sharjeel imam umar khalid
  • डॉ राकेश कुमार आर्य

आतंकवाद देश और समाज में अराजकता फैलाने के लिए कुछ समुदायों के द्वारा जानबूझकर फैलाया जाता है। यह पूर्णतया प्रायोजित होता है। इसके पीछे बड़े-बड़े शातिर लोगों का दिमाग काम कर रहा होता है। परंतु इसे प्रस्तुत इस प्रकार किया जाता है कि जैसे ये कुछ भटके हुए नौजवानों का खेल है या निर्धनता और फटेहाली के कारण लोग विवश होकर हाथों में हथियार उठा रहे हैं। यदि इस प्रकार की मानसिकता पर विचार किया जाए तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आतंकवाद को बहुत ही सुनियोजित ढंग से फैलाया जा रहा है और उसका बचाव भी किया जा रहा है। इसके साथ ही साथ उसे इतिहास में समुचित व सम्मानित स्थान प्राप्त हो, यह भी प्रयास किया जा रहा है। वर्तमान परिस्थितियों में जिस प्रकार इस्लाम के व्याख्याकार और देश के धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल आतंकवादियों का बचाव कर रहे हैं, उसके दृष्टिगत यदि इतिहास की निष्पक्ष समीक्षा की जाए तो पता चलता है कि उनका यह खेल बहुत पुराना है। हमें इतिहास के उस तथ्य की ओर जाना चाहिए जब अंग्रेजों ने वंदे-मातरम गाने वाले क्रांतिकारियों की धरपकड़ आरंभ कर दी थी और इस गीत को गाने पर प्रतिबंध लगा दिया था, तब हमारे क्रांतिकारी आंदोलन की हवा निकालने के लिए अंग्रेजों ने मुस्लिम नेताओं को तोड़ने में रुचि दिखाई और उन्हें अपने साथ लगाकर वंदे मातरम का विरोध करवाना आरंभ किया।

जब मुस्लिम नेताओं ने वंदे मातरम का विरोध करना आरंभ किया तो अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति सफल हो गई। जिनका मुसलमानों को पूरा-पूरा लाभ मिला और वे एक दिन अलग देश लेने में सफल हो गए।
स्वाधीनता से पूर्व जिस प्रकार का खेल अंग्रेज खेल रहे थे, वैसा ही खेल आज की धर्मनिरपेक्ष राजनीति भी खेल रही है।

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि देश के न्यायालय भी राष्ट्रघाती धर्मनिरपेक्ष राजनीति को प्रोत्साहित करने का काम करते रहे हैं। देशविरोधी लोगों और आतंकवादियों को लाभ पहुंचाने के लिए न्यायालय ने भी कानून की मनमानी व्याख्याएं करनी आरंभ कर दी थीं। परंतु वर्तमान में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने लीक से हट गई न्यायिक परंपरा को फिर से सही रास्ते पर लाने के गंभीर संकेत दिए हैं। अभी 5 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने खालिद उमर और शरजील इमाम की जमानत अर्जी निरस्त करके न्यायिक नीतियों में आए इस गंभीर परिवर्तन का संकेत यह कह कर दिया है कि परीक्षण में हो रहा विलंब जमानत का आधार नहीं हो सकता। भारत में न्याय मिलने की देरी की कुव्यवस्था से हम सभी भली प्रकार परिचित हैं। इसके दृष्टिगत न्यायालय यह कहकर अपराधियों और आतंकवादियों को जमानत देने लगे थे कि यदि परीक्षण में विलंब हो रहा है तो इसका अभिप्राय किसी को अनावश्यक जेल में बंद किये रखना नहीं है। न्यायालय की इस प्रकार की मान्यता का आतंकवादियों के वकीलों ने भरपूर लाभ उठाया और उन्होंने जानबूझकर मामले को लटकाने की नीति पर काम करना आरंभ कर दिया। जिसका लाभ आतंकवादियों को मिलना आरंभ हुआ।

इससे न्यायिक व्यवस्था को कमजोर करने का खेल खेला जाने लगा। न्यायालय में बैठे न्यायाधीशों ने इसके उपरांत भी खेल की सच्चाई को नहीं समझा और वे यह कहकर आतंकवादियों को जमानत देते रहे कि जितना शीघ्र हो सके उतनी शीघ्रता से जमानत दे देनी चाहिए।

पूरी न्याय व्यवस्था इस बात पर टिकी होती है कि समाज का शांतिप्रिय वर्ग शासन की नीतियों का लाभ लेकर न्याय प्राप्त करता रहे। लोकतांत्रिक समाज में अपेक्षा की जाती है कि शासन की नीतियां भी शांतिप्रिय समाज के अधिकारों की रक्षा करने वाली होती हैं। यदि शासन भी अपनी नीतियों में चुपचाप संशोधन या परिवर्तन कर उन लोगों को लाभ पहुंचाने पर उतर आए जो शांति भंग करते हैं या खून बहाने की नीतियों में विश्वास रखते हैं तो फिर अहिंसा में विश्वास रखने वाले हमारे सनातन भारत देश में हिंसा होना निश्चित माना जाना चाहिए। क्योंकि ऐसी नीतियां हिंसक और खूनी लोगों की सोच को और भी अधिक हिंसक बनाने में सहायक होती हैं। न्यायिक व्यवस्था में बैठे न्यायाधीश यदि खूनी लोगों का समर्थन करते हुए या उनको चालाकी भरे अंदाज में लाभ पहुंचाते हुए काम करते हुए दिखाई देंगे तो फिर देश में अराजकता फैलाने में शासन की ढुलमुल नीतियों और न्यायालय में बैठे न्यायाधीशों के अनुचित आचरण को भी इसके लिए जिम्मेदार माना जाएगा।
शासन की नीति नीतियों को लेकर सभ्य समाज में यह अपेक्षा की जाती है कि वे निष्पक्ष होनी चाहिए और वे इस बात पर टिकी होनी चाहिए कि समाज के शांति प्रिय लोगों को आत्मोन्नति और आत्मकल्याण के सभी अवसर प्राप्त होने चाहिए। उनके अधिकारों पर किसी भी प्रकार का दुष्प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। वर्तमान में भारत का सर्वोच्च न्यायालय इसी दिशा में कार्य करता हुआ दिखाई दे रहा है।
जिसे एक शुभ संकेत समझा जाना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय से अपेक्षा की जाती है कि वह मानव अधिकारों को लेकर भी अपनी नीति को स्पष्ट करे। क्योंकि जिस प्रकार आतंकवादियों के लिए रात के 12:00 बजे न्यायालय को खुलवाने के उदाहरण हमारे पास उपलब्ध हैं उसके दृष्टिगत यह स्पष्ट होना चाहिए कि आतंकवादियों और मानव समाज के शत्रुओं के कभी कोई अधिकार नहीं होते। अधिकार केवल मानव के होते हैं, दानव के नहीं। दानव प्रवृत्ति के व्यक्तियों को यथाशीघ्र फांसी मिलनी चाहिए। इसे ‘ न्याय की कठोरता’ कहकर हल्के में लेना भी शांतिप्रिय जन सामान्य के साथ अन्याय करना होगा। यदि दानव अपनी दानवता दिखाते हुए जन सामान्य पर आतंकवाद का कहर बरपा सकते हैं तो यह मान लेना चाहिए कि जिस दिन उन्होंने ऐसा अपराध किया था उसी दिन उनके लिए फांसी निश्चित हो गई थी।

न्यायिक प्रक्रिया के दौरान जिस प्रकार आतंकवादी उमर खालिद के लिए कपिल सिब्बल, शरजील इमाम के लिए सिद्धार्थ दवे, गुलफिशा फातिमा के लिए अभिषेक मनु सिंघवी, शिफा उर रहमान के लिए सलमान खुर्शीद, मीरान हैदर के लिए सिद्धार्थ अग्रवाल जैसे अधिवक्ता फटाफट अपना वकालतनामा लगाते हैं, उसे भी पूरी तरह उचित नहीं कहा जा सकता। ये लोग अधिवक्ता का कार्य करें , इसमें कोई बुरी बात नहीं है। परंतु आतंकवादियों से मोटी-मोटी रकम लेकर उनके लिए कानून का लचीला दरवाजा खोजने और उसके लिए तर्क देने के उनके कार्य की निंदा भी होनी चाहिए। क्योंकि आतंकवादियों के पास अपना कोई बैंक बैलेंस नहीं होता। उन्हें देश विरोधी शक्तियां अपराध से मुक्त कराने के लिए वकीलों को मोटी रकम देती हैं। जिसे ये सभी ग्रहण करते हैं। यह फीस कहां से प्राप्त हो रही है ? – इस बात का इन वकीलों को भी भली प्रकार ज्ञान होता है। इस प्रकार वकीलों की ऐसी वकालत को भी राष्ट्र विरोधी कृत्य ही माना जाना चाहिए। फीस लेकर देश के हितों के साथ खिलवाड़ करना एक अपराध घोषित होना चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीयप्रणेता हैं)

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