जब असहयोग आंदोलन के लिए अंग्रेजों से गांधी जी ने मांगी थी माफी

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कांग्रेसी और उनके चाटुकार लोग सावरकर जी पर बार-बार यह आरोप लगाते हैं कि उन्होंने अंग्रेजों से माफी मांगी थी , जबकि अब यह इतिहास के तथ्यों से प्रमाणित हो चुका है कि उन्होंने माफी नहीं मांगी थी बल्कि गांधी जी के कहने से अपने विरुद्ध आए आदेश के विरुद्ध अपील की थी जिसमें उनके द्वारा प्रयोग किए गए शब्दों को गलत ढंग से आज तक प्रस्तुत किया जाता रहा है। पर आज हम एक ऐसे तथ्य का खुलासा कर रहे हैं जिससे आपको पता चलेगा कि गांधी जी ने अपने द्वारा किए गए पहले आंदोलन अर्थात असहयोग आंदोलन को लेकर अंग्रेजों से माफी मांगी थी।

बात उन दिनों की है जब असहयोग आंदोलन
अपने चरम पर था और उसमें देश के लोग जिस प्रकार भाग ले रहे थे उससे अंग्रेज हतप्रभ रह गए थे। गांधी जी के इस आंदोलन को कांग्रेस के इतिहास लेखकों ने बहुत बड़ा चढ़ाकर प्रस्तुत किया है । उन्होंने इस आंदोलन को कुछ इतना अतिरंजित कर दिया है कि लगता है जैसे इस देश में इससे पूर्व तो कोई ऐसा आंदोलन हुआ ही नहीं था और देश ने पहली बार राष्ट्रीय एकता की भावना का प्रदर्शन किया। ऐसे दुष्प्रचार के लाभ कम और हानि अधिक हुई है । सबसे बड़ी हानि तो यही हुई कि हम अपने क्रांतिकारी स्वाधीनता आंदोलन की सदियों पुरानी इतिहास परंपरा से काट दिए गए । दूसरे अहिंसा को हमारी कायरता मानकर प्रस्तुत किया गया।। जबकि इस आंदोलन में ही जिन आंदोलनकारियों ने असीम यातनाएं ब्रिटिश शासकों की ओर से झेली , उन्हें हथियार न उठाने देने की आज्ञा देकर गांधीजी ने भी उन पर एक प्रकार का अत्याचार किया ।
गांधी जी के साथ खड़े आंदोलनकारियों के विशाल समूह को लेकर लॉर्ड रीडिंग ने पंडित मदन मोहन मालवीय की मध्यस्थता से समस्या का समाधान निकालने का प्रयास किया ।अप्रैल 1921 ईस्वी में बातचीत का क्रम आरंभ हो गया। लॉर्ड रीडिंग ने गांधीजी को विश्वास दिलाया कि ब्रिटिश सरकार आंदोलनकारियों के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्यवाही नहीं करेगी । लॉर्ड रीडिंग ने तब गांधीजी से अली बंधुओं के भाषणों में हिंसक बातों का सप्रमाण उल्लेख करते हुए अपनी ओर से मांग की कि उन्हें ऐसे भाषण देने से रोका जाए । गांधीजी ने लॉर्ड रीडिंग के प्रमाणों से संतुष्ट होकर अली बंधुओं को उनके ‘राजभक्तिहीन’ कार्य के लिए दंडित करते हुए उनसे क्षमा याचना करवा डाली । अली बंधुओं ने कह दिया था कि उनके कहे हुए का जो अर्थ निकाला गया है उनका उद्देश्य ऐसा कुछ नहीं था ।
अली बंधुओं ने गांधी जी के कहने से क्षमा याचना तो कर ली , परंतु जितने भी राष्ट्रवादी आंदोलनकारी थे उन सबकी दृष्टि में गांधीजी की इस प्रकार की देश विरोधी हठ से उनके प्रति लोगों में आक्रोश उत्पन्न हो गया । आज तक स्वतंत्रता आंदोलन में कहीं भी किसी नायक ने अपने क्रांतिकारी कार्यों के लिए क्षमा याचना किसी भी विदेशी सत्ता से न तो की थी और ना ही अपने साथियों से करवाई थी। सारी लड़ाई का आधार ही क्षमा याचना न करना होता आ रहा था । क्रांतिकारियों का एक ही लक्ष्य होता था और एक ही उद्देश्य होता था कि परिणाम चाहे जो हो परंतु विदेशी शासकों से अपने किसी कार्य की क्षमा याचना नहीं करेंगे । इसका कारण यह होता था कि देश के क्रांतिकारी लोग उन शासकों को अपना शासक ही नहीं मानते थे । पर गांधी जी के साथ समस्या यह थी कि वह विदेशी शासकों को अपना शासक मान रहे थे इसलिए जिन अली बंधुओं को वह बड़े उत्साह से अपने साथ लेकर चले थे , उन्हीं को उन्होंने विदेशी शासकों के सामने क्षमा याचना करने के लिए बाध्य कर दिया ।
कांग्रेस के इतिहास लेखक डॉ पट्टाभी सीतारामय्या ने लिखा है :– ” यह माफी प्रकरण इस आंदोलन के इतिहास की एक युगांतर कारी घटना है । गोरे लोग सरकार की इस विजय पर बड़े प्रसन्न थे । क्षमा से लॉर्ड रीडिंग की संतुष्टि हो गई और उन्होंने अली भाइयों पर मुकदमा चलाने का विचार त्याग दिया ।”
अंग्रेजों की प्रसन्नता का कारण यह था कि भारत वासियों ने कभी भी अपने किसी भी आंदोलन के लिए उनके सामने क्षमा याचना नहीं की थी। अंग्रेजों ने 18 57 की क्रांति से पूर्व और उसके पश्चात के किसी भी बड़े अथवा छोटे आंदोलन का इस प्रकार पटाक्षेप होते नहीं देखा था कि आंदोलनकारी स्वयं ही क्षमा याचना के लिए तैयार हो जाएंगे । अब से पहले तो किसी भी आंदोलन के समय गोरों की कम्पकम्पी छूट जाया करती थी । उन्हें लगा करता था कि उनको भारतीय लोगों के आक्रोश का भाजन बनना पड़ेगा और यह यदि परास्त भी हो गए या अपने आंदोलन में असफल भी हो गए तो भी क्षमा याचना नहीं करेंगे। भारत के स्वातंत्र्य समर की इस लज्जाप्रद घटना को भी लोगों ने इस प्रकार वर्णित किया है जैसे यह कितनी महान घटना थी और गांधी जी ने ऐसा करके अपने उत्कृष्ट महात्मापन का परिचय दिया था । डॉक्टर इंद्र विद्यावाचस्पति लिखते हैं : –“अपने अन्य साथियों से क्षमा याचना का काम जितना साहसपूर्ण था उतना ही भयावह भी था । देश के बहुत से प्रमुख कार्यकर्ताओं ने उसे अच्छा नहीं माना। उनका विचार था कि अंग्रेजी सरकार के वायदों पर विश्वास नहीं करना चाहिए और ना ही उनके आश्वासनों के आधार पर उदारता दिखानी उचित है। महात्मा जी उपयोगिता वादी नहीं थे । वह सत्य के अनन्य पुजारी थे ।अतः उन्होंने लॉर्ड रीडिंग के सत्य की परीक्षा करने से पूर्व ही सत्य के प्रति अपने कर्तव्य का पालन कर देना उचित माना । गांधीजी ने अपने अन्य साथियों से क्षमा याचना करवा दी और उनको अपने इस कार्य की वाहवाही भी मिली । पर सरकार अपने दमन चक्र को रोकने को तैयार नहीं हुई । गांधीजी को छल लिया गया या गांधी जी ने स्वयं को छलने के लिए स्वयं ही अंग्रेजों के समक्ष प्रस्तुत कर दिया , लेकिन सरकार ना तो छली गई और न उसने छलने के लिए स्वयं को प्रस्तुत किया । इससे गांधी जी की नेतृत्व शक्ति की पोल खुल गई । वह पूर्व में अपने द्वारा चलाए गए सत्याग्रह की मिट्टी अपने आप ही पीट चुके थे और अब वैसा ही अपने असहयोग आंदोलन के साथ करने जा रहे थे ।
इंद्र विद्यावाचस्पति जी आगे लिखते हैं — “फल वही हुआ जिसकी आलोचकों को आशंका थी ।अंग्रेजी सरकार का उद्देश्य असहयोग आंदोलन के वेग को बंद करना था । गांधी रीडिंग समझौते की स्याही अभी सूखने भी नहीं पाई थी कि सरकार का दमन चक्र फिर उसी जोर से चलने लगा जैसा समझौते से पूर्व चल रहा था । सभी प्रांतों और विशेष रूप से पंडित मोतीलाल नेहरु के संयुक्त प्रांत में सरकार निसंकोच होकर राजदंड का उपयोग कर रही थी । बहुत से कार्यकर्ताओं को बिना कोई अभियोग चलाए पकड़कर जेलों में डाल दिया जाता था ।अभियोग द्वारा दंडित लोगों की संख्या दो लाख के समीप पहुंची।”
स्थिति उस समय ज्यादा खराब हो गई जब सरकार ने 14 सितंबर को मौलाना मोहम्मद अली को मद्रास जाते समय रास्ते में वाल्टेयर के स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया । उन्हें कराची में दिए गए एक भाषण के कारण गिरफ्तार किया गया था । जिसमें 9 लोगों को अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध भड़काया था । कुछ दिनों पश्चात मोहम्मद शौकत अली (यही दोनों अली बंधु कहे जाते हैं ) को भी गिरफ्तार कर लिया ।
अब गांधी जी को कुछ अपनी भूल का अनुभव हुआ ।उन्होंने फिर लोगों से सरकार द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौती का सामना करने को कहा । इसी समय ब्रिटिश युवराज के स्वागत समारोह के बहिष्कार की तैयारी होने लगी । जब युवराज मुंबई पहुंचे तो उसके 53 लोगों की आहुति स्वाधीनता संग्राम में पड़ी। घायलों की संख्या 400 तक थी । सरकार ने कहा कि उसने गोली जनता के उपद्रव के कारण चलाई । देश के क्रांतिकारी लोग इस बार गांधी के द्वारा माफी मांगे जाने की घटना का हिसाब किताब कर लेना चाहते थे । पर गांधी जी को फिर बहाना मिल गया अपने लोगों को दुखी करने का । महात्मा जी ने देश के लोगों के ‘पाप’ के लिए 5 दिन का अनशन किया। लोग समझ ही नहीं पाए कि गांधी किस प्रकार के नेता थे ?

(लेखक की पुस्तक : ‘अंधकार बीत गया और भारत जीत गया’ से)

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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