भारत बुद्ध की नहीं युद्ध की आदि भूमि है

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लेखक – आर्य सागर

जब यह कहा जाता है कि भारत युद्ध की नहीं बुद्ध की भूमि है तो यह प्राचीन क्षात्र धर्म शौर्य परंपरा के साथ एक घिनौना मजाक है। वेदों में जितनी ऋचाएं ईश्वर देवों की स्तुतिपरक है उतनी ही ऋचाएं राजा को रणभूमि गमन संग्राम को प्रेरित करने वाली हैं।

बुद्ध से परे भी अति विशाल कालखंड रहा है। भारतवर्ष के इतिहास को यदि एक दिन माने तो बुद्ध या बौद्ध दर्शन का काल इसमें केवल एक सेकंड के हजार हुए हिस्से के बराबर ही रहा है ऐसा समझें। आर्यवृत के चक्रवर्ती राजाओं ने वैदिक काल से लेकर उपनिषद काल रामायण काल व महाभारत काल पश्चात् में मध्यकाल तक धर्म मानवता की स्थापना के लिए अनेकों महान संग्राम लड़े हैं।

रामायण व महाभारत अचार् विचार राजनीति नीति की शिक्षा विषयक ग्रंथ है लेकिन महर्षि वाल्मीकि व महर्षि वेदव्यास ने युद्धों के वर्णन प्रसंग की उपेक्षा ने नहीं की अपितु युद्धों को लेकर पूरे अध्याय रचे गये है इनमें ।

भारत यदि बुद्ध की भूमि है तो क्या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने युद्ध अपराध किया था या योगेश्वर श्री कृष्ण पांडवों ने भी युद्ध करके कोई अपराध किया था यदि उसे काल खंड में वह ऐसा ना करते तो उसे समय के आतंकवादी असुरो द्वारा वैदिक संस्कृति जो मानव कल्याण विश्व बंधुता की पोषक प्रचारक रही है वह कब की लुप्त हो जाती।

चंद्रगुप्त मौर्य अपने प्रधानमंत्री चाणक्य के आदेश पर यदि अपने 6 लाख घुड़सवारों के साथ यवनो को धूल न चाटते तो कब की यूनानी सभ्यता भारतीय सभ्यता को निगल जाती।
बर्बर आक्रांता हूण जिन्होंने पूरे यूरोप को तबाह कर दिया था उनके विरुद्ध यदि सम्राट स्कंदगुप्त हुंकार ना भरता तो कब की भारतीय सभ्यता आचार विचार लुप्त हो जाता।

सनातन मानवीय मूल्यों सिद्धांतों का संरक्षणक जब कोई राजा युद्ध लड़ता है तो वह शांति की ही स्थापना करता है। युद्ध एक सत्य है। न्याय पूर्वक की गई हिंसा अहिंसा ही होती है यह योग मनीषियों का सिद्धांत है।

आचार्य विष्णु गुप्त (चाणक्य) ने सही कहा था- कि वह राजा जो अपनी सीमाओं को बढ़ाना बंद कर देता है उसकी सीमा स्वत: ही घटने लगती है ।उन्होंने यह भी कहा था कि राजा का साम्राज्यवाद रूपी पक्षी नित आकाश में यदि ऊंचा उडता रहे तभी यह सुरक्षित रहता है यदि यह आकाश में एक ही स्थान पर उड़ान भरने लगे तो यह झट से जमीन पर गिर जाता है। सीमाओं की रक्षा युद्ध से ही होती है यह उन्होंने कौटिल्य अर्थशास्त्र में सिद्धांत स्थापित किया था ।उनसे हजारों वर्ष पूर्व यही सिद्धांत उपदेश मरते हुए भीष्म ने अंतिम चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर को दिया था कि राजा कभी भी संग्राम से पलायन न करें क्योंकि युधिष्ठिर के मन में भी हिंसा के कारण क्षणिक आत्मग्लानि पैदा हो गई थी भीष्म जैसा दुरदर्शी उसे भाप गया था। दुर्भाग्य से मौर्य जैसे महान वंश में अशोक जैसा भीरु कायर पैदा हुआ जो अशोक ना होकर इस भारत भूमि के लिए शोक ही था ।अपने दादा चंद्रगुप्त मौर्य की सीमाएं जो पटना से ईरान तक फैली हुई थी मुगल व अंग्रेज मिलकर भी इतना बड़ा अंपायर नहीं खड़ा कर पाए थे उसने कुछ ही दशकों में पूरे भू- भाग को गवा दिया ।सेना का निशस्त्रीकरण कर दिया खोखले बौद्ध दर्शन के लिए खजाने को खाली कर दिया। पूर्वी एशियाई देशों में बौद्ध प्रचारक भेजे अरबो का स्वर्ण भंडार खाली हो गया बुद्ध जैसे निस्तेज प्रचारक धर्म को जीवित रखने के लिए। आज क्या है पूर्वी एशियाई देशों में आज वहां बुद्धिस्म का कोई नाम लेवा नहीं है बुद्धिज्म के नाम पर जो भी वहां आज उपलब्ध है वह सब विकृत है ।अशोक की मनमानी पर यदि उसका पोता रोक नहीं लगा था तो आज जितना भारत उपलब्ध है इतना भी नहीं मिलता ऐसे में यदि आज कोई राष्ट् अध्यक्ष यह कहता है कि भारत युद्ध की नहीं बुद्ध की भूमि है तो वह भारतीय शाशक परंपरा क्षात्र परंपरा के साथ न्याय नही कर रहा है कहीं ना कहीं वह भारत की सीमाओं को असुक्षित कर रहा है वह अशोक के राष्ट्रघातक मार्ग की ओर अग्रसर है।

भारत में इस्लाम का रक्तबीज बुद्ध द्वारा तैयार की गई मिथ्या अहिंसावाद की उर्वरा भूमि में ही फला फुला था।

जैसे अपराध मुक्त समाज कभी भी नहीं बनाया जा सकता ऐसे ही युद्ध विहीन विश्व की संकल्पना एक भ्रम मात्र ही। जब तक राष्ट्र है राष्ट्रों में संग्राम चलता रहेगा यह सनातन वैदिक सिद्धांत है हां लेकिन उन संग्राम के औचित्य अनौचित्य पर हम चर्चा जरूर कर सकते हैं।

लेखक – आर्य सागर खारी

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