मनुस्मृति संसार का सबसे श्रेष्ठ ज्ञान है जिसका सबको अध्ययन करना चाहिए

IMG-20200621-WA0002

ओ३म्

=====x=====x=====
सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा से चार वेदों का आविर्भाव हुआ था। वेद ज्ञान व सत्य विद्याओं को कहते हैं। चार वेदों में ज्ञान, कर्म और उपासना सहित विज्ञान विषयों का वर्णन है। वेदों के प्रमुख विद्वान 6 दर्शनकार, 11 व अधिक उपनिषदकार, महर्षि पाणिनी, महर्षि यास्क एवं ऋषि दयानन्द जी हुए हैं। महर्षि बाल्मीकि एवं महर्षि वेद व्यास भी वैदिक विद्वानों व ऋषियों में सम्मिलित हैं। उन्होंने शास्त्रीय ग्रन्थ तो नहीं परन्तु राम एवं महाभारत का इतिहास लिखा है। यह सभी ऋषि व विद्वान वेदों को ईश्वरीय ज्ञान मानते थे। यह परम्परा सृष्टि के आरम्भ से आज तक चली आई है। महर्षि दयानन्द ने नियम दिया है कि वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है। वेद का पढ़ाना व पढ़ाना तथा सुनना व सुनाना सभी आर्यों अर्थात् अच्छा आचरण करने वाले सभी सज्जन मनुष्यों का परम धर्म है। आज भी वेदों की शिक्षा का पालन ही मनुष्य का धर्म है। मत-मतान्तरों व धर्म में अन्तर होता है। मत-मतान्तर धर्म कदापि नहीं हो सकते। धर्म की परिभाषा है कि जिन श्रेष्ठ गुणों को मनुष्य धारण कर सकता है व मनुष्य को जिन गुणों को धारण करना चाहिये, उन गुण, कर्म व स्वभावों को मनुष्य का धर्म कहा जाता है। मनुष्य जिन गुण, कर्म व स्वभावों आदि को धारण कर सकता है, उन सबका उल्लेख सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने वेदों में कर दिया था। मत-मतान्तरों में जो सत्य पाया जाता है वह वेदों से ही लिया गया है अथवा वेद से ही उन ग्रन्थों में पहुंचा है। सृष्टि के आरम्भ में जब कुछ राज्य स्थापित करने व राज्य की ओर से धर्म व्यवस्था व आचरण के विधान बनाने की आवश्यकता हुई तब सृष्टि के आरम्भ में प्रथम महर्षि मनु ने वेदों की शिक्षाओं व सिद्धान्तों के आधार पर वेदानुकूल नियमो का संग्रह किया जिसे ‘मनुस्मृति’ नाम दिया गया। मनुस्मृति वेद सम्मत मानव जीवन के लिए आवश्यक सभी कर्तव्यों व अकर्तव्यों के दण्डों की शिक्षाओं व विधानों से युक्त थी व अब भी है। इसमें ऐसा कोई विधान व सिद्धान्त नहीं था जो अतार्किक व भेदभावपूर्ण हो। सृष्टि को आरम्भ हुए 1.96 अरब वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। तब से मनुस्मृति ही वेद के बाद सभी विद्वानों व मनुष्यों के लिये स्वाध्याय एवं अध्ययन का प्रमुख ग्रन्थ रहा है। महाभारत काल तक मनुस्मृति सबको मान्य थी। इसका कभी किसी ने विरोध किया हो, इसका रामायण या महाभारत आदि किसी ग्रन्थ में उल्लेख नहीं मिलता।

महाभारत से पहले ही किन्हीं कारणों से सामाजिक परम्पराओं में कुछ विकृतियां उत्पन्न होनी आरम्भ हो गयी थीं। अग्निहोत्र यज्ञ जो पूर्ण अहिंसक कृत्य होता है, उसमें भी वाममार्गी धार्मिक लोगों ने पशु हिंसा के विधान जोड़ दिये थे। इसके लिये उन्होंने वेद मन्त्रों के अर्थ के अनर्थ किये जिसका प्रकाशन महर्षि दयानन्द व उनके अनुयायियों ने अनेक ग्रन्थ लिखकर किया। महाभारत के बाद वैदिक धर्म की एक शाखा के रूप में वाममार्ग की उत्पत्ति हुई। इन लोगों ने रामायण, महाभारत, मनुस्मृति सहित अनेक ग्रन्थों में अपनी-अपनी मान्यताओं के वेदविरुद्ध व पक्षपातपूर्ण प्रक्षेप किये। कुछ पुराण आदि ग्रन्थ लिखे गये जिनमें उन ग्रन्थों के लेखकों के वास्तविक नाम न देकर प्रसिद्ध ऋषि वेदव्यास जी के नाम से प्रचारित किया गया। इसका उल्लेख महर्षि दयानन्द जी ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में राजा भोज के समय के इतिहास विषयक ‘संजीवनी’ नामक ग्रन्थ से प्रमाण प्रस्तुत कर किया है। इसके अनुसार महर्षि वेदव्यास जी ने 4500 श्लोकों का भारत ग्रन्थ बनाया था। व्यास जी के शिष्यों ने इसे दस सहस्र श्लोकों तक विस्तृत किया। यही ग्रन्थ राजा भोज के पिता के समय प्रक्षेपों की वृद्धि से बीस हजार श्लोकों का दोगुना हो गया और राजा भोज के समय में निरन्तर प्रक्षेप होने के कारण पच्चीस हजार श्लोकों का हो गया था। राजा भोज ने अपने समय में प्रक्षेप करने वाले लोगों के हस्त आदि इन्द्रिय कटवा दिये थे और आज्ञा प्रसारित की थी जिसको कोई ग्रन्थ बनाना है वह अपने नाम से बनायें, पूर्व ग्रन्थों में प्रक्षेप न करें। जिन ग्रन्थों में वेद विरोधियों ने प्रक्षेप किये हैं उन्हीं के कारण समाज में अनेक विकृतियां व भेदभाव उत्पन्न हुए हैं। अधिकारी विद्वान यह भी बताते हैं कि प्रक्षेप एक ही व्यक्ति ने एक ही समय में नहीं किये अपितु यह क्रम अनेक वर्षों तक अनेक लोगों द्वारा किया जाता रहा।

मध्यकाल में वेदों के सत्यार्थ सुलभ न होने के कारण मनुस्मृति आदि ग्रन्थों की विकृतियां समाज को प्रभावित करने लगीं। इन विकृतियों के कारण स्त्रियों व जन्मना शूद्रों को वेदाध्ययन ही नहीं अपितु वेदों के श्रवण तक से वंचित कर दिया गया। इसके लिये तत्कालीन लोगों ने वेदों के नाम से मनघड़न्त वाक्य घड़ लिये जिसमें से एक था ‘स्त्री शूद्रो नाधीयताम्’ अर्थात् स्त्री और शूद्रों को वेदों का अध्ययन करने का अधिकार नहीं है। स्वामी शंकराचार्य जी तक इन विचारों से प्रभावित रहे और उन्होंने नारी तक के लिये असम्मानजनक शब्द कहे हैं।

मध्यकाल व उसके बाद जितने भी विद्वान हुए उनमें से किसी ने यह प्रयास नहीं किया कि वह वेदों से वेद विरुद्ध मान्यताओं की पुष्टि करने का प्रयत्न करते और इन वेदविरुद्ध मान्यताओं के समर्थकों को शास्त्रार्थ की चुनौती देते। महर्षि दयानन्द (1825-1883) के समय में यह विकृतियां अपने शीर्ष व चरम पर थी। प्राचीन काल में वैदिक वर्ण व्यवस्था मनुष्य के गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित थी परन्तु मध्यकाल में इसे जन्मना जातिवाद का रूप दे दिया गया और चार वर्णों के स्थान पर मनुष्यों की सहस्रों उपजातियां बना दी गईं जिससे सभी जातियों में परस्पर अनेक प्रकार के भेदभाव उत्पन्न हुए। कुछ जातियों को साक्षर होने का अधिकार भी नहीं था। धीरे धीरे पूरे देश से गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो गई। इसमें मुस्लिम व अंग्रेजों का कुशासन मुख्य था। अतः उस काल में देशवासियों के सम्मुख अध्ययन अध्यापन एवं परस्पर समानता के व्यवहार करने में अनेक प्रकार की कठिनाईयां थी। मुस्लिम व अंग्रेजों के राज में हिन्दू समाज में अनेक प्रकार की सामाजिक विकृतियां उत्पन्न हुईं जिनमें जन्मना-जातिवाद, बाल-विवाह, विधवा विवाह का निषेध, घूंघट या पर्दा प्रथा, दलित बन्धुओं द्वारा मैला ढोने की प्रथा, बलपूर्वक धर्मान्तरण, आपस में भेदभाव व छुआछूत आदि विकृतियां प्रमुख थी। डा. भीमराव अम्बेडकर जी एक प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। उनके अध्ययन में अनेक प्रकार के अवरोध उपस्थित हुए। ऐसी विकट स्थिति में भी उन्होंने अपने प्रारब्ध, दृढ़ इच्छा व संकल्प शक्ति तथा संघर्षमय जीवन से उच्च शिक्षित होकर देश व समाज की प्रशंसनीय सेवा की। डा. अम्बेडकर जी का विषय धर्मशास्त्र का अध्ययन करना व कराना नहीं था। अतः इस विषय में उनकी राय का सीमित महत्व है परन्तु अधिकारिक राय तो निष्पक्ष धर्म-मर्मज्ञों की ही मान्य होती है।

धर्म पर कोई प्रतिक्रिया या व्यवस्था देने का अधिकार वेद एवं वैदिक साहित्य के शीर्ष विद्वानों को ही होता है। मध्यकाल में यह स्थिति वैदिक काल के समान न थी अपितु इस व्यवस्था में अनेक विकृतियां उत्पन्न हों गई थी। अतः देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कुछ प्रतिष्ठित लोगों ने धार्मिक एवं सामाजिक विकृतियों के कारणों का समुचित अध्ययन किये बिना ही अपने अल्प एवं विपरीत ज्ञान से पूरी मनुस्मृति और महाराज मनु का विरोध कर डाला। कुछ ने तो मनुस्मृति को जलाया भी जिसे उनका अज्ञानता रूपी अपराध कहा जा सकता है। ऐसा किया जाना अविवेकपूर्ण कार्य था। होना यह चाहिये था कि मनुस्मृति का गहन अध्ययन किया जाता और निश्चित किया जाता कि मनुस्मृति में जो अनुचित व अमानवीय बातें हैं, क्या वह महाराज मनु द्वारा कही व लिखी गई हैं अथवा मध्यकाल में कुछ अल्पज्ञानी व स्वार्थी लोगों ने अपने हितों के कारण ऐसा किया है। महर्षि दयानन्द ने अपने अध्ययन में सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करने का नियम बनाया जिसका उन्होंने व आर्यसमाज के विद्वानों ने पालन किया है। उन्होंने न केवल मनुस्मृति सहित सभी शास्त्रीय ग्रन्थों की परीक्षा की और वेदविरुद्ध बातों को अस्वीकार करते हुए उनका व्यवहार करना त्याग किया। मनुस्मृति का अनुसंधान कर शुद्ध मनुस्मृति नाम से एक शोधपूर्ण संस्करण भी प्रकाशित किया गया जो आज सर्वसुलभ है। इसे हमारे सभी दलित जाति के बन्धुओं को पूर्वाग्रह से मुक्त होकर निष्पक्ष भाव से पढ़ना चाहिये और लाभ उठाना चाहिये।

ऋषि दयानन्द ने सभी सनातनी पौराणिक व इतर विद्वानों को भी वेदों की सत्य मान्यताओं पर विचार कर सत्यासत्य का निर्णय करने के लिये शास्त्रार्थ की चुनौती दी। उनके समय में पौराणिक जगत में उनके समकक्ष कोई विद्वान नहीं था। ऋषि दयानन्द ने पाषाण मूर्तिपूजा, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष, सभी ढ़ोग, पाखण्ड तथा अन्धविश्वासों को चुनौती दी थी। कोई उनके सम्मुख आकर अपने पक्ष में वेदों का प्रमाण व युक्तियां नहीं दे सका। स्वामी दयानन्द ने एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य यह भी किया कि यजुर्वेद से समाज के सभी मनुष्यों को वेदों के अध्ययन का अधिकार देने वाला वेदमन्त्र प्रस्तुत किया। इससे सदियों से चली आ रही स्त्री व शूद्रों को वेद का अध्ययन करने का अधिकार नहीं है, इस मान्यता का खण्डन एवं प्रतिवाद हुआ। इसके बाद यह विवाद सदा सदा के लिए समाप्त हो गया। आज तक इस प्रमाण की काट किसी सनातनी पौराणिक विद्वान ने प्रस्तुत नहीं की। इस प्रकार हम देखते हैं कि किस प्रकार सदियों तक हमारे देश के कुछ वेदविमुख पाखण्डी लोगों ने देश की जनता के साथ अन्याय किया। यदि ऋषि दयानन्द जी न आते तो आज हमारे समाज की कितनी दुर्दशा होती, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

वेद पढ़ने का अधिकार सब मनुष्यों को समान रूप से है, इससे सम्बन्धित प्रमाण यजुर्वेद के 26 वें अध्याय का 2सरा मन्त्र है। मन्त्र निम्न हैः

‘यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः।
ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय।।’

इस मन्त्र में परमेश्वर ने कहा है कि (यथा) जैसे मैं (जनेभ्यः) सब मनुष्यों के लिये (इमाम्) इस (कल्याणीम्) कल्याण करने वाली अर्थात् संसारिक सुख और मुक्ति के सुख देनेहारी (वाचम्) ऋग्वेदादि चारों वेदों का वाणी का (आ वदानि) उपदेश करता हूं वैसे तुम मनुष्य भी करो।

महर्षि दयानन्द ने इस वेदमंत्र व इसके अर्थ पर होने वाली शंकाओं का निराकार भी सत्यार्थप्रकाश के तृतीय समुल्लास में किया है। वह लिखते हैं कि यहां कोई ऐसा प्रश्न करे कि ‘जन’ शब्द से द्विजों का ग्रहण करना चाहिये क्योंकि स्मृत्यादि ग्रन्थों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही के वेदों के पढ़ने का अधिकार लिखा है, स्त्री और शूद्रादि वर्णों का अधिकार नहीं है। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए ऋषि दयानन्द लिखते हैं कि देखो (ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय) परमेश्वर स्वयं कहता है कि हम ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, (अय्र्याय) वैश्य, (शूद्राय) शूद्र, और (स्वाय) अपने भृत्य वा स्त्रियों आदि (अरणाय) और अतिशूद्रादि के लिये भी वेदों का प्रकाश किया है अर्थात् सब मनुष्य वेदों को पढ़ पढ़ा और सुन सुनाकर विज्ञान को बढ़ा के अच्छी बातों का ग्रहण और बुरी बातों का त्याग करके दुःखों से छूट कर आनन्द को प्राप्त हों। कहिये, अब तुम्हारी बात मानें वा परमेश्वर की? परमेश्वर की बात अवश्य माननीय है। इतने पर भी जो कोई इस को न मानेगा वह नास्तिक कहावेगा क्योंकि ‘नास्तिको वेदनिन्दकः’ वेदों का निन्दक और न मानने वाला नास्तिक कहाता है। क्या परमेश्वर शूद्रों का भला करना नहीं चाहता? क्या ईश्वर पक्षपाती है कि वेदों के पढ़ने सुनने का शूद्रों के लिये निषेध और द्विजों के लिये विधान करे? जो परमेश्वर का अभिप्राय शूद्रादि के पढ़ाने सुनाने का न होता तो इनके शरीर मे वाक् और श्रोत्र इन्द्रिय क्यों रचता? जैसे परमात्मा ने पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, चन्द्र, सूर्य और अन्नादि पदार्थ सब के लिये बनाये हैं वैसे ही वेद भी सबके लिये प्रकाशित किये हैं। और जहां-जहां निषेध किया है उस का यह अभिप्राय यह है कि जिन बालक व मनुष्य को पढ़ने पढ़ाने से कुछ भी न आवे वह निर्बुद्धि और मूर्ख होने से शूद्र कहाता है। उस का पढ़ना पढ़ाना व्यर्थ है। और जो स्त्रियों के पढ़ने का निषेध करते हो वह तुम्हारी मूर्खता, स्वार्थता और निर्बुद्धिता का प्रभाव है। इसके बाद ऋषि दयानन्द अथर्ववेद के वचन ‘ब्रह्मचय्र्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्’ का उल्लेख कर सभी सनातनी पौराणिकों की बोलती बन्द कर दी। इस वेद वचन में स्त्रियों के वेदाध्ययन का प्रत्यक्ष विधान है। यह भी बता दें कि ऋषि दयानन्द ने उपर्युक्त प्रतिवाद प्रचलित पौराणिक वेदाध्ययन में अनधिकार विषयक मान्यताओं का किया है। इसके बाद स्त्री व शूद्रों सहित समाज के सभी व्यक्तियों को वेदाध्ययन का अधिकार प्राप्त हो गया। अब कोई मनुष्य वा स्त्री पुरुष वेदाध्ययन के अधिकार से वंचित नहीं है। जिस किसी को भी वेद पढ़ना व पढ़ाना हो, दलित समाज सहित कोई भी व्यक्ति आर्यसमाज से जुड़कर इसके गुरुकुलों में रहकर वेदाध्ययन कर वेदों का प्रचार व वेदोपदेश कर सकता है। ऋषि दयानन्द के इन्हीं विचारों से सदियों व वंचित स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन करने का अधिकार प्राप्त हुआ व वेदाध्ययन के बन्द दरवाजे सबके लिए सदा के लिये खुल गये। इसके लिए ऋषि दयानन्द को हमारा नमन है।

मनुस्मृति का अध्ययन करने पर ग्रन्थ में मनुप्रोक्त ऐसा कोई वचन प्राप्त नहीं होता जहां जन्मना जातिवाद व जन्म से कोई ब्राह्मण है और कोई शूद्र है, इसका वर्णन हो। इसके विपरीत जन्म से ब्राह्मण आदि वर्णों के सभी बच्चों को शूद्र अर्थात् विद्याहीन बताया गया है। अतः समाज में महाभारतकाल के बाद व मध्यकाल में जो पतन हुआ उसका कारण महाराज मनु व मनुस्मृति नहीं अपितु मध्यकालीन आचार्यों द्वारा मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में किये गये प्रक्षेप थे। इसके लिये महाराज मनु को कदापि उत्तरदायी नहीं कहा जा सकता। जो ऐसा सोचते हैं वह उनके साथ अन्याय करते हैं। उन्हें यह पता नहीं होता कि ऐसा करने से वह अपने जन्म-जन्मान्तरों में मनुस्मृति की वेदानुकुल शिक्षाओं के अध्ययन से वंचित होकर अपने सुखों व आत्मिक उन्नति की हानि कर रहे हैं। अतः उन सभी लोगों को जो मनुस्मृति का विरोध करते हैं, स्वार्थ को एक तरफ रखकर शीतल मस्तिष्क से मनुस्मृति को पूरा पढ़ना चाहिये और उसके ग्राह्य व अग्राह्य वचनों का संग्रह करना चाहिये। ग्राहय से लाभ उठाना चाहिये और अग्राह्य का त्याग करना चाहिये। वर्तमान समय में आर्यजगत् के प्रसिद्ध ऋषिभक्त रहे विद्वान लाला दीपचन्द आर्य जी ने स्वस्थापित एवं संचालित ‘आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली’ के द्वारा ‘‘विशुद्ध-मनुस्मृति” ग्रन्थ का सम्पादन कराकर सन् 1982 में उसका प्रकाशन किया था। इस विशुद्ध मनुस्मृति को पढ़कर हमारे सभी दलित व अन्य बन्धु जन्मना जातिवाद के पक्षधरों को यथोचित उत्तर दे सकते हैं।

पाठकों की जानकारी के लिए यह बताना भी आवश्यक है कि विशुद्ध-मनुस्मृति में बारह अध्याय हैं। इन अध्यायों में मुख्य रूप से निम्न विषयों पर विधान सम्मिलित किये गये हैं।

प्रथम अध्याय- सृष्टि-उत्पत्ति तथा धर्मोत्पत्ति विषय
द्वितीय अध्याय- संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम विषय
तृतीय अध्याय- समावर्तन, विवाह, पंचमहायज्ञ विधान विषय
चतुर्थ अध्याय- गृहस्थान्तर्गत आजीविकायें और व्रतों का विधान
पंचम अध्यय- भक्ष्याभक्ष्य, प्रेतशुद्धि, द्रव्यशुद्धि, स्त्रीधर्म आदि विषय
षष्ठ अध्याय- वानप्रस्थ-संन्यास धर्म विषय
सप्तम अध्याय- राजधर्म विषय
अष्टम अध्याय- राजधर्मान्तर्गत व्यवहारों (मुकदमों) का निर्णय
नवम अध्याय- राजधर्मान्तर्गत व्यवहारों का निर्णय
दशम अध्याय- चातुर्वर्ण्य धर्मान्तर्गत वैश्य, शूद्र के धर्म तथा चातुर्वर्ण्य-धर्म का उपसंहार
एकादश अध्याय- प्रायश्चित विषय
द्वादश अध्याय- कर्म-फल विधान तथा निःश्रेयस कर्मों का वर्णन

यह विषय सूची अति संक्षिप्त है। विस्तार-भय के कारण मनुस्मृति में वर्णित पूरी विषय सूची को हम यहां प्रस्तुत कर पा रहे हैं। इस संक्षिप्त सूची से पाठक मनुस्मृति की महत्ता एवं उपयोगिता का कुछ अनुभव कर सकते हैं।

हम यह भी कहना चाहते हैं कि हम सब मनुष्यों का वर्तमान जन्म प्रथम व अन्तिम नहीं है। इससे पूर्व हमारे अनन्त बार जन्म हो चुके हैं। आगे भी अनन्त बार जन्म व मरण होंगे। कई बार मुक्ति और मुक्ति से पुनरावृत्ति भी हो सकती है। आत्मा अविनाशी व अमर है। यह सदा रहेगी। हमारी यह सृष्टि भी उत्पत्ति व प्रलय के मध्य स्थित है। उत्पत्ति के बाद यह 4.32 अरब वर्ष तक स्थित रहती है। उसके बाद इसकी प्रलय हो जाती है। प्रलय अवस्था भी 4.32 अरब वर्षों की होती है। इस प्रकार रात व दिन की तरह सृष्टि की भी उत्पत्ति व प्रलय होती रहती है। मनुष्य का आत्मा अनादि, नित्य व अमर है। इसका सृष्टि काल में अपने कर्मों के अनुसार जन्म व मरण होता रहता है। अतः हमारी आत्मा सदा से है और सदा रहने वाली है। इस रहस्य को जानकर हमें अपने दीर्घकालीन लाभों के लिये वेद, मनुस्मृति एवं सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के अध्ययन व उनसे प्राप्त ज्ञान का आचरण व पालन करने की आवश्यकता है। ऋषियों व विद्वानों का कर्तव्य मनुष्यों का मार्गदर्शन करना होता है। हम उसे मानेंगे तो हमें लाभ होगा अन्यथा हमारी ही हानि होगी। यह हानि ऐसी होती है जिसकी पूर्ति सम्भव नहीं होती। अन्तिम समय में जब मनुष्य को कुछ ज्ञान होता है तो आत्मा को पछतावा होता है परन्तु कर्म फल व्यवस्था का समाधान किसी के पास नहीं होता। जिन लोगों ने मनुस्मृति व वेदों का विरोध किया उनकी अनश्वर आत्मायें आज कहां हैं? उनका कोई अनुयायी नहीं बता सकता। वैदिक कर्म-फल सिद्धान्त से ही इसका अनुमान लगाया जा सकता है। अतः हमें व मनुस्मृति के विरोधियों को समय रहते संभल जाना चाहिये। इसी में सबका हित है। मनुस्मृति वा शुद्ध-मनुस्मृति एक महत्वपूर्ण एवं लाभप्रद ग्रन्थ है तथा मानव जाति के लिए एक वरदान है। हमें सत्य का ग्रहण करना चाहिये तथा असत्य को छोड़ देना चाहिये। इसी में हम सबका हित है।

सभी मनुष्य सभी विषयों के विद्वान नही हो सकते। जो व्यक्ति जिस विषय का विद्वान हो उसको उसी विषय पर साधिकार टीका-टिप्पणी करनी चाहिये। अतीत में देश के कुछ चर्चित व प्रसिद्ध लोगों ने ऐसे विषयों में टिप्पणियां की हैं जिसके वह अधिकारी विद्वान नहीं थे। ऐसी टिप्पणियों का कोई महत्व नहीं होता। ऐसे लोग अनजानें में निष्पक्ष विद्वानों व इतिहास पुरुषों पर अपनी अविद्या व अज्ञान के कारण मिथ्या व अनुचित टिप्पणी कर अपराध कर बैठते हैं। इससे, क्या विद्वान और क्या अविद्वान, सभी को बचना चाहिये। किसी व्यक्ति व समूह का अपने स्वार्थ के विषय में सोचना और दूसरों के हितों की उपेक्षा करना मनुष्यता नहीं है। जो ऐसा करता है वह विवेकवान एवं साधु पुरुष नहीं होता। आदर्श नियम है कि मनुष्य को अपनी ही उन्नति में ही सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिये अपितु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये। ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में इसका पूणतः पालन किया था। इसी का वर्तमान समय में भी सबको पालन करना चाहिये।

विश्व का समस्त मनुष्य समाज एक परमात्मा का परिवार है। वेदों की देन ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का महान सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार संसार के सब मनुष्यों को इनके स्वामी एक ईश्वर ने ही उत्पन्न किया है और सब मनुष्य व आत्मायें ईश्वर के प्रति उत्तरदायी हैं। सबको ईश्वर के विधानों को मानना हैं। यदि मानेंगे तो सुखी होंगे अन्यथा जन्म-जन्मान्तर में दुःख भोगेंगे। मनुस्मृति के विधान मनुष्य की इस आवश्यकता, हित व कल्याण को ध्यान में ही रखकर ही बनाये गये हैं। किसी मनुष्य को धर्म पालन अथवा अपने कर्तव्यों के निर्वाह में किसी प्रकार की बाधा न आये इस दृष्टि से राजव्यवस्था एवं विधान बनाये गये हैं। मनुस्मृति की तुलना में किसी मत-मतान्तर का ग्रन्थ कहीं नहीं आता। अतः सबको मनुस्मृति का अध्ययन करने के साथ उसके हितकर विधानों को जानना एवं उन्हें आचरण में लाना चाहिये। इसी में सबका हित व कल्याण हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

vaycasino
vaycasino
betgaranti giriş
norabahis giriş
vaycasino
vaycasino
Betist
Betist giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
vaycasino
vaycasino
ikimisli giriş
betplay giriş
timebet giriş
roketbet giriş
vaycasino
vaycasino
ikimisli giriş
betplay giriş
pokerklas giriş
pokerklas giriş
vaycasino
vaycasino
betpark
betpark
Hitbet giriş
Bahsegel giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
holiganbet giriş
vaycasino
vaycasino
realbahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
realbahis giriş
celtabet giriş
celtabet giriş
holiganbet giriş
betpark
betpark
betpark
betpark
timebet giriş
timebet giriş
roketbet giriş
roketbet giriş
vaycasino giriş
betplay giriş
betplay giriş
betpuan giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
betpark giriş
betpark giriş
betbox giriş
betbox giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betorder giriş
betorder giriş
betlike giriş
baywin giriş
betpark giriş
betpark giriş
baywin giriş
betpark giriş
baywin giriş
baywin giriş
bepark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
piabellacasino giriş
piabellacasino giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet giriş
betnano
meritking giriş
meritking giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
betplay giriş
betnano giriş
betplay giriş
betnano giriş
nitrobahis giriş
betplay giriş
roketbet giriş