसाख, आश्विन और कार्तिक* के निर्धारण का मार्गदर्शन है। पञ्चाङ्गों में चल रही अशुद्धियों के लिए उनका ये कथन स्वयं पौराणिक भाइयों को दर्पण दिखाने वाली हैं।

👉 *एक अन्य विशेष बात -*

वेद के ऋतुबद्धता के सिद्धान्त  के सापेक्ष उक्त निर्धारण के अनुसार ही महर्षि देव दयानन्द  सरस्वती जी की जन्म तिथि २० सितम्बर १८२५  का दिन प्रचलित पञ्चाङ्गों की 👉 *भाद्र शुक्ल नौमी का न होकर आश्विन शुक्ल नौमी का होता है।* 👈  सिद्धान्त  ये है कि  २१ /२२ सितम्बर को तुला संक्रान्ति घटित होने के बाद का जो भी शुक्ल पक्ष होगा वह सदैव कार्तिक शुक्ल पक्ष होगा अर्थात इन तिथियों में अगर शुक्ल वर्तमान कर रहा है तो वह सदैव आश्विन शुक्ल पक्ष ही होगा। यदि उसको भाद्र कहा जायेगा तो शरद संक्रान्ति अर्थात २१/२२ सितम्बर की संक्रान्ति के बाद *बुधवार, १२ अक्टूबर १८२५* से शुरू होने वाला शुक्ल पक्ष आपको आश्विन शुक्ल पक्ष कहना पडेगा जो कि  गलत होगा। सिद्धान्ततया वह तो कार्तिक शुक्ल पक्ष होगा।

*आचार्य दार्शनेय लोकेश*

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