अतिथि देवो भव: – की ऐसी रोमांचकारी परंपरा भारत से अलग भला और कहां मिल सकती है

17 मार्च 1527 को हुए खानवा युद्ध के महानायक महाराणा संग्राम सिंह की स्मृति में

एक बार राणा सांगा अपने प्राणों को संकट में फंसा देखकर भागे जा रहे थे । उनका जयमल से युद्ध हो रहा था। जयमल भी राणा का पीछा करता जा रहा था। वह पीछे पीछे था और राणा सांगा आगे ही आगे भागे जा रहे थे । राणा को बचने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। वह किसी प्रकार राठौर बीदा के यहां पहुंचे ।
राठौर बीदा ने देखा कि राणा की अवस्था बड़ी ही दयनीय बनी हुई है। उन्होंने राणा का कुशलक्षेम पूछा। राणा ने शीघ्रता से अपनी स्थिति पर प्रकाश डाला और राठौर बीदा से उसके राज्य में शरण मांगी । राठौर बीदा ने शरणागत की रक्षा को अपना धर्म मानकर राणा को शरण दे दी और अपने किले के राजभवन की ओर बढ़ा ।
पर यह क्या ? – पीछे से कड़कती हुई आवाज आई ठहरो सांगा ! भागने का प्रयास मत करो – – । मुझसे संघर्ष करो । यह आवाज जयमल की थी । जयमल राणा सांगा का अंत करना चाहता था । वह राणा को किसी भी मूल्य पर छोड़ना नहीं चाहता था । राणा यद्यपि गंभीर रूप से घायल हो चुके थे। उनके शरीर से रक्त बह रहा था । परंतु शत्रु की चुनौती भरी ललकार को सुन कर तुरंत वहीं रुक गए।
दोनों की तलवार है फिर एक दूसरे का अंत करने के लिए चलने लगीं । जब बीदा ने देखा कि उसके शरणागत को उनका शत्रु उन्हीं के घर में मार डालना चाहता है तो राणा को युद्ध से पीछे धकेल दिया और जयमल से स्वयं युद्ध करने लगा। यद्यपि जयमल ने उसे युद्ध से हटने को भी कहा। परंतु उसने स्पष्ट कर दिया कि राणा सांगा इस समय उसके अतिथि हैं और अतिथि की रक्षा करना उसका कर्तव्य है इसलिए अब युद्ध में पीछे हटना किसी भी प्रकार से संभव नहीं है।
जयमल ने राठौड़ बीदा का यह वक्तव्य सुनकर उसी से संघर्ष करना आरंभ कर दिया । राणा सांगा ने जब देखा कि उसके लिए बीदा अपने प्राण तक दे देना चाहता है तो उन्होंने उसे हटने का आग्रह किया कि तू हट जा । मैं स्वयं ही अपने शत्रु से लोहा लूंगा । मैं अब भी उसका अंत करने की क्षमता रखता हूं। राठौर बीदा ने इस पर कहा कि राजकुमार ( उस समय तक राणा सांगा को मेवाड़ का सिंहासन प्राप्त नहीं हुआ था ) मैं यह भली प्रकार जानता हूं । पर आप इस समय मेरे अतिथि हैं । इसलिए मेरा कर्तव्य आपकी प्राण रक्षा करना है । जिसे आप मुझे निर्वाह करने दें।
राणा सांगा के लिए बीदा जयमल से संघर्ष करने लगा । राणा सांगा दूर खड़े होकर उनका युद्ध कौशल देखा लगे । दोनों ओर से तीखे प्रहार हो रहे थे। जब बीदा ने देखा कि राणा सांगा के लिए युद्ध उसके हाथ से निकलता जा रहा है । जिसमें उसका प्राणान्त भी संभव है तो उसने राणा सांगा को वहां से सुरक्षित निकल भागने का संकेत करते हुए कह दिया कि अब उसका समय निकट है । अतः आप शीघ्रता से सुरक्षित स्थान के लिए प्रस्थान करो ।
राणा सांगा ने वहां से निकलने में तनिक भी देर नहीं की । जयमल ने बीदा को छोड़कर राणा सांगा का पीछा करना चाहा। पर बीदा ने जयमल को आगे से घेर लिया और से युद्ध के लिए फिर ललकारा। वह तो अपने प्राणों को संकट में डाल कर अपने अतिथि की प्राण रक्षा करने पर उतारू था । इस प्रकार बीदा सांगा को भागने का उचित अंतराल दे गए। कुछ देर के युद्ध के पश्चात जयमल ने जब अपने भरपूर प्रहार के साथ बीदा को धरती पर गिरा दिया तो उस वीर की जीवन लीला समाप्त हो गई ।
बीदा ने धरती पर गिरकर कुछ समय में अपनी जीवन लीला समेट ली । जयमल आगे बढ़ गया पर उसके पश्चात उसे राणा का कहीं पता नहीं चला। इस प्रकार एक शूरवीर की रक्षा करके भारत की “अतिथि देवो भव: ” की गौरवमयी परंपरा का पालन कर बीदा ने कर इतिहास बना दिया ।
भारत के विद्यालयों में नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रम के लिए अति सुंदर प्रसंग है यह । बच्चों को हमारे पूर्वजों की “अतिथि देवो भव: ” – की परंपरा का तो इससे ज्ञान होगा ही साथ ही हमारे वीर पूर्वजों की वीरता का भी बोध होगा कि अतिथि के लिए प्राण गंवाना भी हमारे यहां पर कितनी उच्च परंपरा मानी जाती थी । ( सन्दर्भ : राजपूतों की गौरव गाथा )
8 वर्ष बाद महाराणा संग्राम सिंह ने खानवा के युद्ध में आज के दिन अपने जीवन का सर्वाधिक रोमांचकारी युद्ध किया था। जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। किसी तरह बाहर निकलने में कछवाह वंश के पृथ्वीराज कछवाह नेे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा पृथ्वीराज कछवाह द्वारा ही राणा सांगा को घायल अवस्था में काल्पी ( मेवाड़ ) नामक स्थान पर पहुँचाने में मदद दी गई, लेेेकिन असंंतुुष्ट सरदारों ने इसी स्थान राणा सांगा को जहर दे दिया । ऐसी अवस्था में राणा सांगा पुनः बसवा आए जहाँ सांगा की 30 जनवरी,1528 को मृत्यु हो गयी, लेकिन राणा सांगा का विधि विधान से अन्तिम संस्कार माण्डलगढ (भीलवाड़ा) में हुआ।

(यह प्रसंग मेरे द्वारा ” भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास – भाग 3 , की ” घोड़ों पर घोड़े टूट पड़े तलवार लड़ी तलवारों से” नामक पुस्तक के पृष्ठ संख्या 388 पर दिया गया है )

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

Comment:

betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
kolaybet
betgaranti
betpark
kolaybet
betpark
betpark
casibom giriş
casibom giriş
casibom
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet giriş
betpark
betpark
betgaranti
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet
kolaybet
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet
bettilt giriş
bettilt giriş
harbiwin giriş
harbiwin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betbox giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
Hitbet giriş
xbahis
xbahis
vaycasino
vaycasino
bettilt giriş