सुप्रसिद्ध ऋषि भक्त भजनोपदेशक पंडित ब्रजपाल शर्मा कर्मठ स्मृति शेष हो गए

ओ३म्

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संसार का नियम है कि सृष्टि बनती है और उसके बाद उसकी प्रलय आती है। सूर्योदय होता है और कुछ समय बाद अस्त हो जाता है तथा रात्रि के बाद पुनः सूर्याेदय होता है। इसी प्रकार से जीवात्माओं का मनुष्य आदि अनेक योनियों में जन्म होता है और बाल, किशोर, युवा, प्रौढ़ तथा वृद्ध अवस्थाओं के बाद उनकी मृत्यु हो जाती है। इसी नियम का पालन करते हुए ऋषिभक्त गीतकार भजनोपदेशक पं. बृजपाल शर्मा कर्मठ जी ने यशस्वी कार्य करते हुए जीवन व्यतीत किया और शुक्रवार दिनांक 13 दिसम्बर, 2019 को प्रातः लगभग 5.30 बजे 83 वर्ष की अवस्था में उनका देहावसान हो गया। मृत्यु से 7-8 दिन पूर्व उन्हें सामान्य सी अस्वस्थता हुई थी। इससे पूर्व का उनका जीवन प्रायः स्वस्थ ही व्यतीत हुआ। कर्मठ जी ने पूरे देश में घूम कर पूरे उत्साह से वैदिक धर्म का प्रचार प्रसार-किया। वह आर्यसमाज के यशस्वी विद्वान थे, प्रभावशाली वक्ता थे, गीतकार और भजनोपदेशक थे और ऋषि जीवन व कार्यों से प्रेरणा ग्रहण करते हुए त्याग व तपस्या का जीवन व्यतीत करते थे। उन्होंने बड़ी संख्या में भजनोपदेशक शिष्यों को भी तैयार किया। एक सहस्र से भी अधिक भजन लिखे। उनके भजनों के तीस से अधिक संग्रह प्रकाशित हुए। देश की अनेक आर्यसमाजों व सभा-संस्थाओं ने उनकी सेवाओं के लिये उनका अभिनन्दन एवं सम्मान किया। उनके मत्र्यलोक से चले जाने से आर्यसमाज का एक वयोवृद्ध अनुभवी कर्मठ ऋषिभक्त विद्वान व प्रचारक अब हमारे मध्य नहीं रहा। उनकी शिष्य मण्डली व उनके भजन संग्रहों को ही हम उनका स्मारक कह सकते हैं। श्री सत्यपाल सरल एवं श्र कैलाश कर्मठ जी उनके प्रमुख शिष्यों में हैं जो सर्वात्मा उनके पद्चिन्हों पर चलकर वैदिक धर्म के प्रचार व प्रसार के कार्य में संलग्न हैं।

पं. बृजपाल शर्मा कर्मठ जी का जन्म 15 अक्टूबर सन् 1934 को उत्तर प्रदेश के मुजफफरनगर जिले में पुरकाजी कस्बे के पास ग्राम तुगलकपुर-कम्हेड़ा में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री किशन लाल शर्मा तथा माता जी का नाम श्रीमती चन्द्रवती शर्मा था। आपके दादा जी अपने माता-पिता के अकेले पुत्र थे और श्री बृजपाल जी भी अपने पिता के एक ही पुत्र थे। आपकी दो बहिनें भी थी जिनकी मृत्यृ हो चुकी है। आपका विवाह धर्म-पारायणा रामकली जी से हुआ था। आपके पुत्र से हमें ज्ञात हुआ कि माता रामकली शर्मा जी का स्वास्थ्य सामान्य है। इन आर्य माता पिता से एक पुत्र श्री अरविन्द शर्मा तथा दो पुत्रियांे का जन्म हुआ। कर्मठ जी की एक पुत्री दिवंगत हो चुकी हैं एवं दूसरी पुत्री रुड़की में रहती हैं। कर्मठ जी का भरा पूरा परिवार हैं जिसमें 2 पौत्र, एक दौहित्री एवं एक दौहित्र हैं।

ऋषिभक्त श्री बृजपाल कर्मठ जी आर्यसमाज में पं0 अभयराम शर्मा दयानन्दी, सहारनपुर की प्रेरणा से आये थे। पं0 अभयराम शर्मा जी आर्यसमाज के प्रमुख भजनोपदेशक रहे हैं। आपने कविता में ऋषि दयानन्द की जीवनी लिखी हैं जो हमारे संग्रह में है। इनके भी गीत-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। सन् 1994 में जब हम आर्यसमाज धामावाला देहरादून का संचालन करते थे तब पं0 अभयराम शर्मा जी ने आर्यसमाज में अपने भजनों की प्रस्तुति दी थी। उनके एक शिष्य ने एक भजन गाया था जिसने हमारे हृदय पर अमिट छाप छोड़ी थी। वह भजन था ‘ये मन बड़ा है चंचल, करता रहता हलचल, इस पर ध्यान धरो’। हमें जानकारी मिली है कि श्री अभयराम शर्मा जी इस समय लगभग एक सौ वर्ष की आयु के हो रहे हैं। आप इन दिनों सहारनपुर में अपने निवास पर रहते हैं। श्री अरविन्द शर्मा जी ने हमें बताया है कि वह कुछ समय बाद उनसे मिलने सहारनपुर जायेंगे। हम प्रयास करेंगे कि हम श्री अरविन्द शर्मा जी के सहयोग से श्री अभयराम शर्मा जी के विषय में भी कुछ पंक्तियां लिखकर पाठकों को अवगत कराये व उनके चित्र भी प्रस्तुत करे। आर्यसमाज के नेताओं व विद्वानों का भी कर्तव्य है कि वह ऐसे वयोवृद्ध ऋषिभक्तों की समय समय पर सुधी लेते रहें। आर्यसमाज में हमें वृद्धों के प्रति अपने कर्तव्यों की पूर्ति का न होना अखरता है। पं0 अभयराम शर्मा जी भी ऐसे ही ऋषिभक्त हैं जिन्हें उनके जीवन काल में ही लोगों ने भुला सा दिया है।

श्री बृजपाल शर्मा कर्मठ जी अपनी युवावस्था में भारत सरकार के सूचना प्रसारण विभाग में सरकारी नौकरी करते थे। उन्होंने कई वर्ष तक यह नौकरी की थी। आप मुख्यतः श्री अभयराम शर्मा – सहारनपुर एवं हैदराबाद के पं0 नरेन्द्र जी तथा आर्यसमाज के नेता श्री ओम्प्रकाश त्यागी जी आदि विद्वानों के विचारों को सुनकर व उनकी प्रेरणा से सरकारी नौकरी से त्याग पत्र देकर आर्यसमाज में सर्वात्मा सम्मिलित हुए थे और जीवन भर आर्यसमाज से जुड़ कर गीतों व भजनों के द्वारा अपनी सेवायें देते रहें। पं0 बृजपाल शर्मा कर्मठ जी के शिष्यों की सूची काफी लम्बी है। उन्होंने अपने जीवन में 13 से अधिक भजनोपदेशक आर्यसमाज को दिये हैं। यह सभी भजनोपदेशक आर्यसमाज को अपनी सेवायें दे रहे हैं। पं0 सत्यपाल सरल, श्री कैलाश कर्मठ तथा श्री योगेश दत्त शर्मा जी आदि इनके प्रमुख शिष्य व सुप्रसिद्ध भजनोपदेशक हैं। यह भी उल्लेखनीय है कर्मठ जी ने अपने जीवन में प्रचार करके सहस्रों युवकों को आर्यसमाज से जोड़ा था।

हमने कर्मठ जी के सुपुत्र श्री अरविन्द शर्मा जी से बात की तो ज्ञात हुआ कि श्री कर्मठ जी का प्रिय भजन ‘सुमिरन कर ले मेरे मना यू हीं बीती जाये तेरी उमरिया रे’ था। आपका कार्यक्षेत्र पूरा भारत रहा है। आप दक्षिण भारत सहित पश्चिम, पूर्व व उत्तर भारत के प्रदेशों की आर्यसमाजों में भजनों द्वारा प्रचारार्थ जाया करते थे। इन प्रदेशों के हैदराबाद, मुम्बई, उड़ीसा, कलकत्ता आदि अनेक स्थान उनके प्रचार क्षेत्रों में सम्मिलित हैं। यद्यपि कर्मठ जी जीवन भर स्वस्थ रहे परन्तु वृद्धावस्था के कारण वह विगत पांच या छः वर्ष से प्रचार के लिये नहीं जा रहे थे। कर्मठ जी ने एक सहस्र से अधिक भजन लिखे हैं जिनका 30 से अधिक पुस्तकों में प्रकाशन हुआ है। ‘कर्मठ गीतांजलि’, ‘चेतना के स्वर’ एवं ‘वेदना के स्वर’ आदि उनके प्रसिद्ध भजन संग्रह हैं। आप अपने समय में रेडियो सिंगर भी रहे हैं। आपने सत्यार्थप्रकाश के सभी समुल्लासों पर भी काव्यमय रचनायें की हैं। आपका यह कार्य महत्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय है।

पं0 जी को आर्यसमाज की अनेक संस्थाओं ने समय-समय पर अपने पुरस्कारों व सम्मानों से अलंकृत किया है। मानव सेवा प्रतिष्ठान, दिल्ली, ठाकुर विक्रम सिंह सेवा न्यास, केन्द्रीय सभा, फरीदाबाद, वैदिक मिशन, मुम्बई आदि अनेक संस्थाओं द्वारा आपका अभिनन्दन व सम्मान किया गया। आपको दक्षिण भारत की जहीराबाद की एक संस्था द्वारा मानद उपाधि ‘‘शिरोमणी” भी प्रदान की गईं थी। आर्यसमाज बड़ा बाजार कलकत्ता ने भी 6 दिसम्बर, 2014 को सम्मानित करते हुए आपको अभिनन्दन पत्र भेंट किया था और आपको सम्मान धनराशि दी थी। अन्तर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन, मथुरा 6-7-8 नवम्बर, 2009 के अवसर पर भी आपको प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया था। ऐसे अनेक और पुरस्कार भी आपको जीवन में आर्य संस्थाओं से प्राप्त होते रहे।

कर्मठ जी ने दिल्ली में नवम्बर, 1966 के गोरक्षा आन्दोलन में भी भाग लिया था। इस अवसर पर गोरक्षक सत्याग्रहियों द्वारा संसद भवन का घेराव किया गया था। सरकारी आदेश से गोलियां चली थी जिसमें अनेक सत्याग्रही मृत्यु को प्राप्त हुए थे। यह भी बता दें कि यह गोरक्षा आन्दोलन आर्यसमाज और सनातन धर्म सभा ने मिलकर आयोजित किया था। सन् 1975 में दिल्ली में आर्यसमाज की स्थापना का अन्तर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन हुआ था। इस अवसर पर एक स्पेशल ट्रेन पूरे देश में घूमी थी जिसने डेढ़ महीने का समय लिया था। सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली में इस ट्रेन के माध्यम से देश में वैदिक धर्म के प्रचारार्थ पं0 बृजपाल कर्मठ जी की सेवायें ली थी।

पं0 बृजपाल शर्मा कर्मठ भी अपने भौतिक शरीर से इस संसार में नहीं है परन्तु यशः शरीर आज भी विद्यमान है। हमें उनके जीवन व कार्यों से प्रेरणा लेकर आर्यसमाज का पूरे उत्साह एवं समर्पण से प्रचार करना है। यही उनको श्रद्धांजलि हो सकती है। ईश्वर उनको सद्गति प्राप्त करें। श्री कर्मठ जी अपने सहस्राधिक भजनों के माध्यम से सदा अमर रहेंगे। उनके विचारों से भावी पीढ़ियां प्रेरणा लेती रहेंगी। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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