पर्यावरण असंतुलन और भारत की इदन्नमम् परंपरा

एक आंकलन के अनुसार अगले 50 वर्षों में ओजोन परत में हो रहे निरंतर क्षरण के कारण विश्व में त्वचा कैंसर के फैलने की प्रबल आशंका है। पर्यावरणविदों ने इस कैंसर के फैलने की आशंका शीतोष्ण जलवायु के उन क्षेत्रों में सबसे अधिक मानी है, जहां ओजोन की परत पतली है, स्पष्ट है यूरोपीय देश इसकी चपेट में है। परंतु इसका अभिप्राय यह नही कि खतरा हमसे दूर है और हम आराम से रह सकते हैं। पूरी धरती गरमा रही है और उससे पूरे भूमण्डल को ही खतरा है। pollteगर्माती धरती के कारण अधिक प्रचण्ड और अनिश्चित मौसम अपना प्रभाव दिखाएगा जिससे अकाल, बाढ़, तूफान आदि में वृद्घि होगी और इसके परिणाम स्वरूप मृत्यु दर चोट ग्रस्त होने की दर तथा कीटों के विस्तार के साथ संक्रामक रोगों के फैलने की दर में वृद्घि दर्ज होगी। एक से तीन डिग्री सेल्सियस की वैश्विक तापवृद्घि संभवत: शीतोष्ण क्षेत्रों में अत्यधिक गर्म दिवसों की संख्या में वृद्घि करेगी जिसके परिणाम स्वरूप तापघात के कारण कई हजार अतिरिक्त मौतें प्रतिवर्ष हो सकती हैं। गर्मियों की बढ़ती तपिश से बचने के लिए वातानुकूलित विधियों को प्रयोग करने में सक्षम लोग इसका अधिकाधिक उपयोग करेंगे जिससे विद्युत ग्रहों के द्वारा वायु प्रदूषण में वृद्घि होगी। विद्युत संयंत्रों से निकलने वाले सूक्ष्म कण सीधे तौर पर सांस एवं हृदय रोगों में वृद्घि कर रहे हैं। इससे अस्पतालों में रोगियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। वर्तमान चिकित्सा विज्ञान यद्यपि अपनी सफलता पर इतरा रहा है और अपनी पीठ अपने आप ही थपथपा रहा है, परंतु वास्तव में यह विज्ञान अब सफलता के नही अपितु अपनी असफलता के सर्वाधिक निकट है, क्योंकि किसी भी प्रकार की महामारी के फैलने पर सिवाय लाशों को जल्दी जल्दी अस्पतालों से बाहर फेंकने और हटाने के इसके पास कोई उपाय नही होगा। बिगड़ते पर्यावरण का घातक प्रभाव भारत पर भी पड़ रहा है। वैश्विक तापवृद्घि के कारण भारत में चिकनगुनिया व डेंगू जैसे बुखारों ने भयानक स्तर पर अपनी दस्तक दी है। अक्टूबर 2000 में भारत के आठ प्रांतों के 151 जिले चिकनगुनिया की चपेट में आये थे। इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश केरल और दिल्ली थे। देश भर में चिकनगुनिया के 12 लाख 50 हजार से अधिक रोगी पाए गये, जिनमें से 52,245 रोगी कर्नाटक में तथा 2,58,998 रोगी महाराष्ट्र में थे। जबकि डेंगू 1996 में पहली बार गंभीर रूप में भारत की राजधानी दिल्ली में आया था। इस महामारी के कुल मिलाकर दस हजार मामले उस समय प्रकाश में आये थे और उनमें से चार सौ की मौतें हो गयीं थीं। दिल्ली आज भी ऐसी महामारियों के लिए सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। 1996 में ही इस बीमारी की उपस्थिति लुधियाना में भी दर्ज की गयी थी, जबकि 1974 में इसे जम्मू क्षेत्र में भी देखा और महसूस किया गया था।
वैश्विक तापवृद्घि के कारण लू के थपेड़ों से मरने वालों की संख्या भी प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। 1990 में जहां लू केवल छह दिन चली थी वहीं 1995 में 29 दिन और 1998 में 27 दिन चली। 1990 में राजस्थान में ही लू देखी गयी थी, और उससे भी कोई मौत नही हुई। लेकिन 1998 में पंजाब राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, दक्षिण तमिलनाडु में लू का प्रकोप रहा और इससे 1300 मौतें हुईं। ऐसा नही कि लू 1990 से पहले चलती नही थी लू तो चलती थी, लेकिन उस समय मौसम में अचानक उतार चढ़ाव नही आता था। वैश्विक तापवृद्घि ने मौसम में अप्रत्याशित उतार चढ़ाव की समस्या को उत्पन्न किया है। जिससे लू के थपेड़ों में और चक्रवातों से होने वाली भारी वर्षा में वृद्घि हुई है। जिस प्रकार धरती गरमाती जा रही है, उससे विश्व के हिम क्षेत्रों के पिघलने और समुद्रों के जल स्तर में भारी वृद्घि होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। इससे बहुत से समुद्री द्वीपों और समुद्र के पास रहने वाले देशों के जलमग्न हो जाने की भी आशंका है। प्रचण्ड मौसम के कारण मानव स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है और दस्त, हैजा व पानी में जैविक एवं रासायनिक प्रदूषकों द्वारा होने वाली विषाक्तता बढ़ती जा रही है। चक्रवात/बाढ़ के कारण जनस्वास्थ्य संबंधी मूलभूत ढांचे की क्षति हो रही है। वैश्विक तापवृद्घि के कारण हिमालय में मौजूद ग्लेशियर 15 मीटर प्रतिवर्ष की दर से पीछे हट रहे हैं। 1970 से यह स्थिति निरंतर बनी हुई है, याद रहे 1970 में ही पहली बार वैश्विक तापवृद्घि की समस्या की ओर लोगों का ध्यान गया था। गंगोत्री ग्लेशियर 30 मीटर प्रतिवर्ष पीछे हट रहा है। वैज्ञानिकों का मत है कि इस दर से पिघलने पर समस्त मध्य और पूर्वी हिमालयी ग्लेशियर 2035 तक समाप्त हो जाएंगे।
पेंटागन की रिपोर्ट है कि भविष्य के युद्घ धर्म, विचार या राष्ट्रीय गौरव के स्थान पर जीवित रहने के मुद्दे पर लड़े जाएंगे। अमेरिका में फैलिफोर्निया में सैक्रामेंन्टो नदी क्षेत्र में, डेल्टा द्वीप का तटबंध टूट सकता है, जिससे उत्तर से दक्षिण को पानी पहुंचाने वाली कृत्रिम जल प्रणाली भंग हो जाएगी। अगले बीस वर्षों में धरती द्वारा अपनी वर्तमान जनसंख्या को कायम रखने की क्षमता में महत्वपूर्ण कमी साफ नजर आने लगेगी। बढ़ते समुद्री जलस्तर के कारण बांग्लादेश लगभग पूरी तरह से वीरान हो जाएगा, क्योंकि समुद्री पानी आंतरिक जलापूर्ति को दूषित कर देगा। अप्रैल 2007 में आयी एक रिपोर्ट में चेताया गया है कि बढ़ते तापमान के परिणाम स्वरूप कुछ संक्रामक रोगवाहकों के स्थानिक विस्तार में परिवर्तन हो सकता है, और इनका प्रभाव मिश्रित होगा, जैसे कि अफ्रीका में मलेरिया के क्षेत्र और संचरण क्षमता में कमी या वृद्घि। आई.सी.सी.सी. वैज्ञानिक जो तथ्य पेश करना चाहते थे उसका विश्लेषण है कि जैसे जैसे गर्म तापमान उष्ण कटिबंध से उत्तर दक्षिण की ओर विस्तारित होगा और अधिक ऊंचाईयों की ओर बढ़ेगा, रोगवाहक मच्छर उसके साथ साथ फैलेंगे। इसलिए ग्लोबल वार्मिंग की बदौलत दुनिया भर में लाखों और लोग मलेरिया से संक्रमित हो जाएंगे। मस्तिष्कशोथ की महामारियों में वृद्घि होने की आशंका है, क्योंकि यह भी एक मच्छर जनित रोग है और गर्म तापमान से सीधे संबंधित है, कीटों और चिचड़ी आदि रोगवाहक परजीवियों द्वारा फैलाए जाने वाले रोगों के पर्यावरणीय परिवर्तनों से प्रभावित होने की संभावना है। क्योंकि ये जीव स्वयं ही वनस्पति के प्रकार तापमान आर्द्रता आदि के लिए अति संवेदनशील हैं। आज के पर्यावरण असुंलन के लिए या वैश्विक तापमान में वृद्घि के लिए पश्चिमी देशों का दर्शन और उनकी भौतिक उन्नति सबसे अधिक उत्तरदायी है। इन क्षेत्रों ने विश्व को विकास के नाम पर विनाश भेंट में दिया है। अब जैसे जैसे विश्व की आंखेें खुल रही हैं तो ज्ञात हो रहा है कि सोच और दर्शन तो भारत के ही ठीक है। परंतु अब लगता है कि देर काफी हो चुकी है। भारत में जब पहली बार मौहम्मद बिन कासिम आया तो इतिहासकार लिखता है कि वह यहां के सामाजिक ताने बाने को देखकर दंग रह गया था। हर व्यक्ति अपने आप में एक कुशल शिल्पकार था, कारीगर था, हाथ का दस्तकार था। बड़ी ईमानदारी से सब अपने अपने काम में लगे हुए थे। इसलिए देश के पर्यावरण को कोई खतरा नही था। पूरा देश समृद्घ था, हर शिल्पकार को, हर कारीगर को और हर दस्तकार को अपने शिल्प का या कारीगरी का पूरा पारिश्रमिक मिलता था। बीच में कोई बिचौलिया नही था। जुलाहे से आप सीधे कपड़ा लें-बीच में कोई मुनाफा खाने वाली कंपनी नही थी। इसलिए हर जुलाहा समृद्घ था। कहीं शिल्प विद्या को सिखाने के लिए विद्यालयों की व्यवस्था नही थी, कहीं से किसी डिग्री के लेने की आवश्यकता नही थी। परंपरागत रूप से हर व्यक्ति अभ्यास से अपनी जीविकापार्जन की कला को सीख लेता था। इसलिए कहीं भारी उद्योगों के लगाने की आवश्यकता नही थी, क्योंकि उद्योग पति पूंजीपति होता है और उसकी पूंजी श्रम पर शासन करती है। भारतीय सामाजिक तानेबाने के निर्माताओं ने युगों पूर्व इस बात को समझ लिया था। इसलिए उन्होंने हर व्यक्ति को ही चलती फिरती एक कंपनी या फैक्टरी बनाने का अदभुत और प्रशंसनीय कार्य किया। भारतीय सामाजिक संरचना की इस अदभुत और प्रशंसनीय व्यवस्था को भारी उद्योगों की वर्तमान व्यवस्था ने जर्जरित किया। इसे नष्ट किया और हमेशा हमेशा के लिए दफन कर दिया। भारी उद्योगों ने और पश्चिम की वर्तमान आर्थिक आपाधापी ने विश्व में और विशेषत: भारत में गरीबी फैलाई। परंपरागत शिल्पविद्या को बंद कर दिया और शिल्पविद्या में पारंगत होने के लिए डिग्री लेने की व्यवस्था कायम की, जो कि बड़ी धनराशि खर्च करके मिलती है, फिर भरती करने के लिए एक कठोर प्रक्रिया से गुजरना आवश्यक बनाया गया और अंत में उचित पारिश्रमिक न देकर उल्टे पारिश्रमिक में कंपनी का शेयर नियत किया गया। इससे समाज में गरीबी की बीमारी भयंकर रूप में फैली। मुस्लिम काल में भारत की परंपरागत व्यवस्था जैसे तैसे कायम रही परंतु अंग्रेजों के काल में इसे क्षतिग्रस्त किया गया और अब ‘काले अंग्रेजों’ ने अपने कमीशन के लिए इसे कतई ही नष्ट कर दिया है। इसमें सुधार की आवश्यकता थी ना कि इसे नष्ट करने की आवश्यकता थी। अब अपनी व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर दिया है तो भारी उद्योग स्थापित कर दिये हैं। फलस्वरूप देश में बेरोजगारी तो बढ़ी ही है, साथ ही महंगाई और भ्रष्टाचार भी बढ़ा है। इसके अतिरिक्त पर्यावरण असंतुलन भी बढ़ा है। अभी उद्योग धुंआ फेंक रहे हैं। विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली गैसें हमारा जीवन गटक रही है और हम शांत बैठे हैं। ऐसे में आवश्यक है भारत की प्राचीन सामाजिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना की। यज्ञ, हवन से निकलने वाली सुगंध और उसमें प्रयुक्त होने वाली विशेष सामग्री से यदि आज भी बड़े-2 सामूहिक यज्ञों को करने की परंपरा का शुभारंभ किया जाए तो अब भी विश्व की डूबती नैया को बचाया जा सकता है। लेकिन यह विश्व गरीबों के लिए नही जीता और ना ही सदपरंपराओं के लिए जीता हुआ लगता है, यह तो अमीरों के लिए जीता है और अमीर सदपरंपराओं के खिलाफ लामबंद होकर एक ऐसा घेरा बनाते हैं जिसे तोड़ना अति कठिन होता है। अब ऐसे स्वार्थी लोग अपने अपने औद्योगिक संस्थानों और पर्यावरण असंतुलन में सहायक फैक्ट्रियों को बंद करने के लिए सामने नही आएंगे-यानि स्वयं तो डूबेंगे ही औरों को भी लेकर डूबेंगे। क्या विश्व भारत की इदन्नमम् परंपरा का अर्थ समझ सकता है? यदि हां तो समझ ले कि वर्तमान वैश्विक तापवृद्घि का समाधान इसी व्यवस्था में है।

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